नायक नहीं, खलनायक है तू

अहमद बुखारी की इमामत के 14 वर्ष के इतिहास को खंगालते हुए हमारे सम्पादक इर्शादुल हक उनके व्यक्तित्व में छुपे खलनायक को उजागर करते हुए बता रहे हैं कि वह कैसे मुसलमानों के लिए नासूर बन चुके हैं.saiyad-ahamad-bukhari

 

अपने छोटे बेटे शाबान बुखारी को नायब इमाम घोषित करने वालेय दस्तारबंदी कार्यक्रम में पीएम नरेंद्र मोदी को आमंत्रित नहीं कर और पाकिस्तानी वजीरे आजम को इस समारोह में दावत दे कर इमाम बुखारी ने विवाद खड़ा कर दिया है. भारतीय मीडिया और आम लोगों ने बुखारी के इस रवैये की बड़े पैमाने पर आलोचना की है. पर बुखारी की शख्सियत को जो लोग करीब से जानते हैं उन्हें पता है कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो उनके व्यक्तित्व से अलग है. बुखारी पिछले 14 वर्षों से ऐसे ही उलूल जुलूल बयानों के लिए जाने जाते हैं. हर बार वह मुसलमानों के नायक होने का स्वांग करते हैं और हर वह खलनायक साबित होते हैं.

बुखारी के व्यक्तित्व को समझने के लिए पिछे 14 वर्षों में उनके तीन महत्वपूर्ण बयानों पर गौर करने की जरूरत है. आइए इन तीन उदाहरणों से उन्हें समझते हैं.

अपने पिता मौलाना अब्दुल्लाह बुखारी से इमामत की विरासत अक्टूबर 2000 में हासिल करने के बाद वह लगातार ऐसे बयान देते रहे हैं.

एक- विभाजनकारी राजनीति

बुखारी वंश के 13 वें इमाम मौलाना अहमद बुखारी ने 14 अक्टूबर 2000 को इमामत का ओहदा संभालते ही यह कह कर खलबली मचा दी  थी कि भारत के मुसलमानों के लिए एक राजनीतिक पार्टी बनायी जायेगी. बुखारी के इस बयान के बाद पूरे देश में खलबली मच गयी . तब हर खास वो आम के बीच यह चर्चा कई वर्षों तक चलती रही कि अब मुसलमान अपने लिए राजनीतिक दल बना रहे हैं. आज 14 वर्ष बीत गये. बुखारी का यह हवाई बयान जमीन में दफ्न हो चुका है. लेकिन उसी वक्त बुखारी ने अपनी शख्सियत को जाहिर कर दिया था कि वह खलबली मचा कर देश-दुनिया की निगाह अपनी ओर खीचना चाहते हैं. इस बयान के बाद अगर मुस्लिम समुदाय में चर्चा छिड़ गयी तो दूसरी तरफ हिंदुओं के बीच भी यह बहस का मुद्दा बन गया. निश्चित रूप से बुखारी के इस बयान के बाद दो समुदायों के बीच की विभाजन रेखा और मजबूत हुई. लेकिन इन 14 वर्षों में बुखारी के बयान का कोई प्रतिफल सामने न आया. हालांकि मजहब के नाम पर राजनीति सेक्युलर देश के लिये घातक ही साबित होता है.

दो- भाजपा अच्छी, भाजपा बुरी

यह मौलाना बुखारी ही थे जिन्होंने 20 अप्रैल 2004 को अटल बिहारी वाजपेयी को दुबारा प्राइम मिनिस्टर बनाने के लिए भारत के मुसलमानों को कहा था -हालांकि हिंदी अखबारों ने इसे फतवा देना कहा- कि वे भाजप को वोट दें.इतना नहीं उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के लिए एक ‘हिमायत कमेटी’ का गठन भी कर दिया. खुद उस रथ पर भी बैठ गये जिसे मुसलमानों के दरवाजों पर ले जा कर भाजपा को वोट देने की अपील की जा रही थी. निश्चित तौर पर इस कारवां को आगे बढ़ाने का खर्च भाजपा ने उठाया था.

तीन- मुलायम मसीहा, मुलायम गद्दार

29 जनवरी 2012 को इन्हीं बुखारी ने मुलायम सिंह यादव के संग एक ज्वाइंट प्रेस कांफ्रेंस की और उत्तप्रदेश में समाजवादी पार्टी को हिमायत करने के लिए मुसलमानों से अपील की. वह खुद तो मुलायम की मदद के लिए कूद ही पड़े बल्कि अपने दामाद तक को मैदान में उतार दिया और दोनों ससुर-दामाद मुलायम के लिए वोट मांगने लेग. लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुआ, बुखारी ने अप्रैल 2012 में मुलायम पर आरोप लगाया कि उन्होंने मुसलमानों के संग ‘गद्दारी’ कर दी. दर असल बुखारी अपने दामाद को मंत्री बनवाना चाहते थे. बुखारी की इस करतूत को मुसलमानों ने बखूबी समझ लिया है. जब बुखारी मुसलमान कह रहे होते हैं तो इसका मतलब उनका कुनबा होता है. तब बुखारी मुलायम से इतने नाराज हुए कि उन्होंने अपने दामामद उमर अली खान, जो समाजवादी पार्टी के एमएलसी थे, से इस्तीफा दिलवा दिया.

शाबान बुखारी: बड़े बेटे को  दरकिनार करने का खेल

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मोदी के शोर में यूं दबी विरासत की जंग

अब बात बेटे को नायब इमाम बनाने की राजनीति से शुरू करते हैं. इमाम के ऊपर के तीन बयान की बुनियाद पर यह समझने में आश्चर्य नहीं कि वह भले ही देश की सबसे बड़ी मस्जिद के इमाम हैं पर वास्तविकता यह है कि वह इमाम के बजाये एक बड़े पोलिटिकल बरगेनर हैं. जो मुसलमानों के नाम पर अपने कुनबे के लिए राजनीतिक सत्ता की चमक का सौदा करने के लिए दक्षिण पंथी भाजपा का दामन भी थाम सकते हैं तो मुलायम सिंह यादव को भी मुसलमानों को मसीहा घोषित कर सकते हैं. और काम नहीं होने पर मुलायम को मुसलमानों का गद्दार तक घोषित कर सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी को साम्प्रदायिक घोषित करने वाले बुखारी वहीं तो हैं जो गुजरात दंगों के महज 4 साल बाद भाजपा के रथ पर सवार हो जाते हैं. और अटल बिहारी वाजपेयी के लिए अपने जमीर तक को गिरवी रख देते हैं. लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बावजदू भाजपा की 2004 में अप्रत्याशित हार हो जाती है और मौलाना को अपनी औकात का पत चल जाता है. उन्हें पता चल जाता है कि भारत के 18-20 करोड़ मुसलमानों में उनकी कोई कद्र नहीं.

मीडिया को दिया गच्चा

अब सवाल यह है कि बुखारी ने मोदी को दस्तारबंदी समारोह में क्यों आमंत्रित नहीं किया?  यह अजीब विडंबना है कि भारतीय मीडिया बुखारी के इस फैसले की वास्तविकता की खोज करने के बजाये पॉपुलर न्यूज में ही उलझ गया. 14 सालों के सार्वजनिक जीवन के अनुभवों ने बुखारी को एक चतुर खिलाड़ी बना दिया है. उनकी चतुराई ने देश के मीडिया के बड़े हिस्से को मूर्ख बना दिया. और यही बुखारी की कामयाबी है.

कम लोगों को पता है कि बुखारी खानदान में इमामत के लिए जबर्दस्त तकरार है. बुखारी इस तकरार से लोगों और मीडिया का ध्यान बांटने की कामयाब कोशिश की है. बुखारी के बड़े बेटे जामा मस्जिद के नायब इमाम बनना चाहते हैं. इसके लिए परिवार में भारी कलह रही है. खुद बुखारी ने भी पहले घोषित किया कि वह नायब इमाम के पद पर अपने बड़े बेटे को बिठायेंगे. बुखारी के छोटे भाई यहिया बुखारी इन बारीकियों को समझते हैं. जब बुखारी ने अपने वायदे  के मुताबिक  बड़े बेटे को नायब इमाम नहीं बनाया तो उन्होंने पूरे देश और मीडिया का ध्यान  मोदी के इर्द-गिर्द जमा दिया. पूरा मीडिया असल मुद्दा ही भूल गया. मीडिया मोदी के नाम में उलझ गया और बुखारी की विरासत की जंग मीडिया के शोर में दब कर रह गयी.

मुस्लिम सामंतवाद और बुखारी

दुनिया जानती है कि दिल्ली की जामाम मस्जिद का निर्माण जब पूरा हुआ तो शाह जहां ने बुखारा जिसे उज्बेकिस्तान भी कहते हैं, के शाह को एक काबिल इमाम भेजने के दरख्वास्त की. शाह जहां के आग्रह पर वहां के शाह ने सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी को दिल्ली भेजा. इस तरह सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी 1656 में पहले इमाम बनाये गये. मौजूदा इमाम सैयद अहमद बुखारी उसी वंश के 13 वें इमाम हैं. बुनियादी तौर पर विदेशी मूल के इस बुखारी वंश का भारत के 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी वाले धर्म परिवर्तित मुसलमानों से कोई लेना देना नहीं है. खुद को ऊंची नस्ल और ऊंचे  वंश यानी अशराप नस्ल का समझने वाले बुखारी, असल में मुस्लिम सामंतवाद के प्रतीक हैं. जो मजहबी सत्ता के साथ  सियासी सत्ता के लिए भी हर तरह का तिकड़म रचते रहे हैं.

जहां तक मोदी को दस्तारबंदी समारोह में आमंत्रित न करने की बात है, यह तो कोई विवाद है ही नहीं. यह दर असल एक राजनीतिक बारगेनर की चतुराई भरी चाल है. जिस भाजपा को वह एक समय मुसलमानों का दुश्मन घोषित करते हैं और दूसरे ही पल भाजपा के लिए हिमायत कमेटी बना देते हैं, वह कुछ भी कर सकते हैं. बस अगर नरेंद्र मोदी एक इशारा कर दें कि उन्हें राजनीतिक सत्ता का हिस्सा बनाया जायेगा तब दूसरे ही दिन अगर अहमद बुखारी नरेंद्र मोदी को मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी भी घोषित करें देंगे. इसमें कोई हैरत की बात नहीं. आखिरी प्वाइंट यह है कि क्या मोदी को आमंत्रित करते तो वह मस्जिद में जाते? पाकिस्तानी प्राइम मिनिस्टर तो नहीं आ रहे हैं मौलाना की दस्तारबंदी में. यह तय है.

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