पसमांदा साहित्य की गुंजाईश तलाशता उर्दू अदब, नयी शुरूआत

क्या उर्दू साहित्य में हाशियाई आबादी के किरदारों की अक्कासी के बहाने उर्दू अदब में एक नये विधा- पसमांदा साहित्य का विकास हो रहा है ? पटना में आयोजित इस बहस से तो कुछ ऐसा ही लगता है
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इर्शादुल हक

आम तौर पर उर्दू साहित्य में इस तरह के आयोजनों की कोई जगह नहीं होती. हां हिंदी साहित्य में ऐसे आयोजन अकसर होते रहते हैं. लेकिन बिहार की अंजुमन तरक्की ए उर्दू को प्रोफेसर सफदर इमाम कादरी ने इस बात के लिए आमादा कर लिया- कार्यक्रम था समकालीन उर्दू साहित्य में हाशिये की आबादी के किरदारों पर सेमिनार का आयोजन. हिंदी साहित्य में दलितत या बहुजन साहित्य एक स्थापित विधा के तौर पर प्रचलित है. लेकिन शायद यह पहली बार हुआ है कि उर्दू साहित्य में हाशियाई आबादी के किरदारों की चर्चा के बहाने पसमांदा अदब (साहित्य) की गुंजाइशों की तलाश की जाये.

25 और 26 फरवरी को पटना के उर्दू भवन में आयोजित इस सेमिनार को नेशनल लुक देने से लेकर हाशियाई आबादी की उर्दू में भूमिका के विभिन्न पहलुओं की जोरदार चर्चा ने उर्दू अदब में एक नये अध्याय की शुरूआत हो गयी है. इस अवसर पर सफदर इमाम की नजामत में कई शोध पत्र पढ़े गये. अलीगढ विश्वविद्यालय के प्रो अली रिफाद फतिही ने उर्दू अदब में हाशियाई किरदारों पर बहस करते हुए बताया कि मौजूदा दौर में मुशर्रफ आलम जौकी से लेकर इलियास अहमद गद्दी तक और बीते दौर में कुरुतुलऐन हैदर तक ने हाशिए के लोगों के किरदारों को बड़ी मजबूती से रखने की कोशिश की है.

इसी तरह उन्होंने फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि 1934 में एक जर्मन डायरेक्टर ने भारतीय पृष्ठभूमि पर दलित लड़की और ब्रह्मण युवा के प्रेम को दिखाया है.

फतिही ने इस बात को बारीकी से रेखांकित किया कि आखिर ऐसे साहित्य का भरमार क्यों है जिसमें अकसर ब्रह्मण लड़के और दलित लड़की के प्रेम का चित्रण तो मिलता है पर दलित लड़के और ब्रह्मण लड़की के प्रेम का चित्रण आसानी से नहीं दिखता. इस अवसर पर वरिष्ठ उर्दू साहित्याकार शफी जावेद ने एक अफसाना हसब-नसब का जिक्र करते हुए कहा कि कैसे इस अफसाने में हाशिया के किरदारों के दर्द को दिखाया गया है जहां जात और नस्ल के नाम पर शोषण की तस्वीर दिखती है.

इस आयोजन को बिहार सरकार के अंजुमन तरक्की ए उर्दू ने कौमी काउंसल बराये फरोग उर्दू की सहायता से अंजाम दिया. अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के मंत्री शाहिद अली खान ने समारोह का उद्घाटन किया और भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार ऐसे आयोजनों को हमेशा मदद के लिए तैयार है.

इस अवसर पर राजस्थान की साहित्यकार सरवत खान ने अपने विचार रखते हुए कहा कि उर्दू साहित्य में गिरोहबंदी के कारण कई महत्वपूर्ण पहुलू नजर अंदाज कर दिये गये हैं. शाहिद अली खान ने इस अवसर पर सफदर इमाम कादरी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक नयी-पुरानी किताबें का विमोचन भी किया.
कार्यक्रम की शुरूआत में अंजुमन तरक्की ए उर्दू के सचिव अब्दुल क्यूम अंसारी ने स्वागत भाषण दिया.

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