दलित बनाये रखने की होड़

आधी सदी के जद्दोजहद के बावजूद महात्मा गाँधी के हरिजन और बाबा अंबेडकर के दलितों को जाति व्यवस्था में बराबरी पर लाने की हमारी तमाम कोशिश नाकाम साबित हुई है और आज भी दलितों को स्कूल, कार्यस्थल, प्रार्थना स्थलों, व सामाजिक अनुष्ठानो में भेदभाव का सामना है.पेश हैअक्षय नेमा मेख का नजरियाDalit-Women-in-Varanasi-

संवैधानिक लिहाज से सबको समानता का अधिकार प्राप्त है.

सच्चाई यही है कि सामंतवादी व्यवस्था भारतीय जनमानस से भेदभाव मिटना चाहती भी नहीं और न ही ऐसा वैचारिक प्रयास भी दिखाई देता जिसका पालन हो व एक ही झटके में भेदभाव की रीढ़ टूट जाये. इसी तरह यह भी सच है कि न तो हमारा राजनैतिक तंत्र और न ही आम जनमानस जो आज भी निरा मूर्ख पंडितों को आदर देता है व विद्वान् दलित को भेदभाव के नजरिये से देखता है.

यहाँ तक की दलितों के दलित बने रहने का अधिकतर श्रेय इन्ही दलितों को जाता है जो अपने अधिकार की लड़ाई को गंभीरता सने नहीं लेते.कुल मिला कर इनकी दयनीय दशा के लिए समूचा तंत्र जिम्मेदार रहा है.

क्योंकि आरक्षण से मिलने वाली तमाम सुविधाओ का इनपर इतना गहरा प्रभाव पड़ा की वे अब इन सुअवसरों को छोड़ना ही नहीं चाहते. कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि दलितों का जो वर्ग आरक्षण का लाभ लेकर आगे निकल चुका है उन्हें अपने दिगर कमजोर भाइयों के हक में आरक्षण का लाभ छोड़ देना चाहिए.

हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है की हम नागरिक और संवैधानिक अधिकारों के विमर्श में किस तरह आगे बढे? चूंकि हम सभी यह अच्छी तरह से जानते है की जाति व्यवस्था में गैरबराबरी को न केवल वैधता बल्कि धार्मिक स्वीकार्यता भी मिली हुई है जिसके परिणाम स्वरुप ही इस जातिगत भेद को सिध्दांतों और व्यवहारों में स्वीकारा जाता रहा है.

इसं दलितों से समाज के भेदभाव का एक कारण और सामने है जिसमे एक अनारक्षित वर्ग का व्यक्ति उस आरक्षित वर्ग के दलित व्यक्ति से तब और अधिक घृणा करने लगता है जब उसके अयोग्य होने के बावजूद भी कोटा आधारित पद या नौकरी उसे स्वीकृत कर दी जाती है. अन्यथा अनारक्षित वर्ग के साथ दलितों की दोस्ती भी देखि गई है.

भारत में भेदभाव की कुपरम्परा सदियों से बनी हुई है. फर्क सिर्फ इतना आया है की पहले यह भेदभाव वर्ण व्यवस्था के आधार पर किया जाता था लेकिन वर्तमान समय में जहाँ समाज साक्षर हुआ है तब भी भेदभाव बढ़ा है परन्तु अब इसकी एक वजह आरक्षण भी है.

यदि भारत से इस भेदभाव को समाप्त करना है तो सबसे पहले आरक्षण के चेहरे को बदलना होगा. साथ ही उन लोगों को दलित वर्ग से बाहर आकर समाज के सामने अपनी योग्यता सिद्ध करना होगा. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें मिलने वाला आरक्षण का राजनीतिक लाभ लिया जाता है. राजनीतिक पार्टियां भी नहीं चाहती की दलित और गैरदिलत का फर्क मिटे क्योंकि उन्हें इससे वोट बैंक बनाने में मदद मिलती है. लेकिन अब समय आ गया है क्योंकि नयी पीढ़ी चाहती है कि सामाज की भेदभाव की यह कुप्रथा समाप्त हो.

अक्षय नेमा मेख मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में रहते हैं और स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं, यह उनका निजी विचार है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*