दलित आंदोलन को लंबी लड़ाई की जरूरत

भारत में दलित आंदोलन को भूख,  महंगाई,  बेरोजगारी,  उत्पीड़न और जमीन  के सवाल पर एक होकर लंबी लड़ाई लड़नी होगी। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. सुबोध नारायण मालाकार पटना स्थि‍त जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान द्वारा आयोजित संगोष्ठी ‘‘समकालीन भारत में दलित स्वर’’ को संबोधित कर रहे थे।jrs 3

 

 

उन्होंने कहा डिकास्टिंग (विजातिकरण) से ही समाज का भला होगा। उच्च जातियों को भी डिकास्ट होना है। जे.एन.यू. छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के रिसर्च गाईड प्रो. मालाकार ने कहा कि कन्हैया के भाषण में एक साथ दलित उत्पीड़न और आम जनता की उत्पीड़न है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष आशुतोष ने कहा कि अगर पूंजीवाद से आजादी,  भूख से आजादी,  मनुवाद से आजादी की बात करना देशद्रोह तब हम सभी देशद्रोही हैं। देश में सवाल उठाना ही देशद्रोह हो गया है।

 

 

प्रो. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि अब वह दलित स्वर नहीं। वह गूंज रही है। प्रश्न सत्र में डॉ. घनश्याम राय,  गुलरेज होदा,  राजकुमार,  संतोष यादव,  रत्नेश पटेल,  जेपी यादव आदि ने प्रश्न प्रो. रमाशंकर आर्य ने कहा कि पहले दलितों को शारीरिक प्रताड़ना पिसती थी और अब मानसिक प्रताड़ना। दलित स्वर को मुख्य स्वर बनाने में दलित साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1960 के दशक के बाद से दलित वाणी प्रकाशित हो रही है। इससे पहले संस्थान के निदेशक श्रीकांत ने विषय प्रवेश कराया। समारोह का संचालन डॉ. मनोरमा सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. वीणा सिंह ने किया। इस अवसर पर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, श्याम रजक, गुलरेज होदा, आलोक धन्वा, प्रभात सरसिज, शेखर, प्रणव चौधरी, अशोक मिश्रा आदि उपस्थित थे।

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