नीतीश के मुस्कुराते बुद्ध और बीमारी से मरते बच्चे

बौद्ध धर्म को अघोषित रुप से नीतीश कुमार ने राजकीय संरक्षण दे दिया है. बुद्ध की नई.नई मूर्तियां बनायी जा रही हैं. इस पर करोड़ों अरबों खर्च किए जा रहे हैं.buddha.nitish

प्रणय प्रियंवद

विश्व भर के बौद्ध अनुयायियों के नेताओं को बिहार बुलाया जा रहा है. पर्यटन के बहाने ये सब हो रहा है. बोधगया और नालंदा का विकास भी इसी बहाने हो रहा है.

पटना स्टेशन से सटे जो जेल थी उसकी जगह पर बुद्ध पार्क बनाया गया. यहां स्टेशन चौक के कोलाहल के बीच आप ध्यान लगा सकते हैं. यहां बोधगया के बोधिवृक्ष से लेकर श्री लंका के बोधिवृक्ष तक की टहनियां लगाई गईं. और इन दोनों के बीच बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं.

यही नहीं मुख्यमंत्री आवास में भी पावन पीपल लगाया गया जिसकी पूजा अर्चना करने दलाई लामा मुख्यमंत्री आवास गए थे. अभी नालंदा में 17 करोड़ रुपए से बुद्ध की एक मूर्ति बनने वाली है. बुद्धं शरणं गच्छामि का रूप ऐसा है कि पूरी दुनिया के उन देशों की नजर बिहार पर है जहां बौद्ध धर्म या तो राज धर्म है या सर्वोपरि धर्मण् दूसरे नजरिये से कहें तो उन तमाम देशों को रिझाने की कोशिश हैए जहां बौद्ध धर्म बड़ा धर्म है.

बुद्ध शांति का संदेश देते है. करूणा का संदेश देते हैं. अहिंसा का संदेश देते हैं. बौद्ध धर्म का उदय सनातन धर्म के विरोध से ही हुआ. बुद्ध और महावीर दोनों ने उस हिन्दू धर्म का विरोध किया जिस पर ब्राह्मणवाद हावी था. बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है.अनात्मवादी है. पुनर्जन्म में विश्वास करता है यज्ञीय कर्मकांड और पशुबलि का भी विरोध करता है. लेकिन इसी बौद्ध धर्म में बुद्ध की ही पूजा की जाने लगी. ऐसे ही बौद्ध धर्म को नीतीश कुमार राज धर्म बनाने की ओर बढ़ रहे हैं.

मुस्कुराते बुद्ध, मरते बच्चे

सच ये है जिस ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म के विरोध पर बौद्ध धर्म का उदय हुआ उसका अंत उसकी खामियों और आडंबरवाद की वजह से होने लगा. जिस भारत में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक बुद्ध का जन्म हुआ उसी भारत में ये लुप्तप्राय होने लगा. बिहार में भी बहुत कम लोग हैं जो बौद्ध धर्म को मानते हैं. भारत के नए मध्यमवर्ग के लिए बुद्ध का कितना महत्व है पता नहीं. हां लाफिंग बुद्धा का बड़ा महत्व जरूर है. आपको बहुत सारे घरों में मुस्कुराते हुए लाफिंग बुद्धा मिल जाएंगे.

मान्यता है कि इसे घर में रखने पर धन की बरसात होती है. सुख समृद्धि आती है. नीतीश कुमार किस बुद्ध को मानते हैं,उस बुद्ध को जो पर्यटन का बड़ा बाजार है या उस बुद्ध को जो सनातनी हिन्दू धर्म का विरोध करते हैं. बिहार के नए बुद्ध लाफिंग करते हुए इसलिए प्रतीत होते हैं कि उनके विचार की जगह मूर्ति को स्थापित करने और उसे पूजने पर जोर है. मूर्ति स्थापित करना गलत नहीं है इसका विरोध नहीं होना चाहिएए लेकिन हमारे बुद्ध तो फाइटिंग बुद्धा थे. नीतीश कुमार के बुद्ध लाफिंग बुद्धा हैं.

बिहार का नाम बौद्ध विहार पर पड़ा. बुद्ध की कई मूर्तियां पटना संग्रहालय में पड़ी हैं. कई मूर्तियों को तो अभी भी दर्शकों के सामने नहीं रखा जा सका है. नए म्यूजियम में शायद उन्हें सजाया जा सकेगा. दूसरी तरफ कई नई मूर्तियों का निर्माण कराया जा रहा है.

पता नहीं बिहार को इतना संपन्न क्यों मान लिया मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कि लगे एक के बाद एक बुद्ध की नई मूर्तियों का निर्माण करवाने. दूसरी तरफ अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कहते हैं. बिहार भूख और कुशासन की राजधानी है. भले ही राज्य में कुछ प्रगति हुई है पर गरीबी, भूख व बच्चों में कुपोषण के मामले में यह देश में अव्वल है.

नीतीश कुमार को लगता है कि पुरातात्विक स्थलों की खुदाई से बड़ा काम है मूर्ति और म्यूजियम निर्माण का नया इतिहास बनाना. ताकि सत्ता से हटने के बाद उनका नाम इन इमारतों के साथ अमर हो सके. अंतरराष्ट्रीय स्तर के बिहार म्यूजियम का शिलान्यास करते वक्त उन्होंने ताजमहल को याद किया था. उसी ताजमहल को जिसने शाहजहां को अमर बना दिया. लेकिन ताजमहल मुमताज महल और मुमताज महल के प्रेम से अमर हुआ. संगमरमर से नहीं.

लोग याद करेंगे कि एक मुख्यमंत्री ऐसा था जिसके राज में बच्चे सरकारी स्कूल में भोजन खाने से मरते थे.इन्सेफसलाइटिस से हर साल 100 से ज्यादा बच्चे मरते थे. और राजा मूर्तियां बनवाता रहता था. भूख ; जिसे ज्यादातर बीमारी या गरीबी मान लिया जाता है, से मौत की खबरें आती रहती थीं. लोग व्यवस्था से हार जाने के बाद आत्महत्या की कोशिश करते रहते थे. नक्सली बनते थे. आंदोलनों में पुलिस से लाठियां खाते थे और बुद्ध लाफिंग करते थे.

pranay foto लेखक आर्यन टीवी में वरिष्ठ पत्रकार हैं

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