नीतीश ने इतना कठोर फैसला क्यों लिया?

जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह अपने इस आलेख  में उन परिस्थितियों की चर्चा कर रहे हैं कि सीएम नीतीश कुमार ने  इतना कठोर फैसल क्यों लिया

बिहार की राजनीतिक परिस्थितियाँ पिछले चंद दिनों में बहुत ही तेजी से बदली है। राजनीतिक रूप से हाल के दिनों में जो घटनाएँ घट रहीं थी,उससे बिहार की जनता के मानस में एक अजीब सी असहजता दिखने लगी थी। जाहिर है,यह असहजता केवल जनता के स्तर पर ही नहीं बल्कि सरकार के स्तर पर भी बीते कई दिनों से दिखलाई पड़ रही थी।

बदलते समय के साथ कई स्तरों पर परिमार्जन राजनीति की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हर संगठन और संगठन के मुखिया को इस परिमार्जन को समय के साथ अपनाना पड़ता है।पार्टी के संचालन और सरकार के संचालन के तरीके अलग अलग होते हैं। पार्टी का संचालन अपने नीति,सिद्धांतों और सामयिक राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर तय होता है,जबकि सरकार का संचालन निश्चित कार्यक्रम और आपसी सामंजस्य-सहमति के आधार पर होता है। पिछले दिनों के घटनाक्रम में सहयोगी संगठनों ने इस विभेद को मिटा दिया गया था।

जब भी दो या दो से अधिक दलों के बीच गठबंधन होता है,तो उस स्थिति में गठबंधन के स्वास्थ्य की सर्वाधिक ज़िम्मेदारी उसके नेता की ही होती है। गठबंधन के स्वास्थ्य बिगड़ने पर उसके नेता की छवि और कौशल पर कई तरह के प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं।जनता उसी से जबाब मांगती है।

 मर्यादा का रखा ध्यान

हमने तो मर्यादा को ध्यान में रखते हुए अपने सहयोगी से इस्तीफ़ा भी नहीं मांगा।हाँ, हमारी इच्छा जरूर थी कि आरोपों को लेकर बिंदुवार सफ़ाई दिया जाये।चूँकि यह जनमानस की मांग थी।लेकिन ऐसा न होते देख नीतीशजी स्वयं इस्तीफा देकर भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की बात को स्थापित करने का कार्य किया।यह उनके अंतर्मन की आवाज थी।

जब नेता की पोजिशन और अथॉरिटी को ही गठबंधन के सहयोगी द्वारा चुनौती मिलने लगे। जब सार्वजनिक मंचों पर नेता को लेकर अभद्र भाषा का प्रयोग होने लगे,तो ऐसी स्थिति में सरकार की कार्य शैली में कई तरह के उलझाव दिखाई पड़ने लगते हैं। बीते कई दिनों से सरकार की ऊर्जा गठबंधन के साथियों की जिद्द के सामने विवश थी। एक ओर भ्रष्टाचार के नए-पुराने कई मामले खुल रहे थे ,वही दूसरी ओर सुशासन,विकास और न्याय की व्यापक परिकल्पना थी। भारी अंतर्विरोध और खींचातानी के बाद की परिणति आज आपके सामने है।

हमने पहले भी कहा था और आज भी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार छवि और प्रतिष्ठा के साथ समझौता नहीं करते। हमारे लिए बिहार की तरक्की और जनता की मांग प्राथमिक है। हम ऐसा महसूस करने लगे थे कि विकास की गति मंथर पड़ने लगी है। अपराधियों को शह मिलने लगा है।

नीतीशजी की जो भी छवि आज तक बन पायी है,उसमें उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। राजनीति के साथ जनजागृति और समाज सुधार उनके लिए आवश्यक मानदंड हैं। इन्हीं भूमिकाओं के बदौलत आज उसका हासिल है- राष्ट्रिय स्तर पर उनकी प्रसिद्धि और सम्मान। नीतीशजी की कार्य शैली का अहम हिस्सा है- गुड गवर्नेंस और विकास। और इन्हीं प्रतिमानों के साथ हम आज से फिर आगे बढ़ेंगे। आज भारी भरकम सिद्धांतों के वनिस्पत रोटी-कपड़ा और मकान की समस्या प्राथमिक है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस जंग को हमने वर्षों पहले शुरू किया था,उसके साथ किसी भी तरह से समझौता जनता के साथ धोखा है।

 

राजनीति चहारदीवारी मैं कैद न हो.. इसलिए

राजनीति यदि चारदीवार के बीच घिरी रहती है तो नीचे की ओर ही जाती है । राजनीति यदि सेवा और विकास से जुड़कर अपना सामंजस्य बिठाती है तो वह इतिहास का हिस्सा बन जाती है। साथ ही साथ जनमानस पर भी सकारात्मक प्रभाव छोडती है।रजीनीतिक जीवन में रहने वाले लोगों से जनता शुचिता और नैतिकता की अपेक्षा तो करती ही है।

राज्य के हित में कभी कभी नेता को कठोर फैसले लेने पड़ते हैं। हमें सरकार चलाने में कई स्तरों पर दिक्कतें आ रही थी। हम असहज और विवश होने लगे थे। यदि सरकार की भूमिका ही कारगर और प्रभावी नहीं बची थी,तो ऐसे में सरकार चलाने का हमारे लिए कोई मतलब नहीं था।

आज की परिस्थिति में मुख्य चुनौती यह है कि हम बिहार को राष्ट्रीय स्तर पर कैसे समृद्ध और सशक्त बनाएँ? कैसे उसके विकास की गति को तेज करें? कैसे जनता की आँखों की चमक को हासिल करें?

आज नीतीशजी ने नए मित्र के साथ पुनः सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी उठाई है। उम्मीद करते हैं बिहार फिर से नई अंगड़ाई लेगा.

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