‘डीएमवाई’ ने दी मांझी को नयी ताकत

बिहार विधान सभा उपचुनाव का परिणाम मुख्‍यमंत्री जीतनराम मांझी के नेतृत्‍व पर स्‍थायीत्‍व की मुहर लगा दी है। इसने यह बता दिया है कि राजद-जदयू-कांग्रेस गठबंधन की सरकार में नेतृत्‍व को लेकर अब बहस की गुंजाइश नहीं बची है। आगामी विधान सभा चुनाव में गठबंधन की अगुआई कोई करे, मुख्‍यमंत्री के उम्‍मीदवार जीतनराम मांझी ही रहेंगे। वजह साफ है कि जीतनराम मांझी का दलित फैक्‍टर ताकतवर बनकर उभर रहा है और उपचुनाव में गठबंधन के पक्ष में जमकर मतदान किया है।manjhi

वीरेंद्र यादव

उपचुनाव में लालू यादव के यादव, मुसलमान के साथ दलितों ने भी एकमुश्‍त मतदान गठबंधन के पक्ष में किया है। यह वोट जीतनराम मांझी के कारण गठबंधन के साथ आक्रमक रूप से जुड़ा रहा। इस कारण बिहार में एक नया समीकरण बना डीएमवाई यानी दलित, मुसलमान व यादव। यहां दलित का संदर्भ संपूर्ण अनुसूचित जातियों से है। गठबंधन में कांग्रेस व जदयू के शामिल होने से मुसलमान वोटों का बिखराव रुक गया। यादव व दलितों के मिल जाने से बड़ी ताकत बन गयी।

 

वास्‍तविकता यह है कि नीतीश कुमार का अपना कोई आधार वोट नहीं है। वह लालू यादव के नकारात्‍मक वोटों की राजनीति कर रहे थे। उन्‍होंने अतिपिछड़ा व महादलित के नाम पर राजनी‍ति की, लेकिन वह राजनीति भी लालू विरोध पर केंद्रित था। जैसे ही भाजपा उनसे अलग हुई, लालू विरोध का वोट भाजपा की ओ‍र शिफ्ट हो गया। वह वोट को बांधे रखना उनके लिए संभव नहीं था, तो वजह थी कि वह वोट उनका नहीं था। इस महागठबंधन की जीत में सबसे बड़ी भूमिका मुख्‍यमंत्री जीतनराम मांझी और राजद प्रमुख लालू प्रसाद की रही। दलित व यादव वोटों के साथ मुसलमान वोटों की एकजुटता ने बिहार नया इतिहास गढ़ दिया। कांग्रेस व नीतीश कुमार समर्थक की भूमिका बराबर खड़े रहे।

भाजपा की चुनौती

यह परिणाम भाजपा के लिए इस मायने में महत्‍वपूर्ण रहा कि लालू व नीतीश की एकजुटता के बाद भी नये सामाजिक आधार को टूटने से रोके रखा। अतिपिछड़ी जातियों का विश्‍वास अभी भी भाजपा के साथ है। सवर्ण के लिए भाजपा आज भी पहली पसंद है। गठबंधन के खाते में गयी छह सीटों में से चार पर सवर्ण जाति के उम्‍मीदवार ही जीते हैं। दो से एक आरक्षित राजनगर सीट पर पासवान और एक पर यादव ने जीत दर्ज की है। आज भी आम सवर्ण भाजपा के साथ है, जबकि सवर्णों का जो वोट गठबंधन को मिला, वह उम्‍मीदवार की जाति का वोट था। ठीक इसके विपरीत सवर्णों की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा के चार में तीन गैरसवर्ण हैं यानी भाजपा अपनी पारंपरिक छवि तोड़ने में सफल रही है और अपना आधार बढ़ाया है।

अब भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती डीएमवाई में सेंधमारी की है। उसका पूरा दारोमदार पिछड़ी जातियों में खासकर यादव में आधार बढ़ाने का है। इस काम में वह किस हद तक सफल होती है, वह समय ही बताएगा।

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