तब महादलित व सवर्ण आयोग, अब लीजिए मछुआरा आयोग

आयोग-आयोग खेलने की कड़ी में बिहार सरकार ने अब मछुआरा आयोग के गठन की मंजूरी दे दी है. इससे पहले महादलित आयोग और सवर्ण आयोग गठित हो चुके हैं और उसका नतीजा सामने है.malh.muz2-2010 160

इर्शादुल हक

नीतीश कुमार ने मछुआरा आयोग के गठन की बात कई बार दोहरा चुके थे. मंगलवार को उनकी सरकार ने इसके गठन को औपचारिक मंजूरी दे दी है.

पर कहते हैं राजनीति जो न कराये. नीतीश सरकार ने अपनी दूसरी पारी की शुरूआत सवर्ण आयोग के गठन से की थी. इसके पहले उसने महादलित आयोग का गठन किया था. यह आम धारणा है कि हमारे देश में अमूमन आयोगों का गठन या तो ध्यान बांटने के लिए किया जाता है या फिर राजनीतिक मकसद से. ऐसा कम ही होता है कि कोई आयोग गठित हो और उसकी अनुशंसायें लागू हो पायें.

जदयू-भाजपा गठनबंध की सरकार ने जब महादलित आयोग का गठन किया था तो यह आरोप लगे थे कि दलितों को बांटने की साजिश है. कुछ टीकाकार यहां तक कहते पाये गये कि अतिपिछड़े दलितों के वोट बैंक को राजद और लोजपा से अलग कर जद यू के पाले में लाने की कोशिश है. इस आयोग ने अभी तक कितना काम किया है और इसकी कितनी अनुशंसायें लागू की गयी हैं, यह अध्ययन का विषय है पर मोटे तौर पर जो जानकारी उप्लब्ध है उससे यह पता चलता है कि महादलित आयोग को करने के लिए कोई काम तक नहीं है. हां इसके अध्यक्ष लालबत्ती का लुत्फ जरूर उठा रहे हैं.

इसी प्रकार जब नीतीश सरकार ने 2010 में दूसरी बार सत्ता संभाली तो सरकार का तर्क था कि सवर्ण समाज के गरीबों की तरक्की के लिए एक आयोग गठित किया जाये ताकि अगड़ी जातियों के पिछड़ों के लिए ठोस योजनायें सामने आ सकें. जदयू ने इस आयोग के गठन का उल्लेख अपने घोषणापत्र में भी किया था. सो उसने सत्ता संभालते ही जनवरी 2011 में सवर्ण आयोग का गठन कर दिया. पर यह आयोग पूरी तरह से कागजी साबित हुआ है. सवर्ण आयोग अब तक अपनी उम्र के दो साल पूरे कर लिये हैं. पर इन दो सालों में आयोग ने क्या किया, खुद इसके सदस्य संजय म्युख भी कुछ कहने से कतराते हैं. काफी दिनों तक तो इस आयोग को एक दफ्तर तक नसीब नहीं हुआ था.

अब मछुआरा आयोग

बिहार सरकार ने मछुआरा आयोग के गठन का वादा काफी दिनों पहले किया था. मछुआरों का आरोप था कि मंत्रिमंडल में मछुआरा समाज के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. राज्य में मछुआरा समाज एक मजबूत वोटबैंक के रूप में माना जाता है. इनकी आबाद 3-4 प्रतिशत के करीब बतायी जाती है. ऐसे में नीतीश सरकार ने मछुआरा आयोग के गठन का राजनीतिक जाल मछुआरों पर फेका है. वैसे इस आयोग के गठन के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए कैबिनेट सचिव ब्रजेश मेहरोत्रा ने बताया कि सरकार का मानना है कि मछुआरा समाज के चहुंमुखी विकास के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक उत्थान पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. इसी परिप्रेक्ष्य में मछुआरों के संरक्षण, कल्याण, सम्यक विकास एवं आर्थिक सुधार के लिए आयोग मामलों पर शोध करेगा और सरकार को अपनी अनुशंसा देगा.
इसके अध्यक्ष को राज्यमंत्री का जबकि उपाध्यक्ष को उपमंत्री की सुविधायें मिलेंगी. पर अभी तक के आयोगों के गठन के बिहार सरकार के उद्देश्यों को देखें तो कुछ लोगों को लालबत्ती और सरकारी सुविधायें देने के अलावा शायद ही कोई काम हुआ है. देखना है मछुआरा आयोग के मामले में क्या होता है.

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