पाकिस्तान में ताहिरुल कादरी की राजनीतिक सूनामी

कौन हैं यह ताहिरुल कादरी जिन्होंने महज दो हफ्ते में पाकिस्तान में राजनीतिक कोहराम मचा दिया है. वाशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय मामलों के हमारे सम्पादक तुफैल अहमद ताहिरुल कादरी नामक राजनीतिक सूनामी के बारे में गहरी छानबीन की है-

19 फरवरी 1951 में जन्में डॉ. ताहिरुल क़ादरी पांच सालों तक इंग्लैंड और कनाडा में आत्म निर्वासन के बाद 23 दिसम्बर 20 12 को पाकिस्तान लौटते ही एक बड़ी रैली का आयोजन किया. इसमें उन्होंने पाकिस्तानी सरकार को उखाड़ फेकने का आह्वान किया.

सुसाइड बम के तालीबानी सिद्धांत के खिलाफ फतवा देकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर उभरे ताहिरुल कादरी एक मध्यमार्गी विचार वाले बरैलवी मसलक के मुसलमान हैं और मुमताज मलिक कादरी के पैरुकार हैं.
ताहिरुल कादरी की पाकिस्तान वापसी एक बड़े धमाके के रूप में देखा जा रहा है.उनकी वापसी विरोधी इस्लामी विद्वानों और राजनीतिक पार्टियों के लिए सबसे बड़ा सरदर्द बन गया है.विख्यात इस्लामी विद्वान और जमाअत उलेमा-ए-इस्लाम पार्टी( जेयूआईएफ) के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान ने तो “राजनीत नहीं, देश बचाओ” के उनके नारे को ही गैरकानूनी करार दिया है.

इधर ताहिरुल कादरी नामी पाकिस्तानी सुनामी के पीछे मिल रहे आपार जनसमर्थन से कुछ लोग यह सवाल उठाने लगे हैं कि इनके पीछे कहीं कुछ छुपी हुई शक्तियां तो काम नहीं कर रही हैं.कुछ लोगों का इशारा है कि पाकिस्तान फौज, आईएसआई, अमेरिका और इंग्लैंड जैसी ताकतें ताहिरुल कादरी के पीछे हो सकती हैं.

ताहिरुल कादरी पाकिस्तान के पूर्व सांसद भी हैं और उन्होंने 25 मई 1989 को एक पार्टी भी बनाई थी, पाकिस्तान अवामी तहरीक.हालांकि उनकी पार्टी का कोई संगठनात्मक ढांचा नहीं है पर बरैलवी मसलक के लोगों की बड़ी तादाद उनका समर्थन करती है. उनके इस मजहबी सोच( बरैलवी मसलक) के पैरूकार पाकिस्तान, भारत के अलावा इंगलैंड, कनाडा, अमेरिका समेत अनेक देशों में भी हैं.

ताहिरुल कादरी की राजनीति ने अचानक बरैलवी मसलक के मुसलमानों में जबर्दस्त गोलबंदी की फिजा बना दी है क्योंकि वह इस आंदोलन के बड़े नेताओं में से एक रहे हैं और मिनहाजुल कुरआन इंटरनेशनल संगठन के द्वारा दुनिया भर के मुसलमानों को गोलबंद करने की कोशिश करते हैं.

ताहिरुल कादरी खुद को पाकिस्तान बचाने वाला पैगम्बर के दूत के रुप में घोषित कर रहे हैं. वह कहते हैं पैगम्बर मोहम्मद साहब ने उन्हें सपने में आकर कहा है कि, “अगर तुम चाहते हो कि मैं पाकिस्तान में रहूं तो शर्त यह है कि सिर्फ तुम्हें मेरा मेजबान बनना होगा, इसलिए अपने संगठन मिनहाजुल कुरान को मजबूत करो”.

निंदा कानून पर दोमुहा बयान

निंदा कानून पर ताहिरुल कादरी काफी हद तक बढ़बोले और दोमुहे साबित हुए हैं.एक ही संवेदनशील मुद्दें पर अंग्रेजी अखबार को वह कुछ बयान देते हुए पाये जाते हैं तो उर्दू अखबार को कुछ और कहते हुए पाये जाते हैं.वह उर्दू अखबार में बयान देते हुए कहते हैं, “पैगम्बर मुहम्मद साहब की शान में गुस्ताखी करने वाला को भी व्यक्ति हो चाहे वह मुस्लिम हो, यहूदी हो, क्रिश्चन हो, हिंदू हो या कोई भी हो- उसकी सजा मौत है”. हालांकि दूसरे ही पल जब वह अंग्रेजी अखबार से बात करते हैं तो इसी मुद्दे पर कुछ यूं कहते हैं-“ यह कानून गैरमुस्लिमों, यहूदियों आदि पर लागू नहीं होता”.

2012 में भारतीय शहर वडोडरा में ताहिरुल कादरी ने दौरा किया था.तब पत्रकारों ने उनसे भारत में होने वाले आतंकवादी हमलों के बारे में पूछा था तो उन्होंने पाकिस्तानी आंतकी ग्रूपों की आलोचना करने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि भारत-पाक के बीच किसी मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे.उन्होंने कहा था कि ऐसा करने से दोनों देशों के बीच गलतफहमी बढ़ेगी.

ताहिरुल कादरी ने इस्लाम पर काफी पुस्तकें लिखीं हैं. उनकी वेबसाइट पर तो दावा किया गया है कि उन्होंने उर्दू, अंग्रेजी और अरबी में एक हजार पुस्तकें लिखीं हैं. वेबसाइट का दावा है कि कादरी ने इस्लाम की शांति के संदेश और उसके उसूलों को वास्तविक संदर्भों में दुनिया के सामने रखा है.

अपने अनेक साक्षात्कारों में ताहिरुल कादरी ने आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की है. लेकिन यह भी सच है कि यह वही कादरी हैं जो अफगानिस्तान में तालीबान के आत्मघाती हमलों के विरुद्ध कुछ भी कहने से बचते रहे हैं.

ताहिरुल कादरी ने इस्लामाबाद में अपने एक लाख समर्थकों के साथ डटे हुए हैं और एक राजनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया है.वह आह्वान कर रहे हैं कि पाकिस्तानी सरकार, चुनाव आयोग और तमाम राज्य सरकारों को बर्खास्त कराकर ही वह दम लेंगे. ऐसे में लोकतांत्रिक शक्तियों की आलोचना का भी वह शिकार हो रहे हैं. इन शक्तियों का कहना है कि ताहिरुल कादरी लोकतंत्र के लिए खतरा साबित हो सकते हैं.खास कर तब जब अपने वजूद में आने के बाद पहली बार पाकिस्तान की सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल फरवरी 2013 में पूरा कर रही है.

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