नव-उदारवाद चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता

नव-उदारवाद १९८९ में समाजवाद के पराभव के बाद दुनिया की अर्थ-व्यवस्था के बारे में अमेरिकी संस्थानों, आईएमएफ, विश्व बैंक आदि की परिकल्पना का नाम है.neolibralism

अरुण माहेश्वरी

इसी का दूसरा नाम ‘वाशिंगटन कंशेंसस’ भी है – संकट में फँसे विकासशील विश्व को उबारने का अमेरिकी नुस्खा। वित्तीय अनुशासन, हर मामले में जीडीपी का मानदंड, सरकारी रियायतों के बारे में पुनर्विचार, करों में कमी, ब्याज की दरों में लचीलापन, विदेशी मुद्रा की दर पर बाज़ार का नियम, खुला अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य, विदेशी निवेश के रास्ते की बाधाओं का अंत, सार्वजनिक उद्यमों का निजीकरण ,बाज़ार को अधिक से अधिक मुक्त बनाने और सर्वोपरि संपत्ति के अधिकार को पूर्ण क़ानूनी सुरक्षा देने की तरह के मंत्रों से तैयार किया गया नुस्खा । आर्थिक मामलों में सरकार के बजाय बाज़ार को अधिक भरोसेमंद मानने का नुस्खा ।

इस कंशेंसस की बुनियादी आर्थिक नीतियों पर निर्मित सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को उदार जनतंत्र कहा गया, जिसमें फ़्रांसिस फुकुयामा के अनुसार इतिहास का अंत हो जाता है । सभ्यता को घूम-फिर कर मोटे तौर पर इन्हीं नीतियों के दायरे में क़ैद रहना पड़ेगा ।

तब से लगभग एक चौथाई सदी का समय बीत गया है । इस दौरान विश्व अर्थ-व्यवस्था को अनेक बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है । ख़ास तौर पर सन् २००८ में अमेरिका के सबप्राइम संकट के बाद की विश्व-व्यापी मंदी ने बाज़ार पर भरोसे को बुरी तरह झकझोर दिया । फुकुयामा तक ने कह दिया कि उनकी धारणा ग़लत थी । ‘टाइम्स’ और ‘इकोनामिस्ट’ की तरह की पत्रिकाओं ने कहा, ऐसा निरंकुश बाज़ार-राज चल नहीं सकता । पूँजीवाद चल नहीं सकता ।

अब पाँच साल बाद फिर अमेरिका में कुछ आर्थिक स्थिति सुधरी है । फिर भी ओबामा स्वास्थ्य बीमा के मसले पर सरकारी रियायतों की नीति पर चलना चाहते हैं, जबकि रिपब्लिकन बाज़ार पर आस्था बनाये रखने के पक्ष में है ।

कहने का तात्पर्य यह है कि विश्व साम्रज्यवाद के शीर्ष पर भी नव-उदारवादी नीतियों के बारे में गहरे संशय बने हुए हैं ।

इस पूरे परिप्रेक्ष्य के बावजूद सवाल यह है कि क्या भारत के आगामी लोकसभा चुनाव में नव-उदारवाद स्वयं में चुनावी लड़ाई का मुद्दा बन सकता है ? यह एक गंभीर मसला है । समसामयिक राजनीति के क्षेत्र से जुड़ा एक बड़ा यथार्थवादी मसला ।

वामपंथ को अपना चुनावी एजेंडा तैयार करने के पहले इसपर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है । अधिक ठोस, समसामयिक मुद्दों पर केंद्रित होने की ज़रूरत है । नव-उदारवाद का विकल्प तो समाजवाद है, जो इस चुनाव का मुद्दा नहीं बन सकता ।

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