यूपी में पत्रकारों के साथ बदसुलूकी में इजाफा, उर्दू पत्रकार भी उपेक्षित

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ  कहा जाता है, मगर इन दिनों देश में पत्रकारों के साथ बदसुलूकी की घटनाओं में इजाफा हुआ. अगर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में ऐसे मामलों में काफी वृद्धि हुई है. और बदसुलूकी की इन घटनाएं ज़्यादातर सरकारी अमले की लापरवाही के कारण घटी है. वहीं, उत्तर प्रदेश में उर्दू पत्राकारों की उपेक्षा भी चरम पर है.

नौकरशाही के लिए लखनऊ से परवेज आलम की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में चौथे स्‍तंभ के कलमकारों सच लिखने का खामियाज़ा अपनी जान तक देकर गंवाना पड़ता है. मगर सरकार और प्रशासन पत्रकारों को सुरक्षा देने के मामले में संवेदहीन नजर आते हैं. इसका उदाहरण हाल ही में तब देखने को मिला, जब कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ की तरफ से अपने सरकारी आवास पांच कालिदास मार्ग पर पत्रकारों के लिए रात्रि भोजन का कार्यक्रम रखा गया, जिसमें चुनिंदा पत्रकार ही बुलाये गए. इस कार्यक्रम में एक और ख़ास बात देखने को मिली कि मुख्‍यमंत्री के बुलाये गए चुनिंदा पत्रकारों में एक भी उर्दू के पत्रकार यानी मुसलमान खबरनवीस आमंत्रित नहीं किए गए. शायद योगी के सिपहसलारों ने इसकी जरूरत नहीं समझी.

“सबका साथ सबका विकास” का नारा देने वाली सरकार शायद उत्तर प्रदेश में इसके लिए अभी मानसिक तौर पर तैयार भी नहीं है, वरना सरकार द्वारा उर्दू के पत्रकारों की यूं उपेक्षा न होती है, और मुख्‍यमंत्री के भोज में चुनिंदा पत्रकार नहीं बुलाये जाते.

दूसरा वाकिया लखनऊ से है, जहां लखनऊ से ही प्रकाशित एक सांध्‍य दैनिक समाचार पत्र के दफ्तर पर कुछ अराजक तत्‍वों ने हमला बोल दिया. तोड़ – फोड़ की. ऐसी घटनाओं में साथ देने वाला एक मुस्लिम पत्रकार भी था मगर योगी सरकार ने उन्‍हें भी अपने भोज में बुलाना जरूरी नहीं समझा. इसके अलावा हद तो तब हो गई, जब बजट सत्र को कवर करने गए सूबे के प्रतिष्ठित पत्रकारों को विधान सभा के कैंटीन में भोजन करने जा रहे पत्रकारों को बलपूर्वक रोक दिया.

बात यहीं खत्‍म नहीं हुई. जो पत्रकार पहले से कैंटीन में पहुंच कर खाना शुरू करने वाले थे, उनके हाथ से भी थाली वापस ले ली गई. इस बेइज्‍जती के बाद मैजूद पत्रकारों ने कैंटीन में ही हंगामा शुरू कर दिया, जिसके बाद संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्‍ना ने बीच बचाव कर मामले को शांत कराया.  अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि पत्रकारों के साथ इस तरह का दुर्यव्यवहार क्या ऐसे ही होता रहेगा या कोई सरकार इस पर ठोस क़दम उठाएगी ?

 

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