पत्रकारिता में 53 वर्षों की साधना का नाम है सुरेंद्र किशोर

पत्रकारिता में 53 वर्षों की साधना का नाम है सुरेंद्र किशोर

डॉ. ध्रुव कुमार

बिहार, देश में पत्रकारिता के लिए सबसे उपयुक्त जगह, यही कारण है कि यहां एक से एक बड़े पत्रकार हुए, इनमें एक ऐसे पत्रकार हैं, जिन्होंने 53- 54 पहले सूचना देने के दायित्व के एक संकल्प के साथ कलम उठाई, वो आज भी तमाम बदलते सामाजिक- राजनीतिक परिवेश, उतार-चढ़ाव और संकट में भी उसे मजबूती से थामे रखा, जिस पर उन्हें नाज है और लोगों का उनपर विश्वास ।अपनी स्वच्छ, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए कई बार अपमान सहे, परेशानियों का सामना किया, धमकियां, गाली- गलौज, पिटाई और मुकदमों से भी दो-चार होना पड़ा । किंतु गैर बिकाऊ पत्रकार की कीमत है ये, जिसे हर पत्रकार को चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए, मान कर ” सूचना देने के दायित्व को पूरा करने के लिए ” अपनी राह चलते रहे…

हम बात कर रहे हैं, पत्रकारिता जगत के अति सम्मानीय- सम्मानित – सुरेंद्र किशोर जी की ।


सरल -सहज, हाव-भाव से गंभीर, आत्मप्रचार से दूर, सादगी भरा व्यक्तित्व, लेकिन बहुत ही निर्भीक, मजबूत और गहरे रूप से राजनीतिक- सामाजिक समझ रखने वाले पत्रकार हैं वे ।

सुरेंद्र किशोर जी पत्रकारिता में आने से पूर्व समाजवादी युवजन सभा के कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय थे, लेकिन बहुत जल्द ही उनका उस राजनीति से मोहभंग हो गया । उस राजनीति से जुड़ाव के मूल में यह आस्था थी कि वह परिवर्तन का हथियार बन सकती है ।लेकिन एक लंबा दौर गुजरने के बाद उन्होंने यह महसूस किया कि जिस कल्चर से वह घृणा करते हैं, वही कल्चर उनके संगठन में पनप रही है । ऐसे में पत्रकारिता को ही समाज-सेवा समझकर अपनाया और फिर उसी के होकर रह गए ।

पत्रकारिता की तरफ उनका झुकाव छात्र-जीवन से ही था I पत्र- पत्रिकाओं में पत्र-लेखन से उनकी पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी I फिर एक अपने जिले के स्थानीय समाचार-पत्र ” सारण संदेश ” में रिपोर्टिंग करने लगे ।कुछ दिनों बाद पटना से प्रकाशित साप्ताहिक ” लोकमुख ” में बतौर उप-संपादक जुड़ गए । यह बात आज से 53 साल पहले 1969 की है । इसके संपादक प्रो. देवीदत्त पोद्दार थे, जिन्हें सुरेंद्र किशोर जी पत्रकारिता का अपना पहला गुरु मानते हैं । अगले दो-तीन वर्षों तक कभी गांव तो कभी पटना आते-जाते, लेकिन 1972 में पूरी तरह पटना आ गए । 1972 से लेकर 1975 तक नई दिल्ली से प्रकाशित समाजवादी विचारों की पत्रिका ” प्रतिपक्ष ” के पटना संवाददाता के रूप में जुड़े रहे । साथ में साप्ताहिक ” जनता ” में सहायक संपादक के रूप में भी काम करते रहे । उसके बाद 1977 में वे दैनिक आज से जुड़ गए और 1983 तक वहां उप-संपादक और कार्यालय संवाददाता के रूप में काम करते रहे । आखिरी महीनों में उन्हें वरीय उप -संपादक बना दिया गया । बताते चलें कि पटना से दैनिक आज का प्रकाशन 1979 में शुरू हुआ । पटना में ” आज ” के प्रकाशन से पहले ही उन्होंने बनारस के आज संस्करण के लिए कार्य करना शुरू कर दिया था ।
फिर वे दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय दैनिक ” जनसत्ता ” से जुड़े और इस तरह वे राष्ट्रीय पत्रकारिता में एक ऐसे धूमकेतु की तरह उभरे, जिसकी रोशनी हर तरह निखरती गई। लेखनी की वो चमक आज भी बरकरार है ।

सारण जिले के दरियापुर प्रखंड स्थित सखनौली गांव में आज ही के दिन किसान परिवार में जन्मे सुरेन्द्र किशोर जी अक्सर कहते हैं कि यदि वे पत्रकार न होते तो गांव में किसानी करते और समय मिलने पर समाज सेवा I राजनीतिक दलों से दूर रहकर समाज की सेवा ।

हालांकि उनकी पत्रकारिता का आरंभ संगठन और आंदोलन से जुड़े समाचार पत्रों के साथ शुरू हुआ । सुरेंद्र किशोर मानते हैं कि सही पत्रकार होने के लिए खास राजनीतिक जुड़ाव होना कतई जरूरी नहीं, अलबत्ता उनका मानना है कि समाज के प्रति मानवीय दृष्टिकोण जरूर होना चाहिए । ईमानदार होना सबसे ज्यादा जरूरी है ।राजनैतिक जुड़ाव से न्यायाधीश वाली भूमिका नहीं रह जाती । हां, यदि सही राजनीतिक विचारधारा की पृष्ठभूमि या पढ़ाई हो तो उससे सहायता मिलती है ।पत्रकारों का राजनेताओं, मंत्रियों से गहरे जुड़ाव को वे पत्रकारिता के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मानते हैं । उनका यह भी मानना है कि अधिकतर राजनेता पत्रकारों को सिर्फ दो ही रूप में देखना चाहते हैं- दोस्त, समर्थक या दलाल अथवा आलोचक, विरोधी या दुश्मन जबकि सही पत्रकार का स्वरूप किसी न्यायाधीश से मिलता-जुलता होना चाहिए I आमतौर पर किसी राजनेता को यह पसंद ही नहीं आता । पत्रकारों का राजनेताओं और मंत्रियों से गहरा लगाव प्रमुख बाधक है ।

बताते चलें कि प्रभाष जोशी भी कहते थे कि प्रेस की स्वतंत्रता इस पैमाने से नापी जा सकती है कि वह प्रेस का सरकार से कितना ” तनाव ” रहता है ।
” निष्पक्ष, निर्भीक व आदर्श पत्रकारिता का दूसरा नाम हैं- सुरेंद्र किशोर ” सुनकर पत्रकारिता से जुड़े हर व्यक्ति को गर्व का अनुभव होता है I यही उनकी सबसे बड़ी कमाई और उपलब्धि है ।

उन्हें भी इस बात पर संतोष और गर्व है कि जिस उद्देश्य से वे पत्रकारिता में आए, एक हद तक उन्होंने उसे पूरा किया ।

” मालंच नई सुबह ( सम्पादक नीरव समदर्शी )”, पटना में
प्रकाशित आलेख का संपादित अंश

-डॉ ध्रुव कुमार
अध्यक्ष, आईएफडब्ल्यूजे (इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ) बिहार इकाई

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