नौकरशाही का नाकारापन और अल्पसंख्यक कल्याण

अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के प्रति नौकरशाही ने किस तरह नाकारेपन का सुबूत दिया है बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार फरजंद अहमद. यह लेख हमने हिंदुस्तान से साभार लिया है.bureaucracy

नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि आज भी दूसरे धार्मिक समुदायों के मुकाबले रोजगार और आर्थिक क्षेत्र में मुसलमान काफी पीछे हैं।

इस बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने जस्टिस सच्चर कमिटी की रिपोर्ट की अनुशंसा को लागू करने की घोषणा की है, जिसके तहत विभिन्न योजनाओं में अल्पसंख्यकों के लिए 20 प्रतिशत कोटा भी तय कर दिया गया। लेकिन इस फैसले से केवल उन्हीं जिलों के मुसलमानों को लाभ मिलेगा, जहां पर उनकी आबादी 25 प्रतिशत से अधिक होगी। इस तरह यह घोषणा फिलहाल रुहेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 12 जिलों के लिए ही है। 25 प्रतिशत का यह आधार प्रधानमंत्री के अल्पसंख्यक कल्याण के लिए बने 15-सूत्री कार्यक्रम के तहत है।

सरकारी आकड़ों के अनुसार, साल 2012-13 में पूरे देश में कुल 11,094 लाख रुपये की राशि मंजूर हुई, मगर विभिन्न राज्यों ने केवल 8.33 फीसदी धन ही इस्तेमाल किया। उत्तर प्रदेश में तो केवल 2.74 प्रतिशत धन खर्च हुआ. जबकि

सच्चर समिति की सिफारिशों पर अब तक काफी चर्चा हो चुकी है। शिकायत अब यही है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने इसे एक पवित्र ग्रंथ मानकर हिफाजत से रख दिया है। जिस बात पर कभी चर्चा नहीं होती, वह है डिलीवरी मैकेनिज्म यानी नौकरशाही की उदासीनता की। इसी उदासीनता ने मनरेगा समेत कई योजनाओं का सत्यानाश किया है। सच्चर समिति की सिफारिशों के आधार पर ही 2006 में प्रधानमंत्री की नई 15-सूत्री योजना बनाई गई। देश के 90 अल्पसंख्यक बहुल जिलों का चयन किया गया और फिर एक बहु-क्षेत्रीय विकास योजना तैयार कर उसे नौकरशाही के हवाले कर दिया गया। मगर अल्पसंख्यकों के लिए बनी योजना के केंद्र में अल्पसंख्यक न तब थे और न अब हैं।

धन का 25 प्रतिशत भी इस्तेमाल नहीं

जो अल्पसंख्यक बहुल जिले लिए गए, उनमें उत्तर प्रदेश के 21, असम के 13, पश्चिम बंगाल के 12, बिहार के सात, मणिपुर के छह, महाराष्ट्र और झारखंड के चार-चार जिले शामिल थे। इसके लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में 2,750 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। मुंगेर (बिहार) के रहमानी फाउंडेशन के निदेशक मौलाना वली रहमानी ने प्रधानमंत्री को लिखकर बताया कि सब बकवास है, न तो यह अल्पसंख्यकों के लिए है और न ही इस पर नजर रखने के लिए इसमें स्थानीय मुस्लिम नेता शामिल हैं।

दरअसल, हर राज्य सरकार का अपना अल्पसंख्यक कल्याण प्रोग्राम है और अधिकारी उसे ही तरजीह देते हैं। इसलिए फंड पड़े रहते हैं और कुछ होता नहीं। सरकारी आकड़ों के अनुसार, साल 2012-13 में पूरे देश में कुल 11,094 लाख रुपये की राशि मंजूर हुई, मगर विभिन्न राज्यों ने केवल 8.33 फीसदी धन ही इस्तेमाल किया। उत्तर प्रदेश में तो केवल 2.74 प्रतिशत धन खर्च हुआ, इसका आरोप अब पिछली राज्य सरकार पर लगाया जा रहा है।सरकारी आकड़ों के अनुसार, साल 2012-13 में पूरे देश में कुल 11,094 लाख रुपये की राशि मंजूर हुई, मगर विभिन्न राज्यों ने केवल 8.33 फीसदी धन ही इस्तेमाल किया। उत्तर प्रदेश में तो केवल 2.74 प्रतिशत धन खर्च हुआ,। कई राज्यों ने तो इसकी जरूरत ही नहीं समझी, न फंड मांगा और न खर्च किया।

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