धर्मसती के आईने में हमारा असली चेहरा

धर्मसती का हादसा हमें बताता है कि हमारे नेता, अधिकारी और यहां तक की खाते-पिते घरों के लोगों को न तो सरकारी स्कूलों पर भरोसा है और न ही सरकारी अस्पतालों परBiharMid-day

प्रणय प्रियंवद

16 जून को बिहार में जेडीयू और बीजेपी की दोस्ती टूटी। राज्यपाल से मुलाकात के बाद जेडीयू ने बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया। एक माह बाद 16 जुलाई को मशरक में 23 बच्चे मध्याह्न भोजन खाने से मौत के मुंह में समा गए। दोनों घटना का एक दूसरे से कोई –लेना देना नहीं है। लेकिन यहां दोनों का एक साथ जिक्र इसलिए जरूरी है कि 16 जून के बाद 19 जून को विधानसभा में बहुमत साबित करने के बाद नीतीश कुमार के पास 18 विभाग आ गए।

इसमें स्वास्थ्य विभाग भी एक है। छपरा के धर्मासती गंडामन प्राइमरी स्कूल कांड में जो कुछ हुआ वो मानव संसाधन विकास विभाग का मामला तो है पर बच्चों को जैसे ही प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती कराया गया तो ये मामला स्वास्थ्य विभाग का भी हो गया। स्कूल से आठ किलोमीटर दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तक बच्चों को पहुंचाने में घंटा भर से ज्यादा समय लग गया। जिला अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से 50 किलोमीटर दूर है। यहां तक बच्चों को पहुंचाने में पांच घंटे लग गए। छपरा से पटना मेडिकल अस्पताल की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। जिसे तय करने में तीन घंटे लगने चाहिए थे पर बच्चे रात ग्यारह –बारह बजे यहां लाए जा सके।

निकम्मी व्यवस्था

जो बच्चे मरे उन्हें गांव में ही स्कूल के सामने दफन कर दिया गया। बिहार सरकार की प्रशासनिक लापरवाही को ये स्मारक याद दिलाता रहेगा कि बच्चों को कैसे व्यवस्था का निकम्मापन मां की गोद से छीन ले गया। पढ़ने की ललक का कैसा इंतकाल हुआ। कैसे आर्गेनो फास्फोरस ने शरीर में जाकर भूचाल मचाया। बहुत संभव है इस स्मारक पर भोजन करते हुए वैसे बच्चे की मूर्ति लग जाए जिसके बगल में किताबें, कॉपियां और पेंसिल भी हो। जो हर आते-जाते को याद दिलाए कि सरकारी योजनाओं का सच ऐसा भी है। इस घटना का बड़ा असर ये हुआ कि बिहार के सरकारी स्कूलों के ज्यादातर अभिभावक डरे हुए हैं। कई बच्चों ने घर से टिफिन लाना शुरू कर दिया है। यानी स्कूल के भोजन का बहिष्कार कर दिया है। जो बहुत लाचार हैं वे ही स्कूल में खाना खा रहे हैं।

मशरक कांड में सरकार ने पहले तो सारण के कमिश्नर से मामले की जांच करायी और स्कूल की प्रधानाध्यापिका को दोषी माना। इसके बाद मामले को एसआईटी के हवाले कर दिया गया। हद है सरकार ने इसके लिए किसी को जिम्मेवार नहीं माना। हद ये भी कि मानव संसाधन विभाग ने घटना के बाद कई प्रेस कांफ्रेस किए पर स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग के साथ मिलकर एक भी प्रेस कांफ्रेस नहीं हुआ। अश्विनी चौबे को बर्खास्त करने के बाद स्वास्थ्य मंत्री भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं।

लोकसभा का उपचुनाव मानव संसाधन मंत्री पी.के. शाही ने छपरा से लड़ा था। इसमें उनकी हार भी हुई थी। यानी उनके चुनावी क्षेत्र में ये घटना घटी। राजनीति में घटना की जबावदेही लेकर इस्तीफा देने की परंपरा के खत्म होने का उदाहरण भी बनी ये घटना। नहीं तो गइसल ट्रेन दुर्घटना में नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर राजनीति में संवेदना के बचे होने की गवाही दी थी । इधर एनएसयूआई ने मानव संसाधन विभाग के मंत्री पी.के. शाही के आवास पर खूब हंगामा किया। नेम प्लेट पर कालिख पोती और इस्तीफे की मांग भी की। लेकिन मंत्री शाही ही नहीं बल्कि नीतीश कुमार को भी घटना के पीछे विरोधियों की साजिश दिख रही है।

सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल किसके लिए?

बिहार का कोई मंत्री ऐसा नहीं जिसका बेटा, पोता, सरकारी स्कूल में पढ़ता हो। दूसरा ये कि सरकारी अस्पतालों पर भी भरोसा नहीं रह गया नेताओं का। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र को कुछ सप्ताह पहले जब ब्रेन स्टोक हुआ तो पटना के सरकारी अस्पताल के बजाय उन्हें बोरिंग रोड स्थित एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसी तरह पूर्व सभापति ताराकांत झा की डायलिसिस पटना के किसी सरकारी अस्पताल में होने के बजाय बोरिंग रोड के उसी प्राइवेट अस्पताल में होती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मां का इलाज पटना के इंदिरा गांधी हृदय रोग अस्पताल में हुआ था और उनकी पत्नी का इलाज बिहार के बाहर किसी प्राइवेट अस्पताल में हुआ था।

लेखक पटना स्थित वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं. उनसेpranaypriyambad@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.pranay foto

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