नरम हिंदुत्व की राह पर राहुल

राहुल की केदार नाथ यात्रा से कांग्रेस को कितना लाभ होगा, यह कहना मुश्किल है, लेकिन उनकी यात्रा को ’मुस्लिम समर्थक  पार्टी’ के ठप्पे से अलग करने के  प्रयास के बतौर देखा गया. वैसे कांग्रेस की हकीकत यह है कि वह शुरू से नरम हिंदुत्व की हामी रही है.rahul

तबस्सुम फातिमा

मगर दूर्भाग्य से मुस्लिम समर्थक सरकार के लेबेल के बावजूद कांग्रेस कभी मुस्लिम समर्थन में खुल कर सामने नहीं आयी। क्या केवल कमीशन बैठाना या मुसलमानों के आर्थिक विशलेषण के लिए रिपोर्ट मांगना ही काफी होता है? सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद यह सरकार की बदनीयती ही कही जायेगी कि इन रिपोर्टों पर बमुश्किल ही अमल न हो सका। कांग्रेस का इतिहास उठा कर देखा जाये तो पंडित जवाहर लाल नेहरू से अब तक नर्म हिन्दुत्व की अगुवाई रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी कांग्रेस में नर्म हिन्दुत्व वाले नेताओं की जमात थी। सरदार पटेल, नाम भी इस संदर्भ में लिया जा सकता है।

ताजा इतिहास में भी कांग्रेसी नेता हिन्दू आतंकवाद, ध्रूवीकरण, साम्प्रदायिकता और धर्मनिरमंक्षता आदि पर बोलने से बचते रहे हैं। हिन्दू समर्थक होने के बावजूद 4 फरवरी 1948 सरदार पटेल ने आरएसएस पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। हिन्दू महासभा के प्रमुख श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे पत्र में पटेल ने आरएसएस को महात्मा गांधी हत्या का जिम्मेदार तक ठहराया था।

नरम हिंदुत्व की नेहरू संस्कृति

12 अगस्त 2014 राजनाथ सिंह ने एक बयान में कहा था कि नेहरू देश के लिए आरएसएस के योग्यदान की तारीफ करते थे। यह नेहरू का नरम हिन्दुत्व ही था कि पटेल द्वारा मांग किये जाने पर भी कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। यह पंडित जवाहर लाल नेहरू ही थे जिन्होंने 10 अगस्त 1950 संविधान की अनुच्छेद 14,15 और 16 को धार्मिक भेदभाव के आधार पर बदलते हुए नया अध्यादेश लाकर अनूसूचित जाति के मुसमलानों को रेजर्वेशन से महरूम कर दिया।

गरम हिंदुत्व, नरम हिंदुत्व

इंदिरा गांधी ने ही संविधान की प्रस्तावना में सेकुलेरिज्म और समाजवाद शब्दों को जोड़ा था। लेकिन सत्ता की लड़ाई में कांग्रेस नरम पथ पर चलते हुए कांग्रेस शसित राज्यों में संकीर्ण विचार अपनाने से खुद को नहीं रोक सकी। कांग्रेसी इतिहास समाजवाद की जगह समाजवादी, तरीकों को ढोने में रहा। यह समाजवादी तरीका यह था कि सत्ता में बने रहने के लिए जहां जैसा सम्भव हो, वैसा बन के दिखाओ। इसलिए आजादी के बाद का राजनीतिक परिदृश्य देखें तो इस देश में चेहरे बदल बदल कर एक ही पार्टी हुकूमत करती रही है और वह है, हिन्दुत्व। भाजपा का गरम और कांग्रेस का नरम हिन्दुत्व।

 

वोट बैंक की राजनीति में कांग्रेस का यह चेहरा अब खुल कर सामने आ चुका है कि कांग्रेस एक ओर हिन्दुओं को भी नाराज नहीं करना चाहती और दूसरी ओर मुसलमानों को दंगे और भय के मनोविज्ञान से जोड़ कर वादों और बहलावों की राजनीति करती रही है। संघ के विवाद, प्रज्ञा संबंधी मामले, जेलों में बंद निर्दोष मुसलमान और फर्जी इंकाउंटर्स तक के मामलों में कांग्रेस की गम्भीर चुप्पी बहुसंख्यक वोट के खोने के डर से अपनी जबान बंद ही रखती है।

दंगा संस्कृति से लाभ 

याद कीजिए, मुजफ्फर नगर दंगों में कैम्प में रहने वालों पर राहुल का आरोप था कि यह लोग आइएसआई के एजेंट हैं। जब जख्मों पर मरहम रखने की जरूरत थी, लोकसभा 2014 के चुनाव को देखते हुए राहुल क्या, कांग्रेस की आंख तक बड़े वोटों की राजनीति कर रही थीं। गौर करें तो सबसे अधिक साम्प्रदायिक दंगे भी कांग्रेस के ही राज में हुए। बाबारी मस्जिद का ताला खोलने से लेकर हाशिमपुरा, मलियाना दंगे और गुजरात दंगे भी कांग्रेस के नर्म हिन्दुत्व का संकेत देते हैं। गुजरात दंगों पर यह भी कहा गया कि अगर सोनिया गुजरात चली जातीं तो इससे दंगों का असर बहुत हद तक कम हो सकता था। दंगा संस्कृति से लाभ लेने का तरीका भाजपा ने कांग्रेस से ही सीखा है। मनोवैज्ञानिक भय को उग्र करते हुए कांग्रेस के लिए मुसलमान केवल वोट बैंक रहे, जबकि नरम हिन्दुत्व कांग्रेसी इतिहास में खुल पन्नों की तरह रही, जिसको थोड़े बहुत अध्यन से भी जाना जा सकता है। इसका एक उदाहरण है बढ़ते हिन्दु आतंकवाद को ले कर कांग्रेस की नर्मी, जिस पर कभी बोलने की जरूरत महसूस नहीं की गई।

अल्पसंख्यकों पर हमले, राहुल की मोदीनुमा चुप्पी

59 दिनों की रहस्यमय वापसी के बाद मोदी मंत्रिमंडल के भूमिअधिग्रहण, पूनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम पर राहुल या कांग्रेस की भविष्य की योजनाएं क्या होंगी, कहना मुश्किल है मगर बढ़ती साम्प्रदायिकता, आतंकी बयानात पर राहुल चुप हैं, ऐसी चुप्पी नरेंद्र मोदी की भी हैं। यहां तक कि मुसलमान, ईसाई, अल्पसंख्यकों पर होने वाले दंगों पर भी यह चुप्पी यह संकेत देती है कि फिलहाल वो हिन्दुत्व से कोई नाराजगी मोल लेने को तैयार नहीं। क्या राहुल की यह चुप्पी मोदी की राजनीतिक सफलता से प्रेरित है, लोग यह भी सवाल करने लगे हैं. जब कि दूसरी तरफ ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग केदार धाम के कपाट खुलने पर पहले तीर्थ यात्री बनने वाले राहुल का दौरा आज्ञातवास की उस रहस्यमय चुप्पी को भी दर्शाता है, जहां से वे अब हिन्दुत्व के चमत्कार की जीवन—बूटी लेकर लोटे हैं।

 

सम्भव है, समाजवादी से अलग कांग्रेस के पुराने चरित्र और समाजवादी तरीकों में राहुल राजनीति के नये समीकरण या सत्ता वापसी की सोच रखते हों तो अब यह अग्निपथ आसान नहीं है। अगामी बिहार और यूपी के चुनाव और जनता परिवार के गठबंधन के बीच कांग्रेस की राह मुश्किल ही कही जायेगी। अब देखना है, नर्म हिन्दुत्व का सहारा लेकर धाम पर निकलने की तैयारियां मुस्लिम समर्थक सरकार के लेबुल को कांग्रेस से कितना अलग कर पाती है?

तबस्सुम फातिमा से tabassumfatima2020@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है

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