दवा कंपनियों की लूट की छूट का नमूना है नयी दावा नीति

आशुतोष कुमार सिंह

राष्ट्रीय दवा नीति को कैबिनेट की मंजूरी दिलाकर जरूरी दवाइयों को सस्ती करने का सरकारी फैसला ऊपर से देखने में बेहतर लग रहा है, पर सच्चाई यह है कि जिस नीति (बाजार आधारित नीति) के तहत दवाइयों के मूल्य तय किए जा रहे हैं वह नीति दवा कंपनियों की लूट को बढ़ावा देने के लिए कानूनी इजाज़त देने जैसा है.

क्योंकि इस नीति के तहत कंपनियों द्वारा तय की गयी एम.आर.पी का औसत मूल्य को सेलिंग प्राइस अथवा सरकारी रेट तय करने की बात की गयी है. गौरतलब है कि कंपनियां अपनी लागत से 1000-3000 प्रतिशत ज्यादा एम.आर.पी तय करती हैं. यह बात अब किसी से छुपी नहीं है. इसको कई बार प्रमाण सहित साबित किया जा चूका है.

ऐसे में इन कंपनियों द्वारा तय की गई एम.आर.पी का औसत, ज्यादा राहत देता हुआ नजर नहीं आ रहा है.ऐसे में जो कंपनियां सस्ते दामों पर दवाइयों बेच रही हैं वे भी इस औसत के चक्कर में अपना मूल्य बढा देंगी.

मूल बात यह है कि सरकार द्वारा 348 दवाइयों के मूल्य कंट्रोल करने की बात एक तरह से छलावा और लोगों को भरमाने का प्रयास भर है. इस नीति को पढ़ने के बाद इतनी बात तो समझ में आ गयी है कि सरकार सच्चे मन से दवाइयों के दाम को कम नहीं करना चाहती.

यह सोचने की बात है कि जहां पर हजारों प्रतिशत में मुनाफा कमाया जा रहा हो वहां 10-20 प्रतिशत की कमी के क्या मायने है.

सरकार द्वारा बाजार आधारित मूल्य निर्धारण की नीति का विरोध करते हुए अब सामाजिक संगठनों को मांग करनी चाहिए कि सरकार दवाइयों के दाम लागत मूल्य के आधार पर तय करे. तब जाकर सही मायने में आम जनता को कुछ फायदा हो सकेगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*