पूर्णिया: पचपवनिया और पचफोरना की रही है असर

बिहार की राजनीति में पचपवनिया शब्द खासा चर्चित है। इसके पर्याय के रूप में पचफोरना शब्‍द भी प्रचलित है। दरअसल इस शब्द का इस्तेमाल उन जाति समूहों के लिए किया जाता है, जिनकी संख्या काफी होती है। जाति व्यवस्था में इन जातियों का काम सेवा प्रदान करना था। इनकी बसावट हर गांव में मिल जाएगी, लेकिन इनकी संख्या काफी कम होती है, लेकिन इन जातियों को मिलाकर एक बड़ी ताकत मिल जाती है। उत्तर बिहार के कोसी और सीमांचल में इन जातियों की आबादी काफी है। सीमांचल में एक लोकसभा क्षेत्र है पूर्णिया।
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वीरेंद्र यादव के साथ लोकसभा का रणक्षेत्र – 15
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सांसद — संतोष कुशवाहा — जदयू — कुशवाहा
विधान सभा क्षेत्र — विधायक — पार्टी — जाति
कसबा — अफाक आलम — कांग्रेस — मुसलमान
बनमनखी — कृष्ण कुमार ऋषि — भाजपा — मुहसर
रुपौली — बीमा भारती — जदयू — गंगोता
धमदाहा — लेसी सिंह — जदयू — राजपूत
पूर्णिया — विजय खेमका — भाजपा — माड़वाड़ी
कोढ़ा — पूनम पासवान — कांग्रेस — पासवान
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2014 में वोट का गणित
संतोष कुशवाहा — जदयू — कुशवाहा — 418826 (42 प्रतिशत)
उदय सिंह — भाजपा — राजपूत — 302157 (30 प्रतिशत)
अमरनाथ तिवारी — कांग्रेस — ब्राह्मण — 124344 (12 प्रतिशत)

सामाजिक बनावट
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सीमाचंल की सामाजिक बनावट में सर्वाधिक संख्या मुसलमान वोटरों की है। मुसलमानों के बाद यादवों की संख्या है। इसके बाद ब्राह्मण और फिर राजपूतों की संख्या मानी जाती है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में मुख्य मुकाबला यादव और राजपूत के बीच ही होता रहा है। माना जाता है कि पिछला चुनाव जदयू के उम्मीदवार राजद के आधार वोट यादवों के सपोर्ट के कारण निर्वाचित हुए। यादवों को कांग्रेस के ब्राह्मण उम्मीदवार की तुलना में कुशवाहा ज्यादा सहज लगे और उनका समर्थन कर दिया।

1991 का चुनाव हो गया था काउंटरमाइंड
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1991 के लोकसभा चुनाव को चुनाव आयोग ने काउंटरमाइंट कर दिया था यानी रद्द कर दिया था। इस चुनाव में निर्दलीय पप्पू यादव सर्वाधिक वोट मिला था, लेकिन चुनाव में धांधली के आरोप में चुनाव आयोग ने चुनाव रद्द कर दिया था। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, बाद में हुए चुनाव में पप्पू यादव निर्वाचित हुए थे।
कौन-कौन हैं दावेदार
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पूर्णिया सीट पर अभी जदयू का कब्जा है। एनडीए के दौर में लंबे समय तक यह सीट भाजपा के कोटे में जाती रही है। अब यह सीट जदयू की है। बिहार में दो ही सीट जदयू के कब्जे में है। वैसी स्थिति में जदयू पूर्णिया सीट भाजपा के लिए छोड़ दे, यह संभव नहीं लगता है। हालांकि अंदर खाने में यह भी चर्चा है कि पूर्णिया सांसद संतोष कुशवाहा को राज्य सरकार में शामिल करने की शर्त पर उनसे सीट पर अपना दावा त्यागने का आग्रह किया जा रहा है, ताकि यह सीट भाजपा के लिए छोड़ा जा सके। लेकिन इसकी संभावना कम ही है। क्योंकि विधानमंडल में अभी कोई वैकेंसी नहीं है। या फिर यह भी हो सकता है कि संतोष कुशवाहा पूर्णिया में जदयू के बदले भाजपा के उम‍मीदवार बन जायें। संतोष जदयू के सांसद बनने से पहले भाजपा के विधायक ही थे।


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उधर यह भी माना जा रहा है कि पिछले चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार रहे उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार हो सकते हैं। इसके लिए लॉबिंग भी शुरू हो गयी है। हालांकि पिछली बार कांग्रेस के उम्मीदवार रहे अमरनाथ तिवारी कहते हैं कि महागठबंधन में यह सीट कांग्रेस के खाते आएगी और वे भी कांग्रेस की उम्मीदवारी का दावा करेंगे। महागठबंधन में पूर्णिया और मधेपुरा के बीच एक नया सेतु बनाने का प्रयास भी किया जा रहा है। हालांकि अभी उसका स्वरूप सामने नहीं आया है।


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