पटना हादसे के लिए नीतीश जिम्‍मेवार: शिवानंद

पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने कहा है कि गांधी मैदान हादसा प्रकरण में जीतन राम मांझी निशाने पर हैं। जबकि निशाने पर तो नीतिश कुमार  को होना चाहिए । क्योंकि बिहार की जनता ने 2010 के चुनाव में नीतीश कुमार की सरकार बनाने के लिए वोट दिया था, न कि जीतन राम मांझी की सरकार के लिए। सचाई यह है कि नीतीश के शासनकाल में ही बिहार का प्रशासन पूरी तरह लकवाग्रस्त हो चुका था। और यही लकवाग्रस्त प्रशासन जीतन राम मांझी को नीतीश कुमार से मिला है। इसलिए मुझे लगता है कि जीतन सरकार को दोषी ठहराना उचित नहीं है। असली जिम्मेदारी तो नीतीश कुमार की बनती है।sivand

नौकरशाहीडॉटइन डेस्‍क
श्री तिवारी ने जारी बयान में कहा कि गांधी मैदान हादसे में बरती गई लापरवाही प्रशासन के किसी खास अंग की नहीं है, बल्कि इसके लिए प्रशासन का हर अंग जवाबदेह है। हादसे के बाद पटना के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित अस्पताल की भी कलई उतर गई । यह अस्पताल स्वयं मृत्यु के कगार पर पहुंच चुका है। तो क्या इन सबके लिए जीतन सरकार ही जवाबदेह है? इस सरकार ने तो अभी पांच महीने भी पूरा नहीं किए हैं। उन्‍होंने कहा कि आठ वर्ष से ज्यादा समय तक नीतीश ने सरकार चलायी। इसलिए जीतन सरकार का अपना कहने लायक तो कुछ नहीं है, बल्कि यह तो नीतीश सरकार की बनाई नींव पर ही खड़ी है। इसलिए इस प्रकरण में जीतन सरकार को दोषी ठहराया जाना मेरी समझ से न्यायोचित नहीं है। वास्तविक दोषी तो नीतीश कुमार हैं, भले ही वे आज कुर्सी पर नहीं हैं।

 

आपराधिक लापरवाही
पूर्व सांसद ने कहा कि मौजूं सवाल है कि आखिर बिहार के प्रशासन की हालत इस हद तक बदतर कैसे हुई ? मुझे लगता है कि नीतीश शासन में प्रशासन ने तीन मामलों में घोर आपराधिक लापरवाही दिखाई, लेकिन सरकार ने इनमे से किसी भी मामले में किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की। पहली घटना खगड़िया की है जिसमें मुख्यमंत्री पर हमला हुआ था। स्वयं मुख्यमंत्री जी ने सार्वजनिक रूप से कबूल किया था कि अगर रणबीर यादव नहीं होते तो वे सभा मंच पर नहीं आ पाते। ऐसा कह कर मुख्यमंत्री ने अपने ही प्रशासन को नालायक और नाकाबिल घोषित कर दिया। लेकिन किसी भी प्रशासनिक अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की। श्री तिवारी ने कहा कि  दूसरी गंभीर घटना बरमेश्वर मुखिया के दाह-संस्कार के समय हुई थी, जब सरकार ने राजधानी को अपराधियों के हाथों में सौंप दिया था। तीसरी घटना गांधी मैदान की ही है, जब नरेंद्र मोदी की सभा में विस्फोट हुआ था। केंद्र सरकार द्वारा सभी राज्य सरकारों को मोदी की सुरक्षा के मामले में विशेष हिदायत थी। लेकिन बिहार सरकार के प्रशासन को गांधी मैदान में बिछाये गए बमों का पता नहीं चल पाया। यह तो संयोग था कि नरेंद्र मोदी को कुछ नहीं हुआ। अन्यथा क्या होता इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। लेकिन किसी से कैफ़ियत तक भी नहीं पूछी गई । सबकुछ चलता है वाले अंदाज में चलने वाले प्रशासन से बेहतर परिणाम की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी ?

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