नार्वे से लें चुनावी सुधार के सबक

शेष नारायण सिंह फिलवक्त नार्वे की चुनावी सभाओं की खाक छान रहे हैं. वह ऐसी सभा में गये जहां सभी राजनीतिक दल के नेता मात्र 45 लोगों को संबोधित कर रहे थे.एक सभा की आंखों देखी

ओसलो की चुनावी सभा में शेष नारायण

ओसलो की चुनावी सभा में शेष नारायण

मुझे यहां नार्वे के शहर ओस्लो में आज एक चुनावी सभा में शामिल होने का मौक़ा मिला. इस चुनावी सभा की तुलना अपने देश की चुनाव सभाओं से करना बहुत ही दिलचस्प हो सकता है.
पुराने ओस्लो के फ्रागनर प्लास की एक चर्च में नार्वेजियन-रूसी सांस्कृतिक केन्द्र ने एक चुनावी सभा का आयोजन किया था. सभा बड़ी थी क्योंकि करीब 40 गंभीर श्रोता नौजूद थे. भारत में किसी सभा में 40 श्रोता हों तो यह राजनीतिक पार्टियों के लिए शर्मनाक स्थिति कही जा सकती है. पर नार्वे के लिहाज़ से अगर किसी चुनावी सभा में 25 लोग शामिल हो जाएँ तो उसे सफल माना जाता है .

नार्वेजियन-रूसी सांस्कृतिक केन्द्र की नेता रईसा सिरुकोवा ने हमें बताया कि उन्होंने अपने इलाके के लोगों के सवालों और शंकाओं के बारे में राजनीतिक नेताओं की राय जानने के लिए इस सभा का आयोजन किया है .यहाँ संसद का चुनाव जितना महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टियों के लिए होता है उससे कम महत्वपूर्ण मतदाताओं के लिए नहीं होता. फ्रागनर प्लास की सभा में अपनी बात रखने के लिए चार प्रमुख पार्टियों के नेताओं को बुलाया गया था.

एक ही मंच पर दक्षिण पंथी भी वामपंथी भी

नार्वे के चुनाव में कोई किसी इलाके का उम्मीदवार तो होता नहीं क्योंकि नार्वे में निर्वाचन का आनुपातिक प्रतिनिधित्व का तरीका अपनाया जाता है ,इसलिए सभी राजनीतिक पार्टियां इस तरह की कम्युनिटी आधारित चुनावी सभाओं में अपने बहुत काबिल लोगों को भेजती हैं .सभी पार्टियों के प्रतिनिधि अपनी बात कहते हैं उसके बाद सवाल जावाब का सिलसिला शुरू होता है . फ्रागनर प्लास की सभा 6 बजे शाम को शुरू हुई थी और रात के साढ़े आठ बजे तक सवाल जवाब का सिलसिला चलता रहा . इस सभा में लेबर पार्टी की तरफ से उसकी सांसद मारित नीबाक आयी थीं जो स्तूर्तिंग यानी नार्वेजियन संसद की डिप्टी स्पीकर हैं .

लेबर पार्टी को यहाँ पर आम तौर पर ए पी नाम से जाना जाता है . मारित नीबाक ,नॉर्डिक कौंसिल की सलाहकार समिति की अध्यक्ष भी हैं . नार्डिक काउन्सिल वास्तव में स्कैंडेनेविया के देशों के साथ कुछ अन्य देशों का संगठन भी है . फ्रागनर प्लास की सभा में सत्ताधारी दल की प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने बहुत ही गंभीरता पूर्वक बात की और कहा कि आठ साल पहले 2005 के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री येंस स्तूलतेंबर्ग की सरकार सत्ता में आयी थी . तब से अब तक 3 लाख 40 हज़ार लोगों को रोज़गार मिला है .

कंज़रवेटिव पार्टी के प्रतिनिधि मिकायल थेच्नेर ने अर्थव्यस्था में निजी पूंजी को मुक्तिदाता के रूप में पेश किया. कंज़रवेटिव पार्टी को यहाँ होयरे पार्टी कहते हैं, यही उसका मान्यताप्राप्त नाम है. उनके भाषण को सुनकर लगा कि उन्होंने या उनकी पार्टी के नेताओं ने उसी स्कूल से अर्थशास्त्र की पढाई की है जहां डॉ मनमोहन सिंह और मांटेक अहलूवालिया गए थे .उन्होंने कहा कि सार्वजनिक निवेश को कम किया जाना चाहिए और निजी पूंजी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पूंजीवादी,दक्षिणपंथी राजनीतिक अर्थशास्त्र में जो कुछ भी बताया गया है, वह सब इस पार्टी के कार्यक्रम में है. कम से कम सरकारी हस्तक्षेप और अधिक से अधिक बाज़ार की ताक़तों के समर्थन के बाद श्रोताओं में बैठे हुए लोगों में बहुत लोग ऐसे थे जो मिकायल थेच्नेर की बात से असहज महसूस कर रहे थे लेकिन उन्होंने अपनी बात को मजबूती से रखा और टस से मस होने को तैयार नहीं थे.

अजीब बात यह है कि उनके इस दृष्टिकोण के बाद भी उनकी पार्टी के गठबंधन को सफलता के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं .

अलोकप्रिय बात पर भी अड़े रहने का साहस

कंजर्वेटिव पार्टी के साथ चुनाव पूर्व समझौते में शामिल एफ आर पी ने अपने प्रतिनिधि क्रिस्तियान थीब्रिंग येद्दे को भेजा था . एफ आर पी का दूसरा नाम लिबरल पार्टी भी है लेकिन उस पार्टी के सिद्धांतों में कुछ भी लिबरल नहीं है . शुद्ध रूप से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की समर्थक एफ आर पी में ऐसा बहुत कुछ है जो उसे कट्टर राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश कर देता है लेकिन अपनी बातों के अलोकप्रिय होने के बावजूद भी लिबरल पार्टी के प्रतिनिधि ने अपनी बात प्रभावी तरीके से रखी. उन्होंने कहा कि यूरोप के बाहर के देशों के लोगों को नार्वे में बसने की अनुमति नहीं दी जायेगी. यह ध्यान रखा जाएगा कि नार्वे में अश्वेत लोगों की भरमार न हो जाए .

सोशलिस्ट-लेफ्ट पार्टी सरकार में शामिल है और लेबर पार्टी का दावा है कि चुनाव के बाद भी साथ साथ रहेगें . सोशलिस्ट-लेफ्ट को नार्वे में एस वी कहते हैं . इनकी प्रवक्ता संसद सदस्य ,रानवाई किविफ्ते के भाषण में आम आदमी की खैरियत का संदेश निकल रहा था . उन्होंने चिंता ज़ाहिर की कि देश में अमीर की दौलत बढ़ रही है जबकि गरीब और भी गरीब होता जा रहा है .

भाषण के बाद सवाल-जवाब

सभी नेताओं के भाषण के बाद श्रोताओं को सवाल करने का मौक़ा दिया गया और सब ने कठिन सवाल पूछे . उसके बादनार्वेजियन-रूसी सांस्कृतिक केन्द्र की नेता रईसा सिरुकोवा ने सभी नेताओं को गुलदस्ता भेंट किया और सब हंसी खुशी के माहौल में अपने अपने घर चले गए. 40लोगों की सभा नार्वे में कोई छोटी सभा नहीं मानी जायेगी . 45 लाख की आबादी वाले देश में 40-45 लोगों का वही महत्व है जो 120 करोड आबादी वाले भारत में करीब एक लाख लोगों का होता है .

भारतीय सन्दर्भ में इस सभा को एक लाख की भीड़ माना जाएगा. इस तुलना के बाद भारत में राजनेताओं के आचरण और चुनावी सभा की संस्कृति के बारे में विचार करना ज़रूरी जाता है . भारत में सुविधाओं के पीछे भागने वाले नेताओं की जमात को लोकशाही की राजनीति में प्रशिक्षित किये जाने की ज़रूरत है . उल जलूल चुनावी वायदे करने वाले नेताओं के लिए यह देखना भी ज़रूरी है कि अलोकप्रिय राजनीति भी अगर पार्टी ने तय कर लिया है तो उसका पालन किया जाना चाहिए. आजकल भारत की दक्षिणपंथी पार्टी और उसके कुछ समर्थकों में यह बात ज़ोरों से चर्चा का विषय है कि जवाहरलाल नेहरू ने संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था को लागू करके बहुत बड़ी गलती की, जो उनको नहीं करना चाहिए था.

इसी बहाने यह लोग दक्षिणपंथी अमरीकी चुनाव प्रणाली की मांग की जड़ें पक्की करना चाहते हैं. भारत में दक्षिणपंथी राजनेताओं की गुपचुप तरीकों से लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश पर रोक लगाई जानी चाहिए. नेहरू के खिलाफ अभियान चलाने वालों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व का महत्व को समझाया जाना चाहिए और उसके लिए अगर ज़रूरी हुआ तो नार्वे की चुनाव प्रणाली और चुनाव अभियान के तरीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जानी चाहिए .

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