देवयानी मामला: यह अमेरिकी दबंगयी है!

पूर्कंव विदेश सचिव कंवल सिब्बल इस लेख में अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी खोप्रागड़े के साथ हुई बदसुलूकी को अमेरिकी दबंगयी बताते हुए कह रहे हैं कि वे कानूनी की अवहेलना करते हैं.Devyani_Khobragade

भारत की उप वाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े की न्यूयॉर्क में इस तरह से गिरफ्तारी हुई और उनसे पूछताछ की गई, जैसे उन्होंने कोई गंभीर अपराध किया हो। अमेरिका का यह रवैया भारत-अमेरिका द्विपक्षीय समीकरणों पर गंभीर सवाल उठाता है। साथ ही, राजनयिक संबंधों पर आधारित वियना समझौते की इकतरफा अमेरिकी व्याख्या पर भी प्रश्न खड़ा करता है।

इस मामले में अमेरिकी अधिकारियों ने लगातार बदसलूकी की। इन हरकतों के क्या-क्या कूटनीतिक परिणाम हो सकते हैं, इनकी भी अनदेखी की गई। इस स्थिति को टाला जा सकता था, क्योंकि देवयानी मामले में कुछ भी ऐसा नहीं था, जो उन्हें यह कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर करता। वहां के नियमों के मुताबिक, नौकरानी को न्यूनतम मेहनताना न दिया जाना एक असहनीय मसला है, अगर अमेरिकी अधिकारियों को ऐसा लगता था, तो वे राजनयिक के निष्कासन की मांग कर सकते थे। इसकी बजाय उन्होंने देवयानी खोबरागड़े के खिलाफ खुद ही मामला दर्ज किया। नौकरानी ने देवयानी के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। अमेरिकी अधिकारियों ने यह आरोप लगाया कि गलत मेहनताने की घोषणा कर उन्होंने वीजा मामले में धोखाधड़ी की है। इस तरह से उन्होंने अपने सख्त कदम को कानूनी कवच प्रदान करने के रास्ते निकाले।

बवजह का बवाल

इस मामले में बेवजह का बवाल ज्यादा है। भारतीय राजनयिक घरेलू कर्मचारियों को न्यूनतन जरूरी वेतन शर्त के साथ अमेरिका तब ले जाते हैं, जब सभी संबंधित महकमे को मालूम होता है कि यह सब कागजी खानापूर्ति है, जो पूरी हो चुकी है। इन संबंधित महकमों में अमेरिकी वीजा सेवा और विदेश विभाग शामिल हैं। यह सोचना कि अमेरिकी अधिकारी इस झांसे में रहते हैं कि भारतीय राजनयिक अपने घरेलू कर्मचारी को अधिक पैसे दे रहे हैं, एकदम हास्यास्पद है। अमेरिकी प्रशासन वर्षों से इसी तरह वीजा देता रहा है। अमेरिकी कानून और मौजूदा सच्चाई के बीच के विरोधाभास को उसके अधिकारी व्यावहारिक समझ से हल करते आए हैं। अमेरिका की तरफ से कभी यह चिंता नहीं दिखाई गई कि इससे भारतीय राजनयिकों को मुश्किल कानूनी नतीजों का सामना करना पड़ सकता है। न ही मैत्रीपूर्ण तरीके से इस चिंता को अधिकारी स्तर पर उठाया गया, जबकि हम अपने द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए कई तरह की बातचीत आयोजित करते हैं। यह भी अजीब है कि अमेरिकी अधिकारी पहले घरेलू कर्मचारियों को सरकारी का दर्जा देते हैं और बाद में यह दर्जा छीनकर उन्हें रोजगार के स्थानीय नियमों के दायरे में ले आते हैं। वे घरेलू कर्मचारियों को सरकारी का दर्जा इसलिए देते हैं कि उनका वीजा राजनयिक पासपोर्ट से संबद्ध होता है।

लेकिन वे यह जोर नहीं डालते कि इसे सामान्य पासपोर्ट से संबद्ध रखा जाए। वियना समझौते में यह नहीं है कि अपने घर से लाए गए घरेलू कर्मचारी को स्थानीय अमेरिकी कर्मचारियों की तरह दर्जा देना होगा।
देवयानी मामले का दूसरा हास्यास्पद अर्थ यह निकलता है कि किसी भी भारतीय नागरिक को, जो वीजा आवदेन पर गलत जानकारी मुहैया कराता है, अमेरिकी अधिकारियों की मर्जी से वहां की जेलों में धकेला जा सकता है। अमेरिका इसमें कुछ नैतिक रूप से गलत नहीं पाता है कि हमारे राजनयिकों व भारत स्थित सेवा से जुड़े हमारे कर्मचारियों को उनके समकक्षों की तुलना में कहीं कम वेतन मिलता है। परंतु यदि हमारे घरेलू कर्मचारियों को अमेरिकी मानकों के हिसाब से कम वेतन मिले, तो वह उसे नैतिक अत्याचार बताता है। उनकी नैतिकता या संवेदनशीलता तब नहीं जागती, जब उनके अपने राजनयिक भारतीय स्टाफ को गुलामों जैसी मजदूरी देते हैं, जबकि इन्हीं अधिकारियों को भारत जैसे ‘मुश्किल’ क्षेत्र में काम करने के लिए अमेरिकी सरकार अतिरिक्त रकम देती है।

अमेरिकी अपने हिसाब से अंतरराष्ट्रीय कानून मानते हैं और उनकी अवहेलना करते हैं। वे वियना समझौते की गलत व्याख्या करते हैं और इसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संगठन में चुनौती नहीं दी जा सकती। ताकतवर देश अपनी व्याख्या पर अड़े रहते हैं और कमजोर देश उनके मुताबिक खुद को व्यवस्थित करते हैं।

अमेरिका दूसरे देशों के सामने हमेशा कूटनीतिक संरक्षण की बात करता है। यह संरक्षण दूसरे देशों के लिए भी है। लेकिन दूसरों देशों में जहां उसके लोग हैं, वहां तो वह पूर्ण संरक्षण का अधिकार चाहता है। रेमंड डेविस का मामला इसका उदाहरण है। सीआईए का यह कॉन्ट्रेक्टर लाहौर में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास से जुड़ा था और इसने दो पाकिस्तानियों की हत्या कर दी थी।

अपने लिए संरक्षण

सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी अधिकारी रूस या चीन के राजनयिक के साथ वैसा ही बर्ताव करते, जैसा कि उन्होंने हमारी राजनयिक के साथ किया? जान लें कि उन्होंने हाल ही में कई रूसी राजनयिकों को निष्कासित किया है, मगर उनकी गिरफ्तारी नहीं की। उनके खिलाफ अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा से संबंधित धोखाधड़ी का मामला था। यह एक अपराध था, क्योंकि इससे अमेरिकी राजस्व को नुकसान पहुंचता है। हमारी उप वाणिज्य दूत अपनी नौकरानी को न्यूनतम वेतन नहीं देती थी, इससे अमेरिकी राजस्व का तो कुछ घटता नहीं है। साफ है, अमेरिका उन देशों के प्रति अधिक सतर्क रहता है, जहां दांव पर उसका बहुत कुछ लगा हो या जहां बदले की कार्रवाई अधिक वास्तविक हो।

मौजूदा दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण भारत के प्रति उसके सम्मान में कमी को उजागर करता है और उसके इस विश्वास को भी प्रकट करता है कि हम ठोस जवाब नहीं देंगे। अमेरिकी विदेश विभाग खेद जताने की जगह इस तरह की बातें कर रहा है कि ऐसी घटना से द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। भारत में घरेलू कर्मचारियों के साथ बदसलूकी के अनगिनत मामले हैं। इसी तरह विदेशों में भी कुछ घटनाएं घटी हैं। इन कारणों से यह मामला लोगों की समझ में पूरी तरह से नहीं आ रहा है। वह महिला राजनयिक, जिनका कूटनीतिक पासपोर्ट जब्त हुआ, लंबे समय के लिए पीड़ा में चली गई हैं। अपने राजनयिकों के प्रति जो भी पूर्वाग्रह और शिकायतें हों, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे राजनयिक विदेश में देश की संप्रभुता के प्रतिनिधि हैं। उन्हें नीचा दिखाना भारत और उसकी संप्रभुता को नीचा दिखाना है।
सरकार ने अमेरिकी कार्रवाई को ‘अस्वीकार्य’ बताकर सही किया है। ठोस जवाबी कार्रवाई जरूरी है, ताकि यह संदेश उन तक पहुंचे कि राजनयिकों को अपमानित करने की कीमत चुकानी पड़ती है। कुछ कदम उठाए जा चुके हैं। अमेरिकी सरकार के कर्मचारियों को भारत में जो विशेषाधिकार हासिल हैं, उनकी समीक्षा की जानी चाहिए। अपने अहंकारी रवैये के कारण अमेरिका पहले से ही निशाने पर है और उसके प्रति भारतीय विदेश सेवा की नाराजगी खदबदा रही है।

नोट- अदर्स वॉयस कॉलम के तहत हम अन्य अखबारों का लेख छापते हैं. यह लेख हिंदुस्तान से साभार

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