तेजस्‍वी की ‘दिल की बात’ में झलका बिहार का दर्द  

उपमुख्यमंत्री एवं राजद विधायक दल के नेता तेजस्वी यादव का जनता के साथ सीधा संवाद करने की कोशिश ‘दिल की बात’ में इस बार उनका दर्द झलक पड़ा है। बिहार में खेलों की उपेक्षा, खिलाडि़यों के प्रति प्रशासन का नकारात्‍मक नजरिया और अपर्याप्‍त सरकारी कोशिश को खेलों में पिछड़पेन का मुख्‍य कारण माना है। तेजस्‍वी ने लिखा है कि खेल जगत का सबसे बड़ा उत्सव, खेल की दुनिया का महाकुंभ यानि कि ओलंपिक्स ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो में चल रहे हैं। विश्वभर के खिलाडी ओलंपिक्स में अपने अपने देशों का प्रतिनिधित्व करने रियो में जमा हुए हैं। इन सभी खिलाड़ियों के सालों की मेहनत और तपस्या को चन्द मिनटों या सेकंडों में आजमाने का समय आ गया है।tebg

 

नौकरशाही ब्‍यूरो

 

ओलंपिक्स, भारत और बिहार पर है फोकस  

उन्‍होंने लिखा कि भारत के खिलाड़ी भी अपने-अपने खेलों और उनके विभिन्न वर्गों में क्वालीफाई करके ओलंपिक्स में भाग लेने के लिए पहुँच गए हैं। अबतक कुछ प्रतिस्पर्धा में बने हुए हैं तो कुछ आगे के राउंड में प्रवेश कर अपनी दावेदारी को कायम रखे हुए हैं। भारत के खिलाडी इस ओलंपिक्स में लंदन ओलंपिक्स के मुकाबले और अधिक पदक अंक तालिका में जोड़ पाए तो हर भारतीय को और अधिक ख़ुशी और गर्व होगा।

 

बिहार की पहुंच से दूर ओलंपिक्‍स

मुझे इस बात की तो ख़ुशी है कि बड़ी तादाद में भारतीय खिलाड़ी इस बार ओलंपिक्स में भाग ले पा रहे हैं। पर एक बिहारी होने के नाते मुझे अत्यंत दुःख होता है कि बिहार का कोई भी खिलाड़ी इस रियो ओलंपिक्स में बिहार का नाम रौशन करने के लिए ओलंपिक्स तक का सफर तय नहीं कर पाया है, इस बात का बहुत दुःख है। शायद बिहार में खेल कूद को बढ़ावा देने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं हुई है और अभिभावक भी बच्चों को खेलों के प्रति ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करते। कुछेक राज्यों को छोड़कर सभी जगह यही स्थिति है। ना तो कभी ज़मीनी स्तर पर काम करते हुए प्रतिभा को निखारने का प्रयास किया गया, ना खेल कूद को प्रोत्साहन देने के लिए उचित धनराशि आवंटित की गई है और ना ही प्रतिभा निखारने के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण किया गया। जो बात दिल को और कचोटती है, वह है यथास्थिति को बदलने के प्रति उदासीनता। rio

सिस्‍टम की भेंट चढ़ा खेल

यह वास्तविकता है कि खेल कूद में सालों झोंकने के बाद भी कुछेक खिलाड़ी ही विश्व स्तर पर नाम कमा पाते हैं। कुछ राष्ट्रीय स्तर तक नाम कमाते हैं तो कुछ राज्य स्तर तक। किसी का खेल जीवन सिस्टम की भेंट चढ़ जाता है तो किसी का खेलों में राजनीति की भेट चढ़ जाता है। खेल से बहुत से लोगों को ढंग का रोज़गार मिल जाए, ऐसा भी नहीं है। पर खेलों और खिलाड़ियों से भावनात्मक जुड़ाव पूरे देश का होता है। देश के खिलाड़ियों के जीत को अपनी जीत मानते हैं और उनकी हार को अपनी हार। खेलों से कभी पूरे देश में हर्षोल्लास का वातावरण बन जाता है तो कभी मातम का माहौल। कोई खेल को जंग मानता है तो कोई मात्र मनोरंजन का साधन। पर इसमें कोई दो राय नहीं है कि समय-समय पर खेल हमें स्वयं पर और देश पर गर्व करने का अवसर देते हैं और राष्ट्र निर्माण में अपना ही योगदान देते हैं। खेल को नज़रअंदाज़ कतई नहीं करना चाहिए।

बनना होगा सकारात्‍मक महौल

उपमुख्‍यमंत्री ने लिखा है कि मणिपुर, हरियाणा और पंजाब जैसे छोटे और कम आबादी वाले राज्य खेल कूद के मामले में बिहार से कहीं आगे हैं। हरियाणा और पंजाब में एक निर्धारित स्तर पर नाम कमाने पर सरकारी नौकरी दी जाती है । और अच्छा करने पर पदोन्नति भी दी जाती है। मणिपुर, जो एक छोटा राज्य है, वह दिखाता है कि अगर खेल-कूद को संस्कृति का हिस्सा बना दिया जाए तो प्रतिभा स्वयं आगे आने लगती है। हमें बिहार में भी खेल-कूद की संस्कृति का विकास करना होगा। इसे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। माता-पिता और शिक्षकों को जीवन में खेलकूद और स्वास्थ्य के महत्व को समझना होगा। खेल-कूद ना सिर्फ हमे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाते हैं, बल्कि चुनौतियों का सामना करना, तालमेल बिठाना, लक्ष्य साध कर मेहनत करना और एक-दूसरे की मदद करते हुए आगे बढ़ना सिखाता है। व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए खेलों के महत्व को बिहारवासियों और व्यवस्था को समझना ही पड़ेगा।

 

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