पत्रकारिता में अहर्ता: काटजू क्या क्या न करें

पत्रकारों के लिए न्यूंतम अहर्ता की बहस नयी नहीं है.पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन के पत्रकारों के लिए, अन्य प्रोफेशनल्स की तरह योग्यता तय करने संबंधी बयान के बाद यह चर्चा फिर गर्म हो गयी है.

पीसीआी के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू के बयान के बाद यह बहस तेज होती जै रही है. ऐसे में सीमेज के निदेशक नीरज अग्रवाज की पहल पर आयोजति सेमिनार में इस मुद्दे पर जोरदार बहस हुई. आईआईएमसी के शिक्षक आनंद प्रधान, हिंदुस्तान के कमलेश, राष्ट्रीय प्रसंग के विकास झा ने और नौकरशाही डॉट इन के इर्शादुल हक ने इस बहस को गंभीरत से लिया.

कुल मिला कर वरिष्ठ पत्रकारों और पत्रकारिता के शिक्षकों की यह राय थी कि पत्रकारिता के गुणों को प्रशिक्षण और डिग्रियों की डोर में बांधा नहीं जा सकता. क्योंकि राजेंद्र माथुर से लेकर प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों से हम वंचित ही रहते. लेकिन इस मुबाहसे में यह जरूर महसूस किया गया कि पत्रकारों को शब्दों के चयन, संयम, संतुलन, निष्पक्षता, ऑब्जेक्टिविटी जैसे गुणों के लिए प्रशिक्षण तो जरूरी होना ही चाहिए.

आनंद प्रधान ने अपनी बहस का दायरा काफी व्यापक बना दिया जिसके चलते बहस के मुद्दे भी बहुआयामी होते चले गये, लेकिन उन्होंने अपनी बातों में रोचकता को बरकरार रखा. मिशन से प्रोफेशन की तरफ पत्रकारिता की शिफ्टिंग पर भी बहस हुई. ऐसी बहसों में अक्सर बेनेट एंड कोलमेन यानी टाइम्स ऑफ इंडिया घराने जरूर लपेटे में आते हैं, सो आये. प्रधान ने विनीत जैन से लेकर समीर जैन के किस्से सुनाये कि कैसे इस घराने ने समाचारों को टूथ पेस्ट और साबुन की तरह महज एक प्रोडक्ट के रूप में पेश करने की परम्परा शुरू की, जिसे बाद में अन्य मीडिया घरानों ने फॉलो किया. जब खबर, खबर के बजाये उत्पाद बन जाये तो उसे बाजार की चाल से चलनी पड़ी नतीजा यह हुआ कि पत्रकारिता ने पीआरओ की जिम्मेदारी भी अपने कांधों पर लेली, नतीजा सामने है.

हिंदस्तान के वरिष्ठ पत्रकार कमलेश ने अपनी बहस में वैकल्पिक मीडिया के उभरते स्वरूप को कैद करने की कोशिश की और समझाया कि मेनस्ट्रीम की पत्रकारिता भले ही बाजार के हिसाब से चलने लगी हो पर वैक्लपिक मीडिया ने अभिव्यक्ति के व्यापक अवसर देकर काफी हद तक पत्रकारिता के स्वरूप को जीवित और मजबूत किया है.

पिछले दौर में हिंदी की नामचीन पत्रिका माया के पटना ब्यूरो के प्रमुख रहे, और अब राष्ट्रीय प्रसंग के सम्पादक विकास कुमार झा ने खबरों के बाजार भाव की कई पुरानी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि खबरें हर दौर में बिकती रही हैं. उन्होंने अपनी 1980 में लिखी एक स्टोरी का जिक्र किया जो बिहार की जेलों में बंद महिलाओं की पीड़ा बयान करती एक मार्मिक कहानी थी, पर माया के सम्पादक ने सिर्फ इसलिए उसे छापने से इनकार कर दिया था कि यह खबर ‘बिकेगी’ नहीं. विकास झा यह स्थापित करना चाह रहे थे कि खबरें हर दौर में बिकती रही हैं.

नौकरशाही डॉट इन के सम्पादक इर्शादुल हक ने मौजूदा दौर को पत्रकारिता का स्वर्ण युग कहते हुए कहा कि आज आवाजों को दबाने की क्षमता मेनस्ट्रीम मीडिया में नहीं है नतीजा है कि अब सोशल मीडिया ने मेनस्ट्रीम मीडिया की हर चतुराई और बेईमानी की पोल खोल दी है. अभिव्यक्ति के विराट विक्लप मौजूद हैं ऐसे में नये दौर के पत्रकारों को वैक्लपिक मीडिया के माध्यम से नये प्रयोग करने का जोखिम उठाना चाहिए.

मौर्य टीवी के असित नाथ तिवारी इस बात से चिंतित नजर आये कि पत्रकारिता की भाषा और भंगिमा गलियों के लोगों की तरह क्रूर होती जा रही है. उन्होंने मिसाल देते हुए कहा कि एक चैनल क्रिकेट की खबर चलाते हुए चीखता है और कहता है – ‘घुस के मारो पाक को’. ऐसी भाषा पत्रकारिता की भाषा कभी नहीं हो सकती. उन्होंने जोर दिया कि भाषा का प्रशिक्षण जरूरी है.

पुष्पराज ने पत्रकारिता में किसी अहर्ता के विरोध में खड़े नजर आये और कहा कि प्रभाष जोशी ने तो मात्र 12 वी तक की पढ़ाई की थी.इस अवसर पर पत्रकार अभिषेक आनंद और सरोज कुमार के अलावा पत्रकारिता के छात्र कुमार गौरव, फैयाज इकबाल, विकास कुमार व शंकर कुमार के अलावा खासी संख्या में लोग मौजूद थे.

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