टूट के कगार पर बिहार कांग्रेस और राहुल का लालू- नीतीश फैक्टर

बिहार कांग्रेस में विभाजन रोकने की राहुल गांधी की कोशिश नाकाम होती दिख रही है. सवाल यह है कि कांग्रेस टूट के कगार पर क्यों पहुंच गयी है. इसे समझने के लिए लालू व नीतीश फैक्टर को समझना जरूरी है.  हमारे सम्पादक इर्शादुल हक का विशेषण

27 जुलाई को नीतीश कुमार ने अचानक महागठबंधन को छोड़ कर भाजपा के साथ सरकार बना ली थी. बजाहिर इस घटना का सबसे बड़ा असर लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल पर हुआ. रातोंरात राजद सत्ता के सिंहासन से विपक्ष की पार्टी बन गया. पर कांग्रेस पर भी इस घटा का असर होना ही था. लेकिन तत्काल वह राजद के साथ तो जरूर था, पर एक कांग्रेस का एक धड़े के मन में कुछ और ही सुगबुगाहट हिलोरें मारने लगा था.

2015 के विधान  सभा चुनाव में कांग्रेस को अपार सफलता मिली थी. महागठबंधन के घटक दल के रूप में उसने मात्र 43 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसके 27 प्रत्याशी जीत गये थे. खास बात यह थी कि राजद और जद यू के बरअक्स कांग्रेस से सवर्ण प्रत्याशियों की सबसे ज्यादा जीत हुई थी. यहां तक कि जद यू और राजद की तुलना में भी ज्यादा सवर्ण ( प्रतिशत के लिहाज से) जीते थे.

 

महागठबंधन से अलग होने के बाद जब जदयू भाजपा के साथ चला गया तो कांग्रेस के सवर्ण विधायकों की चिंता बढ़ी. ये विधायक यह मानते हैं कि भाजपा के साथ जाने के कारण सवर्ण वोटर भजापा गठबंधन की तरफ शिफ्ट हो जायेंगे, जिसके कारण अगले चुनाव में कांग्रेस के सवर्ण विधायकों के लिए जीत मुश्किल होगी.

 

कांग्रेस में बिखराव को सपोर्ट करने वाले सवर्ण विधायक ही ज्यादा हैं. दूसरी तरफ यह कयास लगाया जा रहा है कि नीतीश कुमार कांग्रेस को तोड़ने के लिए अपने खास लोगों को लगाये हुए हैं. जद यू चाहता है कि कांग्रेस टूटे और उसके विधायक जदयू में शामिल हो जायें. लेकिन इसके लिए सबसे बड़ी मुश्किल  दलबदल अधिनयम बन रहा है. पार्टी तोड़ने के लिए कम से कम जितने विधायकों की संख्या लाजिमी है, वह संख्या नहीं जुट पा रहा है.

 

इधर ताजा घटनाक्रम में अब सीधे राहुल गांधी ने इस मामले में हस्तक्षेप शुरू कर दिया है. उन्होंने तमाम कांग्रेसी विधायकों से मुलाकात की है. विधायकों के रुख को जाना है. बताया जा रहा है कि राहुल यह मान चुके हैं कि कांग्रेस के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी इस टूट की कोशिश में लगे हैं. सो उन्होंने दो टूक कह डाला है कि राजद के साथ गठबंधन में कांग्रेस को रहना ही रहना है. राहुल, जो कल तक लालू को राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देते थे, अब लालू की ताकत के मुरीद होते जा रहे हैं. राहुल को पता है कि जदयू के चले जाने के बाद मुस्लिम यादव इक्वेशन को साधने की क्षमता लालू में ही है. राहुल यह भी जानते हैं कि जदयू के चले जाने से सवर्णों के वोटों का विभाजन से होने वाले नुकसान, से ज्यदा फायदा मुस्लिम यादव वोट बैंक को साधने में है. यादव और मुस्लिम वोटरों का समूह लगभग 30 प्रतिशत है. जबकि सवर्णों की आबाद 15 प्रतिशत के करीब है. दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में राहुल की कांग्रेस अखिलेश यादव के साथ पहले से ही है. राहुल देशव्यापी स्तर पर इस गठबंधन को मजबूती देना चाहते हैं.

इस गणित को ध्यान में रखते हुए ही राहुल यह चाहते हैं कि बिहार में लालू प्रसाद के साथ रहना ही कांग्रेस के लिए हितकर है. ऐसे में राहुल ने कांग्रेस को मजबूत बनाये रखने के लिए अशोक चौधरी को किनारा लगाना चाहते हैं. उन्होंने कहा भी है कि अशोक चौधरी उनके विश्वस्त रहे हैं पर कांग्रेस तोड़ने में अशोक चौधरी की भूमिका पर उन्हें संदेह नहीं है. लिहाजा कांग्रेस चौधरी की जगह, नया प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा जल्द करेगी. इससे कांग्रेस के उन विधायकों का मनोबल बढ़ेगा जो चौधरी के खिलाफ हैं. कांग्रेस का बिहार में सबसे मजूबत गढ़ सीमांचल में है. जहां मुसलमानों की भारी आबादी है, और मुस्लिम विधायकों की संख्या भी काफी है.

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