पश्चिम बंगाल में मुस्लिम-दलित गोलबंदी का अनोखा प्रयोग

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम दलित और आदिवासियों की गोलबंदी का एक व्यापक आंदोलन आकार ले रहा है.  दशकों तक कम्युनिस्ट शासन में रहे पश्चिम बंगाल के लिए यह एक नया प्रयोग है जिसकी जड़ें मजबूत हो रही हैं.

Sheikh Suleman and Abul kasim

Sheikh Suleman and Abul kasim

Irshadul Haque, Editor, naukarshahi.com

हावड़ा के सीमावर्ती क्षेत्र के हाई स्कूल आनंद निकेतन विद्या मंदिर के शिक्षक शेख सुलेमान के मन में यह बात अकसर कचोटती रहती थी कि मनुवादी विचारों से जितना नुकसान दलित समाज को होता है उतना ही इसका खामयाजा मुसलमानों को उठाना पड़ता है. इसलिए सुलेमान अकसर यह महसूस करते थे कि एक ऐसे संगठन की स्थापना की जाये जो मनुवादी विचारों के खिलाफ मानवतावादी विचारों को लोगों तक पहुंचा सके.

लेकिन उनके लिये समस्या यह थी कि वह स्कूल शिक्षक होने के नाते राजनीतिक गतिविधियों में डायरेक्ट नहीं उतर सकते थे. लेकिन मनुवादी और साम्प्रदायिक विचारों को मात देना समय की पुकार थी. इसलिए सुलेमान इंडियन युनिटी सेंटर नामक सामाजिक संगठन बना कर इस काम को करते रहे. लेकिन 2008 में जब वह शिक्षक की नौकरी से रिटायर हुए तो उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर इंडियन युनिटी सेंटर को राजनीतिक दल का रूप दे दिया. चूंकि वह सामाजिक रूपसे इस संगठन के सहारे लगातार 16 वर्षों तक आंदोलन चलाते रहे इसलिए इन 16 वर्षों में इंडियन युनिटी सेंटर यानी आईयुसी ने पश्चिम बंगाल के ज्यादतर जिलों में अपनी जड़ें जमा ली.

 

समाज के हाशिये को लोगों- मुस्लिम, दिलत, पिछड़े और आदिवासियों में इस संगठन की खासी पहचान और पकड़ बन जाने के बाद सन 2011 के 21 मार्च को  आईयुसी ने खुद को चुनाव आयोग से एक राजनीतिक दल की मान्यता प्राप्त कर ली. 2009 में सुलेमान ने इस पार्टी की तरफ से लोकसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गये. लेकिन इस चुनाव से उन्हें व्यापक पहचान मिलनी शुरू हुई.

प्रेरणा

सुलेमान कहते हैं- 1970-80 के दशक में कांशी राम के आंदोलन से उन्हें प्रेरणा मिली. जब कांशी राम हाशिये के लोगों को सफलतापूर्वक गोलबंद कर लिया तो मुझे लगा कि ऐसा प्रयोग पश्चिम बंगाल में होना चाहिए. पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की 24 प्रतिशत आबादी है. इसलिए हमने यह तय किया कि मुस्लिम-दलित और आदिवासी समाज का एक व्यापक मंच बने. इसी उद्देश्य से हम आगे बढ़े. तब पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों की सरकार थी.

आईयूसी का फउंडेशन डे

आईयूसी को चुनाव आयोग ने 21 मार्च 2011 को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में स्विकृति दी थी. इसलिए यह संगठन हर वर्ष 21 मार्च को अपना स्तापना दिवस मनाता है. पिछले दिनों 21 मार्च 2015 को आईयूसी ने कोलकाता में अपना स्तापना दिवस समारोह मनाया. इस अवसर पर संगठन के एक हजार से ज्याद नुमाइंदे पहुंचे.

इस समरोह ने यह साबित करने के लिए काफी रहा कि इसके एक- एक कार्यकर्ता में जबर्दस्त जोश और अपने संगठन के प्रति गजब का समर्पण है. आईयूसी ने इस सभा में घोषणा की कि वह 2017 में पश्चिम बंगाल में होने वाले एसेम्बली चुनाव में अपने 50 उम्मीदवार उतारेगी. संगठन ने इस अवसर पर ऐलान किया कि उसके लिए सत्तादारी तृणमूल कांग्रेस, विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टियां, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टियां एक जैसी हैं जिनके खिलाफ जनसंघर्ष के द्वारा ही लोगों में चेतना लाई जा सकती है.

 

लेकिन हकीकत में यह मनुवादी विचारों को आगे बढ़ाने वाली सरकार थी जो कहने को तो सर्वहरा की बात करती है लेकिन व्यावहारिक रूप से वह हाशिये के लोगों से छल करी है. सुलेमान कहते हैं कि कम्युनिस्टों के बाद तृणमूल कांग्रे की सरकार ममता बनर्जी के नेतृत्व में आयी तो चारित्रिक रूप से यह भी उसी ढ़र्रे पर चलने लगी. ऐसे में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम, दलित, पिछड़े और आदिवासियों की, जिनकी आबादी कुल आबादी की 80 प्रतिशत से ज्यादा है, को एक बैनर के नीचे गोलबंद करने की जरूरत और बढ़ गयी.

सुलेमान लगातार अपने संगठन को मजबूत करने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे जोड़ने के मिशन में लगे रहे. इस दौरान उन्हें अबुल कासिम जैसे विचारक और  काजी कमुरुज्जमा जैसे युवा और तेजतर्रार

काजी कमरुज्जमा: युवा रणनीतिकार

काजी कमरुज्जमा: युवा रणनीतिकार

रणनीतिकारों का साथ मिला.

फैलती जड़ें

पिछले चार- पांच वर्षों में आईयूसी ने न सिर्फ अपनी पहचान पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में बना ली है बल्कि  हावड़ा, मिदनापुर, मुरशीदाबाद समेत दस जिलों में इसकी जड़े काफी मजबूत हो चुकी हैं

आईयूसी इस विचार को प्रसारित करने में लगा है कि मुस्लिम, दलित और आदिवासी समुदाय की युनिटी कमजोर वर्गों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास के दरवाजे खोलेगा और उनके संग सत्ता द्वारा की जारी ही उपेक्षा खत्म होगी. आईयूसी के लिए यह संतोष की बात है कि उसके संग पश्चिम बंगाल के दलित और आदिवासी वर्ग की व्यापक हिमायत बढ़ी है.

शेख सुलेमान आईयूसी के उपाध्यक्ष हैं और इसके अध्यक्ष अबुल कासिम हैं. कासिम ने जर्मन भाषा विशेषज्ञ के रूप में तीन दशक तक काम किया है. उनकी पहचान एक सामाजिक चिंतक की तरह भी है. वह कहते हैं कि भले ही मैं आईयूसी का प्रेसिडेंट हूं पर व्यावहारिक तौर पर इसकी जिम्मेदारी सुलेमान के ऊपर ही है. कासिम कहते हैं कि सामंतवादी और मनुवादी शोषण के खिलाफ हमारी गोलबंदी का इतना प्रभाव तो हो ही गया है कि सत्ता मैं बैठे राजनीतिज्ञों की आंखों में हम खटकने लगे हैं.

आयूसी के युवा रणनीतिकार काजी कमुरुज्जमा संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर, समान विचारों वाले संगठनों से जोड़ने की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं. अभी तक उन्होंने संगठ को महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में अपना नेटवर्क बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. हालांकि काजी कहते हैं कि उनकी प्रायोरिटी पश्चिम बंगाल ही है. काजी कहते हैं कि हमारी लड़ाई न सिर्फ मनुवादी और सामंतवादी सोच वाली श्क्तियों के खिलाफ हैं. वह कहते हैं कि सामंतवादी सोच वाले लोग मुस्लिम और हिंदू दोनों समुदायों में है.

 

 

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