दीवार पर लिखी इबारतें कुछ तो कहती हैं !

हाजीपुर के दिग्घी रेलवे क्रॉसिंग पर एक हॉर्डिंग में राबड़ी देवी दोनों हाथों से आंचल फैला कर जनता से मुखातिब हैं- कह रही हैं ‘फैसला आप करें’! बैकग्राउंड में लालू प्रसाद जेल की सलाखों से जनता की तरफ उम्मीद भरी नजरों से एक टक निहार रहे हैं.

भीड़  जो कुछ कहती है

भीड़ जो कुछ कहती है

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

दिग्घी क्रॉसिंग पर सोनपुर की दो महिलायें मालती और सरस्वती इस हॉर्डिंग के सामने रुक गयी हैं. उन्हें बस आज ही पता चला है कि लालू प्रसाद जेल में डाल दिये गये हैं. मालती हॉर्डिंग पर लिखी इबारत को तटोल-तटोल कर पढ़ते हुए सरस्वती को सुना रही है. कह रही है कि गरीबों के मसीहा को झूठे मुकदमें में फंसा कर जेहल( जेल) में बंद कर देलौ. सरस्वती यह सुन कर सकते में हैं. वह राबड़ी देवी की तस्वीर को देखते हुए कहती हैं- एक दम दुबली हो गयी हैं. पहले इनका चेहरा गुलाब की तरह खिला था. अब पति के वियोग में ऐसा हो गयी हैं.

संकट जो वरदान भी है

बिहार भर में यही हॉर्डिंग लगे हैं. यह हॉर्डिंग दीवार पर लिखी इबारत की तरह है, इसमें भावनायें अपने चरम पर हैं. आम जमीनी लोगों के दिलों को छू जाने वाली. लालू प्रसाद चारा घोटाला मामले में जेल में हैं. यह राष्ट्रीय जनता दल के लिए त्रास्दी है पर राजनीतिक रूप से एक अवसर भी, वरदान भी. यह त्रास्दी अवसर और वरदान के रूप में इस शर्त पर बदल सकती है जब राजद का नेतृत्व इस मर्म को समझे और राज्य के अवाम को इस मर्म को समझाये. इस लिहाज से, लगता है कि तेजस्वी यादव ने अपने पिता के राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े संकट को वरदान के रूप में लेने का मनोविज्ञान समझ लिया है.

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वह पिछले छह सात महीने से मैदान में हैं. बिहार के कोने कोने में जा कर वह जनता से सीधे मुखातिब हो रहे हैं. मां राबड़ी भी कई जगह उनका साथ दे रही हैं. कई जगह तो तेजस्वी और राबड़ी के साथ तेज भी रहा करते हैं. पूरा परिवार लालू की रिहाई के लिए जनता के फैसला पर ही अब भरोसा कर रहा है क्योंकि उनके ही शब्दों में कुछ सामंती ‘साजिशकर्ताओं’ ने गरीबों के ‘नायक’ को फंसा दिया है.

चालीस जनसभायें

एक अंतर्मुखी युवा, जिन्हें सार्वजनिक जीवन का कोई अनुभ नहीं. तब पब्लिक और मीडिया में बात कहनी हो तो चेहरे की मासूमियत व झिझक को लोग भांप जाते थे. अब छह महीने में स्थितियां बदल गयी हैं. तेजस्वी ने इन छह महीनों में 40 से ज्यादा सभाओं को संबोधित कर लिया है. अब तो वह भीड़ के मनो विज्ञान को भी समझ चुके हैं. आत्मविश्वास बढ़ चुका है. वह नौकरशाही डॉट इन को बताते हैं “जर्बदस्त आत्मविश्वास बढ़ा है, मेरा भी और मेरे प्रति लोगों का विश्वास भी”. वह एक जनसभा की घटना बताते हुए कहते हैं- “सभा में हमारे कई नेता थे. सामने हजारों की भीड़ थी, ऐसी भीड़, ऐसा उत्साह कि मैं क्या बताऊं. हमारे वरिष्ठ नेता भाषण दिये जा रहे थे. शोर थमने का नाम नहीं ले रहा था. लेकिन जब मैंने माइक थामा तो खुद मैं भी आश्चर्य में पड़ गया- पिनड्राप साइलेंस”.

संजय यादव: पर्दे के अंदर की रणनीति

संजय यादव: पर्दे के अंदर की रणनीति

परिवर्तन रैली, युवा सम्मेलनों के बाद अब युवा चेतना सम्मेलनों का दौर जारी है. जिलों कस्बों तक में सम्मेलनों में उमड़ती भीड़ तेजस्वी के प्रति बढ़ते आकर्षण को बताता है. पर इसे ही कामयाबी समझ लेना जल्दबाजी होगी. खुद इसे राजद के युवा रणनीतिकार भी मान रहे हैं. संजय यादव युवा रणनीति कारों में राजद का ऐसा चेहरा हैं, जो अमूमन पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं. राजनीतिक, सामिजक और रणनीतिक मुद्दों की गहरी परख रखने वाले संजय कहते हैं- हम लोगों के बीच जा रहे हैं. उनसे फिडबैक ले रहे हैं, यह एक काम है. पर राजद के सांगठनिक नेटवर्क को मजबूती देना हमारी प्राथमिकता है. हमने पिछले छह महीने में इसे काफी विस्तार दिया है.

संजय की इन बातों में उनका उत्साह तो दिखता ही है पर साथ ही संभावित चुनौतियों को भी वह समझने लगे हैं. वह कहते हैं हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ते रहेंगे जो राज्य के गरीबों, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यों के हितों की ओर पहुंचती हो.

ऐसा नहीं है कि तेजस्वी सम्मेलनों में लालू प्रसाद के जेल जाने के मुद्दे को ही सिर्फ जनता के सामने रख रहे हैं. वह राज्य के कानून व्यवस्था, अपराध, भ्रष्टाचार गरीबों के शोषण जैसे ज्वलंत मुद्दों पर भी नीतीश सरकार पर हमला बोल रहे हैं.

चुनौतियां

तेजस्वी, नीतीश के कथित सुशासन और राजद के पंद्रह साल के कथित जंगल राज के आरोपों के काट पर भी गहन मंथन में लगे हैं. वह महसूस करते हैं कि पिछले आठ सालों में नीतीश सरकार ने लालू-राबड़ी सरकार को निकम्मी सरकार कह के दुष्प्रचारित करने की हर संभव कोशिश की है. इसलिए जनता के सामने आंकड़ों की सच्चाइयां भी वह सामने लाने में जुटे हैं. तेजस्वी कहते हैं- मौजूदा सरकार ने मीडिया के माध्यम से लोगों को गुमराह किया है. हम राजद सरकार की एक एक योजना और काम को तथ्यपरक रूप से सामने लाने में जुटे हैं. वह आगे कहते हैं- जब मैदान में कूद पड़े हैं तो हर आवश्यक हथियार और उसकी धार को पिजाने में भी लगे हैं.

पिछले कुछ सालों में राजनीति की दशा और दिशा में काफी बदलाव आया है. नये सामाजिक समिकरण और मुद्दें उभर कर सामने आये हैं. ऐसे में राष्ट्रीय जनता दल को इन पर विचार करना होगा और उन्हें चैलेंज के तौर पर लेना होगा. साथ ही राजद की अंदर की खृद काफी चुनौतियां हैं जब फिलहाल भले सामने नहीं आ रही हों पर हैं. राजद अपने संगठन को न सिर्फ मजबूत करे बल्कि संगठन में मौदूद जनाधार वाले नेताओं को तरजीह भी देनी पड़ेगी. आने वाले दिनों में राजद इन मुद्दों पर क्या करता है यह देखने वाली बात होगी.

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