दिल्ली सलतनत: तोते की याद, सुई के चक्कर में हीरा,गडकरी की बारी

आप भारत की -सम्मेलन शिकागो में panwar

अन्ना हजारे तो आप सबको याद होंगे। आजकल बेचारे उदास हैं। उनकी सेहत भी ठीक नहीं रहती। सेहत दिल्ली अनशन से खराब नहीं हुई लेकिन जिस तरह चेले अरविंद केजरीवाल ने गच्चा दिया उससे वो कमजोर हो गए हैं। अब अरविंद तो ठहरे अरविंद। पार्टी भी बड़ी धांसू बनाई। काम भी जोरदार कर रहे हैं। जो काम मीडिया में बहुत बड़े खिलाड़ी करते हैं कुछ ऐसा ही काम वो करते हैं। हर उस चेहरे को घेरने का काम आम आदमी पार्टी से कराते हैं जहां करप्शन है। आखिर जहां पैसा है वहीं से तो पैसा आएगा। पैसा जितना अन्ना के नाम पर आया था वो तो खर्च हो गया । आम आदमी पार्टी भले ही हो आम आदमी तो कोई दे नहीं रहा। खास ही देंगे। जो देश के खास हैं या जिनके निशाने पर खास हैं उनसे भी कुछ आ रहा है पर इससे भला नहीं हो रहा है तो देखिए क्या चाल चली है केजरीवाल साहब ने। आम आदमी पार्टी है तो भारत की लेकिन सम्मेलन होगा शिकागो में। भला वहां क्यों ? क्योंकि वहां धनवान हैं। क्योंकि वहीं से तो धन आता है। अगर कांग्रेसी नेता ये कहते थे कि ये सारा आंदोलन विदेशी शह पर है तो क्या गलत है? भारत में तो अब तक कोई सम्मेलन आम आदमी पार्टी का हुआ नहीं फिर अमेरिका में ही क्यों? सब माया की माया है।

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सूईं के चक्कर में हीरा लग गया हाथ

पत्रकारिता में कहा जाता है कि तलवार से मत काटो, सूईं चुभाओ। पर इस सूईं की याद सबसे ज्यादा आजकल बिहारी नेताओं को आ रही है। हर कोई उसका ही नाम ले रहा है। अब पता नहीं कभी दर्जी का काम किया था या फिर घर में कोई बटन लगाने वाला नहीं रहा। जो इससे इतना प्यार हो गया कि हीरा उद्योग के उदघाटन पर सारे बिहारी नेता इस सूईं में जा उलझे और हीरे को भूल गए। यहां जो महफिल सजी थी वहां पीड़ा देने की अपनी प्रकृति के विपरीत सूर्इं ने सबको हंसाया। जब-जब इसका नाम आया, लगे ठहाके। सूईं की बात शुरू की श्रम संसाधन मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल ने। राजद प्रमुख लालू प्रसाद को निशाने पर लेते हुए कहा कि अब सपना नहीं, सामने देखिए। सूर्इं की बात करते हैं और यहां तो हीरे का कारखाना लग गया। नीतीश कुमार भी नहीं चूके। राजद की परिवर्तन रैली को निशाने पर लेते हुए कहा कि थोड़े समर्थकों को जुटा कर कौन, क्या कहता है, महत्वपूर्ण नहीं है। दरअसल, सूर्इं चुभाने वालों को सूईं ही याद रहती है। लोग बात सूर्इं की करते थे और यहां हीरा आ गया, लेकिन सूर्इं का भी कारखाना लगना चाहिए। कारोबारी से मैंने आग्रह भी किया है कि एक सूर्इं का कारखाना लगा दें। कितना पैसा लगता है, क्योंकि जब तक सूईं का कारखाना नहीं लगेगा, लोग बोलते ही रहेंगे। लालू कुछ भी बोले कम से कम एक हीरा तो नीतीश को यहां मिल ही गया।

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गडकरी की बारी -जवाब देने की तैयारी

क्या जमाना था ? सब सलाम करते थे। संघ की संगत में गडकरी का गढ़ अभेद था पर जमाने से ज्यादा अपनों की नजर लगी। ऐसी चाल चली कि ना तो किला रहा,ना कमल की ठेकेदारी। बेचारे भूतपूर्व तो हो गए पर राजनीति का चस्का छूटता थोड़े ही है। पार्टी के नाथ तो अब असली नाथ हैं, पार्टी में कोई खास ओहदा भी नहीं है। अब करें तो क्या करें? खाली तो बैठा नहीं जा सकता। दिल्ली नहीं रही तो कोई बात नहीं मुंबई तो है। कमल वाली फौज अपनी ना रही तो कोई बात नहीं कम से कम ठाकरे परिवार तो है। नितिन बाबू अब तेड़ा तीन ठाकरे परिवार को एक करेंगे। दोनों भाईयों को मिलाएंगे। राजनीति में यही बड़ा काम करने व दिल्ली वालों की नकेल कसने की गोटी वो खेलेंगे।

चाल तो दूर की सोची है। दोनों ठाकरे बंधु अलग हैं तब इतनी धमक है अगर नितिन की बीन पर दोनों एक हो गए तो फिर कहने ही क्या? महाराष्ट्र की राजनीति में फिर सितारा बुलंद। दिल्ली वाले उन पर आश्रित। फिर आंख दिखाने और सबको हैसियत बताने का मौका मिलेगा। सोने पर सुहागा ये कि ठाकरे परिवार की दोनों सेनाएं भी अपनी। धंधा महाराष्ट्र में है तो कोई रोकने,टोकने और बोलने वाला भी नहीं। समझ तो दिल्ली के नाथ भी रहे हैं पर कर भी क्या सकते हैं? संघ का साथ जो है।

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जीत में छिपा हाथ के दर्द का राज

कर्नाटक में मिली जीत से कांग्रेस खेमे में खुशी से ज्यादा चिंता का माहौल है। होना चाहिए था खुश, हैं दुखी। कारण बस इतना है कि कांग्रेसियों को ये एहसास है कि ये कांग्रेस की नीतियों की जीत नहीं बल्कि भाजपा के भ्रष्टाचारियों की हार है। अगर कर्नाटक की जनता का आदेश भ्रष्टाचारियों के खिलाफ है तो फिर हाथ वालों का क्या होगा? यही तो डर कांग्रेसियों को सता रहा है। अगर लोकसभा में भी यही हुआ तो। इस ‘तो’ ने ही हालत खराब कर दी है। सख्त संदेश देने की कोशिशें हो रही हैं। छोटी गलती पर बड़ों को बाहर करने की बात भी हो रही है लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि पिछले कारनामों का हिसाब तो जनता मांगेगी ही। नौ साल में दामन पर करप्शन के जो गहरे दाग लगे हैं वो दो मंत्रियों के इस्तीफे और कड़े तेवर दिखाने भर से धुलने वाले नहीं है। दिक्कत एक हो तो सब्र कर लिया जाए पर हाथ वाली पार्टी का आलम तो ये है कि वो एक पैर कीचड़ से निकालती है और दूसरा कीचड़ में फंस जाता है।रोज धोने बैठो तो खतरा, ना धोओ तो खतरा। इसी चक्कर में हाथ की हालत खस्ता है। कुछ और को निपटाने की तैयारी है। फैसला यही है कि दस को निपटाने से बेहतर है जिसके राज में हुए उसे निपटा लो। संदेश ठीक होगा। यानि सरदार जी को।

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तोते की आजादी की अब क्यों याद आईranjeet

सत्ता के गलियारों से ज्यादा अफसरशाही में ये बात उठ रही है कि आखिर तोता पिंजरे से आजाद क्यों होना चाहता है? क्या उसे खुली हवा लग गई है? यह भी लोग कह रहे हैं कि आखिर सीबीआई मुखिया को इतना जोश आया कैसे? क्या वास्तव में वो करप्शन के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं या कोई निजी खुंदक है? अगर करप्शन के खिलाफ वो हैं तो यकीनन तारीफ के काबिल हैं पर जिस तरह का इतिहास इस देश में अफसरशाही का रहा है तो ये शक होना लाजिमी है कि आखिर इतने दिन तक तोता पिंजरे में रहने के लिए आतुर क्यों था? अमूमन चुनाव से पहले या सही समय पर तमाम अफसरों ने इस तरह के धमाके किए कि उन्हें फिर राजनीतिक दलों में शरण मिल गई। कोई चुनाव लड़ा तो किस्मत के धनी सीधे राज्यसभा में। कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि सिन्हा साहब(रंजीत सिन्हा, सीबीआई निदेशक) क्योंकि ज्यादा दिन हैं नहीं लिहाजा चुनाव से पहले वो कमल खिलाएंगे। ठीक ऐेसे ही जैसे कैग के मुखिया नेता बनने जा रहे हैं। सिन्हा साहब के मामले में तो यहां तक कहा जा रहा है कि हर उस शख्स को उन्होंने निशाना बनाया जिसने कभी उनकी मुखालाफत की थी। यानि सारे गुण नेताओं के हैं। रेलवे पर गाज उनकी इसलिए गिरी कभी यहीं से ममता जैसी ईमानदार नेता ने उन्हें हटाया था। कहने वाले तो कह ही रहे हैं कि उनकी जायदाद भी खंगाल ली जाए तो राज खुल जाएंगे। कांग्रेसी जुटे होंगे।

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