दैनिक भास्कर: सफर एक साल का

दैनिक भास्कर पटना एडिशन ने  18 जनवरी को एक वर्ष पूरा कर लिया है.ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा की हिंदी पाठकों के सबसे बड़े गढ़ बिहार में इसने क्या खोया, क्या पाया.bhaskar

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

पिछले दिनों अपने एक विज्ञापन में दैनिक भास्कर ने यह बताया थ कि वह देश का सबसे बड़ा अखबारी समूह बन गया है. मतलब साफ कि उसने न सिर्फ देश के सबसे बड़े  हिंदी समाचार पत्र जागरण समूह को पीछे छोड़ दिया है बल्कि अंग्रेजी के टाइम्स ग्रूप से भी वह  आगे निकल चुका है. खैर यह तो हुआ अखबार का अपना दावा.

लेकिन पिछले वर्ष 2014 की 19 जनवरी को दैनिक भास्कर का पहला अंक पटना के पाठकों के हाथ आया तो हजारों लोगों ने इस उम्मीद में यह अखबार खरीदा कि वह जान सकें कि भास्कर अन्य हिंदी अखबारों से कैसे अलग है.

चूंकि भास्कर ने पटना में आने के बाद आक्रामक मार्केंटिंग पॉलिसी अपनाई और सबसे पहले उसने पाठकों की जेब पर निगाह दौड़ायी. इस तरह उसने पहले ही एक लाख पाठक रजिस्टर्ड कर लिया और पहले दिन इतनी कॉपी के साथ मैदान में उतरा, यह तो हुई मार्केटिंग की बात.

लेकिन पाठकों के लिए जो महत्वपूर्ण मामला है वह ये कि उसे अखबार सस्ते तो मिले ही गुणवत्तापूर्ण और निष्पक्ष पत्रकारिता भी मिले. जहां तक भास्कर की कीमत की बात है जब वह पिछले साल बाजार में आया तो उसके पहले से ही अखबारों ने अपनी कीमतें कम कर दीं और भास्कर के दबाव के कारण तमाम हिंदी अखबार सस्ते हो गये.

निष्पक्ष पत्रकारिता का दावा

लेकिन जहां तक निष्पक्ष पत्रकारिता के दावे की बात है, इस कसौटी पर भास्कर कितना खरा उतरा है यह प्रश्न अपने आप में काफी संवेदनशील है. वैसे भी इस कसौटी पर भास्कर को आजमाने के लिए उसके पाठकों से बेहतर कोई और नहीं हो सकता. लेकिन जहां तक मेरा निजी अनुभव है, मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि भास्कर के आने के पहले बिहार के हिंदी अखबारों पर यह वाजिब आरोप लगते रहे कि वे सत्ता के आगे नतमस्तक रहे हैं. ऐसे में भास्कर के आगमन से इतना तो जरूर हुआ कि पत्रकारिता में विवधता देखने को मिली और इसका प्रभाव तमाम अखबारों पर पड़ा.

टीम निर्माण

भास्कर ने पटना आगमन में जो महत्वपूर्ण रणनीति अपनायी उसमें एक यह रही कि उसने पहले से स्थापित अखबारों- जैसे प्रभात खबर और हिंदुस्तान से योग्य पत्रकारों को बुलाया और मजबूत टीम बनायी. इस मामले में जागरण को याद कीजिए, जब वह बिहार आया तो उसके एक तिहाई से ज्यादा पत्रकार यूपी से आये. लेकिन जब भास्कर पटना पहुंचा तो  यह पहली बार हुआ कि  बिहार के पत्रकारों को अच्छा अवसर मिला. पटना से नवभारत टाइम्स के प्रकाशन बंद होने के बाद यह पहला अवसर साबित हुआ जब पत्रकारों को काम करने के अवसर के साथ बढ़ी हुई सैलरी के  रूप में भी लाभ हुआ.

चैयरमैन की शाबाशी पटना टीम को

चैयरमैन की शाबाशी पटना टीम को

 

पत्रकारिता

निश्चित रूप से भास्कर के लिए पटना के कम से कम दो बड़े अखबार- हिंदुस्तान और दैनिक जागरण के मजबूत किले की दीवार को दरकाना चुनौती थी. हालांकि इस चुनौति को  भास्कर  ने कम से कम पत्रकारिता, लेखनी और रिपोर्ट के स्तर पर तो जूरूर चुनौती दी लेकिन यह भी सही है कि बाकी के दोनों अखबारों ने भी इस चुनौती से निपटने की कोई कसर नहीं छोडी. पिछले एक साल में ऐसा कई बार हुआ जब अखबार ने हार्ड न्यूज के मामले में दोनों बड़े अखबारों को पीछे छोड़ा तो कई बार खुद भी पिटा. लेकिन पाठकों की सबसे ज्यादा उम्मीदें इस बात पर टिकी रहीं कि इसने कोई ब्रेकिंग न्यूज की या नहीं. निश्चित रूप से अखबार ने इस मामले कई ऐसे काम किये जिसे सराहना मिली. लेकिन इस मामले में अखबार को और मेहनत करने की जरूरत है.

अखबार का दावा

लेकिन एक साल के सफर में भास्कर के अंदरूनी सूत्रों का जो दावा है वह चौंकाने वाला है. अखबार के अंदर के सूत्रों का कहना है कि भास्कर फिलवक्त एक लाख 20 हजार से कुछ ज्यादा कॉपी बाजार को भेज रहा है. यानी उसके पटना एडिशन का सर्कुलेशन हिंदुस्तान और जागरण के पटना एडिशन से भी ज्यादा हो चुका है{  यह हमारा दावा नहीं है, बल्कि अखबार का कहना है }.

आने वाली चुनौतियां

कहा जाता है कि किसी प्रभावशाली मीडिया के लिए निष्पक्ष पत्रकारिता करना तलवार की धार पर चलने के समान है.और आम तौर पर किसी अखबार के लिए पत्रकारिता से जुड़ी चुनौतियां एक वर्ष पूरे कर लेने के बाद शुरू होती है.एक वर्ष पूरे होने के बाद उसे सरकारी विज्ञाप मिलने लगते हैं. ऐसे में विज्ञापनों का खेल अगर किसी अखबार की निष्पक्ष पत्रकारिता न डिगा पाये तो समझिये कि उस अखबार की विश्वस्नीयता लोगों में बढ़ेगी. ऐसे में भास्कर ने जब एक वर्ष पूरा कर लिया है तो उसके लिए उसकी पत्रकारिता ही खुद उसके लिए चुनौती है. अब आने वाले दिनों में देखना होगा कि भास्कर अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता के दावे को कैसे और कितनी बेबाकी से आगे बढ़ाता है. खास तौर पर तब जब 2015 चुनावी वर्ष के रूप में सामने खड़ा है.

यहां एक बात याद दिलाने की है कि कुछ साल पहले भास्कर ने अपना एडिशन रांची से शुरू किया. पर साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील मुद्दे पर रांची भास्कर, पाठकों की विश्वसनीयता बटोरने में एक हद तक नाकाम रहा. लेकिन पटना भास्कर ने इस मामले में अपनी विश्वस्नीयता को काफी हद तक मजबूत किया है.

 

भास्कर का  प्रयोग

भास्कर ने पिछले साल रावण दहन हादसे के की रात एक टीम भावना का परिचय दिया. उस दिन अखबार में छुट्टी थी लेकिन इतने बड़े हदसे की रात जिसमें दर्जन भर से ज्यादा लोग भगदड़ में अपनी जाव गवां बैठे, स्थानयी सम्पादक प्रमोद मुकेश ने पत्रकारों की अपनी टीम को प्रेरित तो किया ही, सर्कुलेशन और प्रिंटिंग से जुड़े सहयोगियों को भी प्रेरित किया और सुबह होते-होते अखबार की कांपियां बाजार में पहुंचवा दी. पटना युनिट के इस प्रयोग पर भास्कर समूह के चेयरमैन ने इसके लिए खास तौर पर प्रमोद और उनकी टीम को बधाई भी दी.

 

वह जो सम्पादक हैं

Pramod Mukesh

Pramod Mukesh

भास्कर के स्थानीय सम्पादक प्रमोद मुकेश हैं. बिहार की पत्रकारिता के लिए प्रमोद का होना इसलिए भी कुछ अलग बात है क्योंकि अमूमन बिहार के अन्य दो बड़े अखबार- हिंदुस्तान और जागरण के अब तक के सम्पादक बिहार से बाहर के ही रहे हैं- या अगर बिहार के रहे हैं तो उनकी कर्मभूमि बिहार नहीं रही है.

बिहार के राज-समाज को करीब से जानने का लाभ प्रमोद और उनके अखबार को मिला है. प्रमोद मुकेश की 20 साल की पूरी पत्रकारिता बिहार में सिमटी रही है. प्रमोद एक अंतर्मुखी, पर काम के धुनी पत्रकार और टीम लीडर के रूप में जाने जाते हैं. एक ऐसा इंसान जो सार्वजनिक जगहों पर जाने से गुरेज करता है. सोशल मीडिया पर पैनी निगाह तो रखता है पर लाइक बटन दबाने और तस्वीरें अपलोड करने के अलावा कुछ नहीं करता. जो न तो किसी गिरोह का आदमी है और न ही पत्रकारिता में गिरोहबंदी का कायल है.

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