नौकरशाह: कोई अर्श पर कोई फर्श पर

यूपी के आईपीएस अधिकारी डी.डी मिश्रा को तत्कालीन सरकार ने जब अपनी राह में रोड़ा समझ लिया तो उन्हें पागल घोषित कर अस्पताल में पहुंचाने का प्रयास किया था. मिश्रा प्रशासन में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे. इससे पहले 1986 में यूपी के ही आईएएस अधिकारी धर्म सिंह रावत को भी पागल ठहराने की को शिश की गई थी. रावत भ्रष्टाचार के खिलाफ उपवास कर रहे थे.इसी तरह बिहार के एक आईपीएस अधिकारी अजय वर्मा को उनके आला अधिकारियों ने अक्खड़ और बदमिजाज बताकर उनकी पदोन्नति रुकवा दी थी. ऐसे नौकरशाहों की लम्बी फेहरिस्त है जो सरकारों को फूटी कौड़ी नहीं सुहाते और वह अपने कार्यकाल में या तो गुमनामी की गर्त में चले जाते हैं या बाबू के बजाये बड़ा बाबू की तरह अपना पूरा कार्यकाल बिता देते हैं.

दूसरी तरफ ऐसे नौकरशाहों की भी एक लम्बी लिस्ट है जो रिटायर्ड हो कर भी सरकारी पदों पर बैठ कर मलाई काटने में लगे रहते हैं. मलाई काटने वाले ऐसे नौकरशाह आम तौर पर अपनी योग्यता के बजाये सरकारों के साथ अपनी वफादारी के बदले में ऐसे इनाम पाते हैं. पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता श्यामलाल यादव ने सूचना के अधिकार के तहत जो आंकड़े जुटायें हैं वह रिटार्यड नौकरशाहों द्वारा सरकार के आला पदों पर आसन जमाने की आंख खोल देने वाली मिसाल है. इन आंकड़ों के कुछ अंश इंडियन एक्सप्रेस में छपे हैं जो बताते हैं कि देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के राज्यपालों या उपराज्यपालों के कुल 30 पदों में से 11 पर रिटार्यड नौकरशाह तैनात हैं. इनमें एन.एन वोहरा( जम्मू कश्मीर), बालमिकि प्रसाद सिंह (सिक्किम), शेखर दत्ता( छत्तीसगढ़) और तेजिंदर खन्ना( उपराज्यपाल दिल्ली) के नाम उल्लेखनीय हैं.

इतना ही नहीं बीते दो एक सालों में केंद्र या राज्य सरकारों के विभिन्न आयोगों, ट्रिब्युनलों समेत बड़े पदों पर 90 से अधिक रिटार्यड चहेते नौकरशाहों को तैनात किया गया है.

इसके अलावा अगर देश में नौकरशाहों की नियुक्ति करने वाले संघ लोक सेवा आयोग की ही बात करें तो इसके कुल 9 में से आज की तारीख मे सात सदस्य रिटार्यड नौकरशाह ही हैं. इनमें उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यसचिव पी.के मिश्र, पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह, पूर्व नौकरशाह अल्का सिरोही, हरियाणा कैडर के पूर्व नौकरशाह रजनी राजदान के नाम शामिल हैं. इसी तरह बाकी के तीन पदों पर भी पूर्व नौकरशाह ही हैं.

पिछले सात सालों से लागू सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत गठित आयोग ने तो चहेते रिटार्यड नौकरशाहों के लिए जैसे समायोजन का सबसे बड़ा अवसर ही खोल दिया हो. हालत यह है कि तमाम राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के कुल 29 मुख्य सूचना आयुक्त के पदों में से 22 को पूर्व नौकरशाहों के हवाले कर दिया गया है. जबकि सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत इन पदों पर सामाजिक कार्यों, कानून, प्रबंधन, पत्रकारिता, प्रशासन व विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में व्यापक अनुभव रखने वाले लोगों को रखने का प्रवाधान है.

ध्यान देने की बात है कि हाल के कुछ वर्षों तक जिन संवैधानिक पदों पर आम तौर पर विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों को रखा जाता था अब उन पर भी नौकरशाहों को बोलबाला दिखने लगा है. इसका जीवंत उदाहरण राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग है. पूर्व नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह फिलहाल इस पद पर तैनात हैं. इतना ही नहीं इसी आयोग के उपायुक्त के पद पर एक अन्य रिटार्यड पुलिस अधिकारी एच.टी संगलियाना को तैनात हैं. इसी तरह इसी आयोग के तीसरे सदस्य एनके दारूवाला भी नौकरशाह ही हैं.

कुछ ऐसी ही स्थिति राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जन जाति आयोग की भी है, जहां पूर्व आईएएस पीएल पूनिया विराजमान हैं. और तो और हाल ही में गठित भारत के प्रतिस्पर्धा आयोग के चेयरमैन अशोक चावला न सिर्फ पर्व आईएएस हैं बल्कि इसके छह में से तीन सदस्य भी नौकरशाही का हिस्सा रहे हैं. यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि इस आयोग के चेयरमैन का वेतन 3 लाख 75 हजार रुपये प्रति माह है, जबकि सदस्यों को 3 लाख 12 हजार रुपये प्रति माह मिलते हैं.

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