निगम, बोर्ड, आयोग की नियुक्ति में ‘मांझी इफेक्‍ट’ का ग्रहण

निगम, बोर्ड, आयोग में संभावनाओं का छींका टूटने की उम्‍मीद बढ़ गयी है। उम्‍मीद है कि महागठबंधन सरकार के एक वर्ष पूरा होने के मौके यानी 20 नवंबर से पहले राज्‍य सरकार निगम, बोर्ड, आयोगों के रिक्‍त पदों पर नियुक्ति की घोषणा कर सकती है और अपने कार्यकर्ताओं के जीवन में ‘हरियाली का खाद’ छींट सकती है। लेकिन बीच में आड़े आ जा रही है वफादारी। कौन कितना वफादार साबित होगा।jitan

वीरेंद्र यादव

 

नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को ‘वफादार’ समझ कर ही अपना उत्‍तराधिकारी बनाया था। मुख्‍यमंत्री की गद्दी सौंपी थी। लेकिन गद्दी पर बैठने के दिन की गिनती बढ़ने के साथ-साथ श्री मांझी का ‘स्‍वाभिमान’ जागने लगा और ऐसी नौबत आयी कि नीतीश कुमार के खिलाफ ही मोर्चा खोल बैठे। इसी माहौल में नीतीश कुमार ने विश्‍वस्‍त पत्रकारों के बीच कहा था कि ऐसा दुर्दिन देखना पड़ेगा, ऐसी उम्‍मीद नहीं है।

 

कुर्सी से जगता है स्‍वाभिमान

हालांकि राजनीति में जीतनराम मांझी ऐसे अकेले ‘स्‍वाभिमानी’ व्‍यक्ति नहीं है, जिनका स्‍वाभिमान कुर्सी संभालने के बाद जगने लगता है। नीतीश कुमार ने अपने पिछले दस वर्षों के कार्यकाल में बहुत से विश्‍वस्‍त लोगों को सत्‍ता का हिस्‍सेदार बनाया और उनमें से कई ‘स्‍वाभिमानी’ हो गए। कुछ लोग दुबारा मौका नहीं मिलने से नाराज हो गए तो कई लोग तीबारा मौका नहीं मिलने का विद्रोही हो रहे हैं। तीन-तीन टर्म ‘लालबत्‍ती के बोझ’ बने लोग विधान परिषद में नहीं भेजने से ‘स्‍वाभिमानी’ हो गए।

 

उम्‍मीदवार कर रहे परिक्रमा

विश्‍वस्‍त सूत्रों की मानें तो नीतीश कुमार या लालू यादव को विश्‍वस्‍त लोगों की तलाश में भी परेशानी हो रही है। विश्‍वस्‍त लोगों की वफादारी पर भरोसा करना मुश्किल हो रहा है। इसके बावजूद प्रत्‍याशियों की तलाश जोर-शोर से हो रही है। शॉर्ट लिस्‍ट भी होने लगा है। लेकिन नाम अभी छन कर बाहर नहीं आ रहा है। हर उम्‍मीदवार के चेहरे पर बेचैनी है। राजद, जदयू और कांग्रेस कार्यालय में उम्‍मीदवारों का परिक्रमा हो रहा है। दरबारों में हजारी लगायी जा रही है। अपनी-अपनी वफादारी की कसमें खायी जा रही हैं।

 

कई रिटायर्ड पत्रकार भी हैं दौड़ में

लालबतियों के रेस में कई रिटायर्ड पत्रकार भी हैं। वे अपनी ओर से लॉबिंग भी कर रहे हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं के समान दावेदारी नहीं हो रही है। अधिकारियों के समान अपनी वफादारी जरूर बता रहे हैं। नीतीश सरकार में अब तक तीन-चार पत्रकारों की  नियुक्ति राजनीतिक पदों पर हुई है। इससे अन्‍य पत्रकारों की भी उम्‍मीद जगी है। कोई दस नंबर के वफादार हैं तो कोई एक नंबर के वफादार। देखना है किनकी किस्‍मत में लालबत्‍ती का सुख आता है और किन्‍हे अगली बारी का इंतजार करने का भरोसा मिलता है।

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