टोपी और तिलक से आगे

ईद आई तो फिर नरेंद्र भाई और टोपी की याद आ गयी. इस बार अभिनेता रजा मुराद ने टोपी की याद दिलायी.

उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार व्यक्ति को टोपी पहनने में नहीं हिचकिचाना चाहिए. उन्होंने कहा शिवराज सिंह चौहना ने भी टोपी पहन ली. टोपी तो लालू ने भी पहनी और नीतीश ने भी. तो क्या मुसलमानों के हमदर्द होने का पैमाना टोपी ही रह गयी है.

मोदी ने सद्भावना उपवास के दौरान 18 सितंबर 2011 को मंच पर जब एक इमाम ने टोपी पहनाने की कोशिश की तो मोदी ने इनकार कर दिया था. लेकिन टोपी के इस भूत से न तो मीडिया अपना पीछ छुड़ा पा रहा है और नहीं नेता-अभिनेता. लेकिन रजा मुराद ने टोपी को आधार बनाकर शिवराज को मोदी की तुलना में अल्पसंख्यकों का बड़ा हितैषी बताया दिया.

मुराद ने मोदी को खरी खोटी भी सुना दी. कहा कि दूसरे मुख्यमंत्रियों को शिवराज से सीख लेने की जरूरत है. रजा मुराद ने यहां तक कहा कि देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठना है तो सबको साथ लेकर चलना होगा.

पर मुराद को यह जानना चाहिए कि सबको साथ लेकर चलने के लिए सदभावना भरा दिल चाहिए न कि टोपी का दिखावा. मोदी ने तो वही किया जो दिल में था. लेकिन टोपी से सीख लेने की जरूरत तो उन राजनेताओं और मुख्यमंत्रियों को है जो टोपी भी पहनते हैं और उन के राज्य में मुसलमानों के हितों का काम पीछे पड़ जाता है

एक बार नीतीश ने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि समय पड़ने पर टोपी भी पहननी पड़ती है और तिलक भी लगाना पड़ता है तो सवाल यह है कि सिर्फ तिलक और टोपी से समाज का भला होता है.

जरूरत है कि टोपी और तिलक की बहस से निकला जाये समाज के एक समान विकास की बात की जाये.

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