दिल्ली सलतनत: सुर सुंदरी, डागा क्यों भागा, माया-नसीम

सुर, सुरा और सुंदरी का तो ये देश पुराना कद्रदान रहा है। यौन अपराधों में अव्वल। गाने में अव्वल। पीने में तो महा अव्वल। अब बनती हैं तो पीते हैं। पीते हैं तो जीते हैं।

बब्बर का राज

बब्बर का राज

चुनावी चंदे के लिए पियक्कड़ों पर गाज

सुर, सुरा और सुंदरी का तो ये देश पुराना कद्रदान रहा है। रजवाड़ों के समय की बाकी परंपराओं का पालन भले ही भारतीयों ने ना किया हो लेकिन मजाल की कोई बुरी आदत अपनाने से बाज आए हों। यौन अपराधों में अव्वल। गाने में अव्वल। पीने में तो महा अव्वल। अब बनती हैं तो पीते हैं। पीते हैं तो जीते हैं। अगर जीने का मसला खड़ा हो जाए तो भला मदिरा बनाने वाले इसका फायदा क्यों नहीं उठाएंगे? जान की कीमत तो देनी ही पड़ेगी। डाक्टर को कम और दारू बनाने वालों को ज्यादा। सर्दियों में अंग्रेजी शराब और गर्मियों में बीयर के दाम देश के किसी राज्य में ना बढ़ें ऐसा हो कहां सकता है? फिर दिल्ली में तो सस्ती मिलती है लिहाजा पियक्कड़ ज्यादा। खपत ज्यादा। तो दाम भी तो ज्यादा ही बढ़ेंगे। पर इस बार दारू पर दाम बढ़ाने का एक और भी कारण है। दिल्ली के चुनाव।सत्ता के गलियारों से निकलकर आ रही खबरों के मुताबिक हाथ वाली पार्टी की दिल्ली की मालकिन को ही फिर आगे किया जाएगा। चुनाव में उनका ही चेहरा आगे। चेहरे को साफ सुथरा दिखाने के लिए धन चाहिए। बिना धन तो वोट मिलता नहीं। लिहाजा हो गई शराब कारोबारियों से डील। तुम मुझे धन दो, मैं तुम्हें शराब की ज्यादा कीमत दिलवाऊंगी। बढ़ गए शराब और बीयर के दाम। पियक्कड़ों को भी कुछ तो चुनावी चंदा देना ही चाहिए।

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मुकाबला टेस्ट का, रणनीति 20-20 कीpanwar

किसी जमाने में कमल के दो भी नहीं हुआ करते थे। सौ भी हुए और तकरीबन 200 तक भी पहुंचे। राजकाज तो मिला पर संभालना नहीं आया। दिक्कत कमल वालों की यही है कि उनकी टाइमिंग कभी सही नहीं रहती। टाइमिंग समय पर सही फैसले पर निर्भर होती है। जिस मसले को भुनाकर सत्ता में आए फिर चेहरे से सांप्रदायिकता का मेकअप हटाने में जुट गए। जब सारा देश मानने लगा कि हां सुधर गए हैं तो फिर उस राह पर चलने की तैयारी करने लगे। खेल टेस्ट रहे हैं और फैसले 20-20 के ले रहे हैं। 21 साल बाद फिर पुरानी डगर पर चल रहे हैं। कमल वाले ये भूल रहे हैं कि तब उनके पास अटल थे। जो अटल रहा करते थे। अब कौन है? अगर यही बात पूछो तो कहेंगे कि मैं हूं ना। ठाकुर साहब की ठकुराई फिर हिलौरे ले रही है। गांधी खानदान के बेदखल चिराग को ही चेहरे के रूप में आगे ला रहे हैं। कह रहे हैं कि जो बचा है सब वोट के रूप में लूट लो। सारथी बनेंगे मोदी साहब के चहेते शाह जी। अब शाह हैं तो जाहिर सी बात है कि खजाने में तीर तो बहुत होंगे। चुनावी रथ को बाहर से रास्ता बताते और दिखाते चलेंगे नरेंद्र मोदी। तो सोचिए क्या सीन होगा? कुछ हो या ना हो पर बिना यूपी पहुंचे ही कम से कम मोदीचुनाव के केंद्र तो बन ही गए हैं। यही तो कमल वाले सारी ठाकुर साहब चाहते थे। हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने में फिर कोई परहेज नहीं। जो हो सो हो पर राज दो।

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अब आया बब्बर का असली राज

राजबब्बर को तो सब जानते ही हैं। नेता के रूप में कम और अभिनेता के नजरिए से ज्यादा। वो कहने को तो हाथ के सांसद हैं लेकिन रुतबा ज्यादा नहीं रहा है। इससे ज्यादा तो वो नेताजी के जमाने में ताकतवर थे लेकिन आजकल महादेव रोड के बीस नंबर बंगले की रौनक अब कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। पहले वो कार्यसमिति के सदस्य थे लेकिन आजकल वो हाथ वाली पार्टी के प्रवक्ता भी हैं। कांग्रेस में देश चलाने के रास्ते इसी तरह से खुलते हैं। एक आदमी किसी एक जनम में आखिर क्या क्या हो सकता है? बब्बर साहब इसके सबसे सटीक उदाहरण हैं। वे राजनेता भी हैं, अभिनेता भी हैं और जन नेता भी। उत्तर प्रदेश की घनघोर जातिवादी राजनीति के बीच राज बब्बर जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, उस पंजाबी समुदाय की आबादी तो वहां एक प्रतिशत भी नहीं है। फिर भी वे फिरोजाबाद से जीते, जहां की चूडिय़ां पूरी दुनिया में मशहूर हैं। उनकी राजनीति चमकी तो बहुत, पर वह चमक इतनी चमत्कृत कर देनेवाली चकाचौंध भरी कभी नहीं थी। पर, आज राज बब्बर को देश के सर्वोच्च सत्ता की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी का विश्वास हासिल है और राहुल गांधी भी उनकी बात पर भरोसा करते हैं। मतलब साफ है कि वर्तमान तो अच्छा है ही, भविष्य भी उज्ज्वल लग रहा है। संबंधों के समानांतर संसार की संकरी गलियों में रिश्तों की राजनीति के राज, राज बब्बर अच्छी तरह जानते हैं।

माया नहीं, नसीम नहीं तो फिर दोष किसका?

राजनीति की माया ही निराली है। आंकड़ों का खेला है। दुश्मनी नजर आती है लेकिन परदे के पीछे से जो निकलकर आता है वो हैरतअंगेज होता है। देख लीजिए-बहन जी के खिलाफ नेताजी की पूरी फौज पड़ी रहती थी। कोस-कोस कर सत्ता भी मिल गई। पहले मूर्तियों के लिए बहनजी को जिम्मेदार ठहराते थे अब राज पाने के बाद बहन जी को लोकायुक्त ने बेदाग करार दे दिया और बहन जी के दाएं-बाएं हाथ नसीम साहब को नेताजी के बेटे नहीं छेडऩा चाहते। सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्यों? जिसका राज था, घोटाले की जिम्मेदारी तो मुख्यमंत्री की ही होगी। या फिर जिस मंत्री के हाथ से सब हुआ वो बेदाग कैसे हो सकता है? लोकायुक्त कह रहे हैं कि नसीम समेत दस पूर्व मंत्री दोषी हैं पर बाकी की तो नहीं लेकिन सत्ता के गलियारों से खबर निकल रही है कि नसीम के प्रति अखिलेश का प्रेम उमड़ रहा है। प्रेम का कारण ये भी बताया जा रहा है कि कहीं ना कहीं मूर्ति घोटाले के तार अखिलेश के दरबारियों से भी जुड़े हैं। दरबारियों के साथ-साथ नसीम को ना छेडऩे का कारण मुस्लिम वोट बैंक भी माना जा रहा है। नसीम को छेडऩे से नेताजी ने रोका है। ऐसा पार्टी वाले ही कह रहे हैं। वो ये भी कहते हैं कि अगर ये दोनों बेदाग हैं तो फिर तो हाथी वाले सारे ही सही हैं।

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अब ट्वीट-ट्वीट खेलेंगे भाजपा नेता

समय मोदी का है। सुशील मोदी का नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी का। पार्टी भी पीछे, कार्यकर्ता भी पीछे और कमल वालों को एहसास है कि देश भी पीछे होगा। पहली बार वो संसदीय समिति की बैठक में आए तोmodi जीत का मंत्र उन्होंने सोशल मीडिया को बताया। यूथ पार्टी से दूर है और उसे पटाने का ये सबसे आसान तरीका। पार्टी ने भी देर नहीं की। तुरंत हां कह दी। अब भाजपा मोदी के हवाले पीएम पद करे न करे लेकिन उस सोशल मीडिया की दुनिया को मोदी के हवाले कर दिया है जिस सोशल मीडिया में मोदी पहले ही पीएम घोषित किये जा चुके हैं। इतना ही नहीं ये ठेका भी उसी अमेरिकी कंपनी को दिया गया है जिसके पास पहले ही मोदी की इमेज बनाने का जिम्मा है। दुनिया की सबसे प्रभावशाली जनसम्पर्क कंपनियों में से एक एपीसीओ वल्र्डवाइड दुनिया के हर हिस्से में अपना पीआर कारोबार करती है। तो सोच लीजिए आने वाले समय में सोशल मीडिया पर किसकी इमेज बनेगी? कमल की या मोदी की? कमल वाले तो पहले से ही सोशल मीडिया पर हैं। सारे बड़े भी और छोटे भी लेकिन अब तो मोदी को कोई रोकने वाला भी नहीं। ऊपर से पार्टी एक कमेटी भी बना रही है जिसमें दस सदस्य होंगे। इसके पास संचार और प्रसार का जिम्मा होगा। ये सब अलग से मोदी के पास होंगे। सब मिलेगा। हो सकता है तीर निशाने पर लगे।

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डागा इसलिए सीबीआई से दूर भागा

दरअसल हमारे देश में किसी पर आरोप लगाना तो बेहद आसान है। अंदर कराना उससे भी ज्यादा आसान। पर आरोप साबित कराना मुश्किल। सजा दिलाना तो और भी मुश्किल। समय पर न्याय तो लगभग नामुमकिन। जिस समय मामा के प्यारे भांजे को सीबीआई ने घूस कांड में पकड़ा तो ऐसा लगा कि मामा तो कंबल ओढक़र घी पी रहा था। राज गया। सीबीआई की वाह-वाह हुई पर कितने दिन। जो इस देश में होता आया है इस मामले में तो वही अब होना शुरू हुआ है। सीबीआई के जोश की सारी हवा निकलती नजर आ रही है। हाथ वालों ने या कहा जाए कि मामा के अपनों ने रसूख का ऐसा इस्तेमाल किया कि जिस सुशील डागा के भरोसे वो मामा के प्यारे भांजे को जेल में ही रखना चाहती थी वही डागा सरकारी गवाह बनने से साफ मुकर गया। अब लो कर लो बात। जब तक सरकारी गवाह बनने की बात होती रही तब तक वो बाहर था पर जैसे ही माना तो तुरंत पुलिस ने उसे अंदर कर दिया। अब अंदर करने से कोई फायदा नहीं क्योंकि जो होना था वो हो चुका। सीबीआई के पास केवल बातचीत के टेप ही सबूत हैं। कोर्ट मानेगी या नहीं कौन जाने?कोई गवाह तक नहीं। दरअसल डागा इसलिए भागा क्योंकि उसे अंजाम का एहसास हो चुका था। अब सीबीआई का अंजाम?

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