पर्दाफाश: कारवान-ए-उर्दू पुरस्कारों में हेराफेरी

नौकरशाही डॉट इन को पता चला है कि कारवान-ए-उर्दू द्वारा पत्रकारों को पुस्कार में दी गई राशि में डंडीमारी व पुरस्कार कैटेगरी में अदलाबदली की गई.इन पुरस्कारों को लालू यादव के हाथों दिलवाया गया था.

इर्शादुल हक

इस समारोह का आयोजन कारवान-ए-उर्दू की तरफ से हर साल 10 जनवरी को किया जाता है.इसके कनवेनर विधान परिषद में विरोधी दल के नेता गुलाम गौस हैं.

उर्दू के विख्यात पत्रकार और बिहार सरकार के पूर्व मंत्री गुला सरवर के जन्म दिन पर कारवान-ए-उर्दू की तरफ से उर्दू दिवस मनाया जाता है.इस अवसर पर इस संगठन ने बिहार के पांच पत्रकारों को सम्मानित किया था

इनमें डाक्टर रैहान ग़नी, अशरफ अस्थानवी, अहमद रज़ा हाशमी, मासूम शरफी और सिराज अनवर शामिल हैं.

तय था कि पुरस्कृत होने वाले सभी पत्रकारों को पांच-पांच हजार रुपये, प्रशस्तिपत्र, मोमेंटो और शाल दिये जायेंगे.

लेकिन एक पत्रकार के लिफाफे में मात्र दो हजार रुपये थे.यानी उनको पांच हजार रुपये के बजाये मात्र दो हजार रुपये ही दिये गये.

हैरत में डालने वाली बात तो यह है कि उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार डा. रैहान गनी को गुलाम सरवर पत्रकारिता पुरस्कार देने की घोषणा की गई थी जबकि ऐन वितरण के दौरान यह पुरस्कार मासूम शरफी असीर को दे दिया गाया. जबकि असीर को शाह मुश्ताक सम्मान के लिए चुना गया था.

इन पुरस्कारों में गुलाम सरवर पत्रकारिता पुरस्कार सबसे बड़ा माना जाता है.इस तरह रैहान गनी को सम्मान की जगह अपमानित होना पड़ा. रैहान गनी ने ने इस संबंध में कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.

ऐन वक्त पर किसी का पुरस्कार किसी दूसरे को देना कारवान-ए-उर्दू के रवैये पर सवाल खड़ा करता है.

सूत्रों का यहां तक कहना है कि इन पुरस्कारों में किसी को प्रशस्तिपत्र भी नहीं मिला.यानी जिन पत्रकारों को ये पुरस्कार दिये गये उनके पास इस बात का कोई लिखित प्रमाण नहीं है कि उन्हें पुरस्कार से नवाजा गया है.

इस कार्यक्रम में बिहार के कई नामचीन राजनीतिक हस्तियां शामिल थीं. लालू प्रसाद ने इस कार्यक्रम में लोगों की भीड़ देखते हुए यहां तक घोषणा कर दी कि अगले साल उनकी पार्टी अपनी तरफ से पुरस्कार देगी और पुरस्कार की राशि पांच हजार से बढ़ा कर पचास हजार रुपये की जायेगी.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मात्र पांच हजार की राशि में से एक पत्रकार को सिर्फ दो हजार मिले, तो अब आगे क्या होगा.
सवाल यह भी उठने लगे हैं कि पहली बार ही किसी के नाम से घोषित पुरस्कार किसी और को दे दिया जाये तो कारवान-ए-उर्दू की निष्ठा सवालों के घेरे में तो आ ही जायेगी.

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