‘दैनिक जागरण’ ने फिर किया पत्रकारिता को शर्मशार

पटना ब्लास्ट की उलझती गुत्थियों को सुलझाने में एनआईए और बिहार पुलिस के पसीने छूट रहे हैं.यह इतना घनचक्कर बनता जा रहा है कि खुद एनआईए जैसी देश की सबसे बड़ी एजेंसी पशोपेश में है.JAGRAN

ऐनुल, तहसीन, गोपाल, विकास और आयशा के चक्रव्यूह के आगे एनआईए के अनुसंधान की रिसर्च थ्यूरी अभी तक सफल नहीं हो सकी है लेकिन दैनिक जागरण ने 15 नवम्बर के पटना संस्करण के पेज एक पर , ‘गांधी मैदान को मिला मालिक’ शीर्षक से लिखी खबर में पटना ब्लास्ट पर उस एजेंसी के नाम की घोषणा कर दी है जिसने सीरियल ब्लास्ट किया था.

उसने खबर को आगे बढ़ात हुए लिखा है— “भाजपा की हुंकार रैली के दौरान गांधी मैदान में हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद इसकी सुरक्षा को नई चुनौती मानते हुए सरकार ने कई फैसले किए हैं। हुंकार रैली (27 अक्टूबर) में इंडियन मुजाहिदीन द्वारा किए गए सीरियल ब्लास्ट के बाद गांधी मैदान की सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ी हुई है……”

अखबार ने जिस तरह से इंडियन मुजाहिदीन का नाम लिया है, वह न सिर्फ पत्रकारिता का अपमान है बल्कि खुद एनआईए और बिहार पुलिस के सर को झुकाने वाला है क्योंकि धमाकों के सिलसिले में अभी तक जांच एजेंसियां कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन जागरण को यह पता चल चुका है कि इसके पीछे कौन है.

अगर जागरण ने सचमुच अपने खोजी पत्रकारों के माध्यम से धमाका करने वाले संगठन का पता लगा लिया है तो ऐसे में जांच एजेंसियों को जागरण अखबार का शुक्रगुजार होना चाहिए. लेकिन जागरण ने अभी तक ऐसा दावा नहीं किया है. अगर वह इस बात का दावा करता है तो नौकरशाही डॉट इन न सिर्फ अपनी इस टिप्पणी को वापस ले लेगा बल्कि अपनी इस गुस्ताखी पर उससे माफी भी मांग लेगा.

पत्रककारिता की पढ़ाई के दौरान , एक छात्र की हैसियत से हमें सिखाया जाता है कि जिस आरोप के बारे में कोई सुबूत न हो तो पत्रकार को “आरोपी” या “कथित” जैसे शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए. पर जागरण ने तो बेशर्मी की हदें पार कर दीं. उसने धमाके करने वाले संगठन का नाम ऐसे लिया जैसे उसके खोजी पत्रकारों ने सब कुछ पता कर लिया है. अगर उन्हें पता चल चुका है तो एक एक्सक्लुसिव रिपोर्ट में इस बात का दावा करना चाहिए ताकि इस देश का कुछ भला हो सके. पत्रकारिता का मान बढ़ सके.

जिस किसी संगठन ने धमाके किये हैं वह देश के, देश के तमाम नागरिकों के दुश्मन हैं. धमाकों में शामिल किसी संगठन, किसी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाना चाहिए. चाहे वह तहसीन हो, ऐनुल हो, गोपाल हो, विकास हो, कोई भी हो.

पर एक अखबार अगर इतनी घटिया पत्रकारिता करे तो यह पत्रकारिता का अपमान तो है ही समाज को गुमराह करने और समाज को विभाजित करने की यह मानसिकता और दिमागी दीवालियापन भी है. समाज के प्रबुद्ध लोगों को इसकी आलोचना करनी ही चाहिए.

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