तेजस्वी को नीतीश निंदा और लालू विलाप से आगे बढ़ना होगा

तेजस्वी को नीतीश निंदा और लालू विलाप से आगे बढ़ना होगा

प्रथम चरण के चार और दूसरे चरण के पांच लोकसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रचार उठान पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बिहार में तीन सभाओं को संबोधित कर चुके हैं। महागठबंधन के सबसे ताकतवर नेता लालू यादव जेल में हैं। लालू यादव की अनुपस्थिति में उनके पुत्र और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव महागठबंधन के सबसे मजबूत प्रचारक हैं।

वीरेंद्र यादव के साथ रणभूमि की तपिश- 1 

मीडिया भी उनके सभाओं को नोटिस ले रहा है। शरद यादव, जीतनराम मांझी, मदन मोहन झा, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी प्रादेशिक पेज की खबर बनकर रह गये हैं। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान के मुकाबले अकेले तेजस्वी यादव मोर्चा संभाल रहे हैं। दोनों गठबंधनों में प्रचार के स्तर पर उम्र में 30-35 साल का फासला है। तेजस्वी 30 वर्ष से कम उम्र के हैं और एनडीए के सभी प्रमुख नेता 60 साल से ऊपर के हैं।


पिछले 30 वर्षों से बिहार की राजनीति में लालू यादव केंद्रीय मुद्दा बने हुए हैं। समर्थकों के लिए भी और विरोधियों के लिए भी। लेकिन अब राजद नेताओं की गलती से लालू राजनीति की मुख्य धारा से हाशिये की ओर धकेले जाने लगे हैं। राजद के नेता ‘नीतीश निंदा’ और ‘लालू विलाप’ को चुनाव प्रचार का मुख्य मुद्दा बना रहे हैं। इस कोशिश में लालू हाशिये के विषय बनते जा रहे हैं। 

 


राजद विधायक दल के नेता तेजस्वी यादव अपनी चुनावी सभाओं में नीतीश कुमार को टारगेट कर रहे हैं और लालू यादव को साजिश के तहत जेल में रखने का आरोप भी लगा रहे हैं। मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उसमें यही बात दिखती है। जबकि तेजस्वी को लालू यादव के सामाजिक न्याय की लड़ाई को फोकस करना चाहिए।

 

राज्य में कुछ जातियों की पार्टी तय हो गयी है। उसकी मानसिकता को कोई भी नेता फिलहाल बदलने की स्थिति में नहीं है। लेकिन कम से कम 20-25 प्रतिशत वोटरों का ऐसा जातीय समूह है, जो हवा का रुख देखकर मतदान करता है। इसमें बड़ा हिस्सा गैरबनिया अतिपिछड़ी जातियों का है। ऐसी जातियों की बनावट और बसावट अलग-अलग है।


ये ऐसी जातियां है, जो 1990 के दशक में लालू यादव के सत्ता में आने के बाद सामाजिक सम्मान की लड़ाई में ‘चक्र’ के साथ थीं। इन जातियों का व्यापक जनसमर्थन लालू के साथ था। इसी जाति को आधार बनाकर नीतीश कुमार ने लालू यादव के खिलाफ गोलबंदी शुरू की थी और सवर्णों ने इन जातियों को साथ लेकर लालू यादव को कमजोर किया था। नीतीश कुमार को सवर्णों ने ‘हथियार’ के तरह इस्तेमाल किया। 


चुनाव में नीतीश को टारगेट कर तेजस्वी अपने सबसे मजबूत हथियार सामाजिक न्याय को भोथर बना रहे है, उसकी धार कमजोर कर रहे हैं। तेजस्वी को उपेक्षित जातियों के साथ संवेदना के स्तर पर जुड़ना होगा। उपेक्षित जातियों की भावनाओं को समझना होगा। बिहार में सामाजिक और सत्ता के बदलाव की लड़ाई में लालू यादव के योगदान को उनके घोर विरोधी भाजपाई भी नहीं नकार पाते हैं।

 

तेजस्वी को उपेक्षित और सामाजिक रूप से सवर्ण सत्ता की प्रताडि़त जातियों को लालू यादव के संघर्षों से जोड़ना होगा। सामाजिक सम्मान और सत्ता की लड़ाई के साथ भी खुद को जोड़ना होगा। नीतीश निंदा या लालू विलाप नये सामाजिक समीकरण गढ़ने में कारगर नहीं होंगे। तेजस्वी को 1990-95 के सामाजिक समीकरण पर फिर से धार चढ़ाना होगा, तभी 2019 कर महाभारत महागठबंधन के अनुकूल हो सकेगा।

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