पुस्तक ‘हां, मैं बिहारी हूं’ का लोकार्पण

बिहारियों में अपने जड़ के प्रति असीम आकर्षण और अपनों के प्रति दुर्लभ लगाव और श्रद्धा होती है। बिहारी संसार में चाहे जहां हों सबके प्रति सम्मान का भाव नही भूलते। यह भाव ही हमारी अस्मिता और संस्कृति है। हमारी प्रतिभा अद्वितीय है। हम सहनशील हैं किंतु अस्मिता पर चोट बर्दास्त नही कर सकते।IMG_20160805_170011_HDR

कोई हमें चुनौती दे तो हम साहस से यह कहते हैं, हां हम बिहारी हैं और इस पर हमें गर्व है। यह विचार आज यहाँ, बिहार विधान परिषद सभागार में, चर्चित युवा उपन्यासकार विवेकानंद झा की पुस्तक ‘हां, मैं बिहारी हूं’ का लोकार्पण करते हुए, परिषद के सभापति डा अवधेश नारायण सिंह ने व्यक्त किये। श्री सिंह ने पुस्तक के लेखक को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि, लेखक ने अवश्य हीं अपने बिहारीपन पर गैरों से चोट खाकर पीड़ा के अतिरेक में इस पुस्तक की रचना की, लेकिन इसके माध्यम से लेखक ने बिहारी अस्मिता को जागृत किया है।

 

समारोह के मुख्य अतिथि और राज्य के राजस्व एवं भूमि-सुधार मंत्री डा मदन मोहन झा ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि,यह पुस्तक बिहारी कह कर चिढाये जाने वाले बिहारी नौजवानों के मन से हीनता की भावना से ऊबरने तथा अपनी अस्मिता पर गौरव करने की उर्जा प्रदान करेगी।

 

समारोह की अध्यक्षता करते हुए बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने लोकार्पित पुस्तक को राष्ट्रीय भावना के परिप्रेक्ष्य में, बिहारी अस्मिता को उत्प्रेरित करने वाली पुस्तक की संज्ञा दी। डा सुलभ ने कहा कि, वृति के लिए बिहार से निकल कर मुंबई सहित देशके विभिन्न महानगरों और प्रांतों का रुख करने वाले बिहारी नौजवानों के ऊपर हुए और हो रहे अत्याचारों का मार्मिक प्रतिवेदन देने वाला यह उपन्यास देश के शासक और समाज, दोनों ही के समक्ष, अनेक प्रश्न भी खड़ा करता है तो दूसरी ओर युवाओं को तसल्ली देते हुए उनमें संघर्षों से लड़ने की नवीन-उर्जा भी प्रदान करता है।

डा सुलभ ने कहा कि लेखक ने बिहारी-अस्मिता के साथ राष्ट्रवाद को बड़े हीं प्रभावशाली ढंग से कथा रूप में रखा है। कथा-शिल्प, कथोपकथन और पठनीयता की दृष्टि से भी पुस्तक स्तरीय साहित्य का उदाहरण है। पुस्तक का पाठक समुदाय द्वारा हार्दिकता से स्वागत किया जायेगा, ऐसा विश्वास किया जा सकता है।

पुस्तक के लेखक विवेकानंद झा ने इस उपन्यास के सृजन की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए, इसके प्रणयन के अपने अनुभव को बाँटा। लेखक ने कहा कि उन्होंने 9 महीने तक मुंबई में रहकर, बिहारी छात्र-नौजवानों के साथ हुए जघन्य अपराधों पर शोधपरक प्रतिवेदन तैयार किये तथा फ़िर इस उपन्यास का लेखन किया। इस उपन्यास के पात्र अवश्य काल्पनिक, कथा सत्य-घटनाओं पर आधारित है।

 

बिहार बाल संरक्षण आयोग की पूर्व अध्यक्ष निशा झा, पर्यावरणविद डा दिनेश मिश्र, तथा कामेश्वर झा ने भी अपने विचार व्यक्त किये।  इस अवसर पर, न्यायमूर्ति मृदुला मिश्र, साहित्य सम्मेलन के अर्थ मंत्री योगेन्द्र प्रसाद मिश्र, आचार्य आनंद किशोर शास्त्री, डा तपसी ढेंक, नेहाल कुमार सिंह ‘निर्मल’ अभिजीत पाण्डेय समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार व प्रबुद्धजन उपस्थित थे। अतिथियों का स्वागत अधिवक्ता अजय कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तक के हिन्दी अनुवादक इंद्रजीत सिंह परमार ने किया।

 

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