नीतीश बनाम सुमो: कोई एक दूसरे का अखबारी बयान नहीं पढ़ता! आखिर ऐसा क्यों ?

नीतीश कुमार और उनके विरोधी सुशील मोदी द्वारा एक दूसरे के बयान को नहीं पढ़ने वाला बयान देने से बिहार की जनता कंफ्यूज हो गयी है.  आखिरी वे एक दूसरे को इतना भी तवज्जो क्यों नहीं देते?

 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक वक्तव्य से भाजपा नेता सुशील मोदी आवेश में आ गये हैं. हुआ यूं कि जब पत्रकारों ने मोदी के एक बयान का हवाला देते हुए नीतीश कुमार से उनकी राय मांगी तो उन्होंने कहा कि वह मोदी के बयान को नहीं पढ़ते. इस पर आवेश में आये मोदी ने क्या कहा.

 

मुख्यमंत्री के इस वक्तव्य के बा द सुशील मोदी ने नीतीश कुमार पर प्रहार किया है. मोदी ने कहा कि हम लोग नीतीश कुमार के बयान को कोई तवज्जो नहीं देते और न ही हम उनके बयान को पढ़ते हैं. इता ही नहीं मोदी ने आगे कहा कि उनके दस लाइन के बयान को भी लोग पढ़ते हैं.

दर असल सोमवार को लोकसंवद कार्यक्रम में पत्रकारों ने सुशील मोदी के एक बयान की तरफ उनका ध्यान आकृष्ट कराया तो सीएम ने कहा कि वह उनका( मोदी का) बयान नहीं पढ़ते. वह रोज रोज बयान देते रहते हैं. सीएम ने कहा कि वह इतने पुराने नेता हैं पर केंद्र उनकी जगह नये लोगों को उन पर थोप रहा है. दर असल वह दिल्ली से कट गये हैं.

सुशील मोदी ने , नीतीश कुमार के इस बयान के जवाब में यह कहा कि वह नीतीश कुमार के बयान पर तवज्जो नहीं देते और ना ही उनके बयान को पढ़ते हैं.

 

नीतीश कुमार और सुशील मोदी के भले ही एक दूसरे के बयान के प्रति जो विचार हों पर एक सच्चाई यहा भी है कि सुशील मोदी बिहार के अखबारों में प्रत्येक दिन छाये रहते हैं. इसके जवाब में जद यू ने अपने एक नेता संजय सिंह को लगा रखा है. सुशील मोदी के हर बयान की काट उसी दिन, अखबार के उसी पन्ने पर संजय के नाम से छपता है. मीडिया के सूत्रों का कहना है कि इन इन दोनों नेताओं के बयान हर हाल में छापने का दबाव अखबारों पर रहता है. और यही कारण है कि पटना के तमाम अखबार इन दोनों नेताओं के बयान छापते हैं. अब सवाल यह है कि न तो नीतीश कुमार, सुशील मोदी के बयान पढते हैं और न ही मोदी, नीतीश का बयान पढ़ते हैं तो फिर बयानों का हमला क्यों होता रहता है?

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