पूर्वी चंपारण : मोतिहारी की जमीन पर लहलहाता रहा है ‘भूराबाल’

पूर्वी चंपारण लोकसभा सीट पहले मोतिहारी के नाम से जाना जाता था। 2008 में हुए परिसीमन के बाद मोतिहारी का नाम पूर्वी चंपारण हो गया। यह भी गौरतलब है कि प्रशासनिक ईकाई पूर्वी चंपारण जिले का मुख्या लय मोतिहारी ही है। मोतिहारी लोकसभा के तहत कुछ विधानसभा क्षेत्रों की हरेफेर के साथ पूर्वी चंपारण नाम से नयी लोकसभा सीट बनी। यह सीट परंपरागत रूप से सवर्ण आधिपत्य वाली रही है। विभूति मिश्रा और राधामोहन सिंह यहां से पांच-पांच बार निर्वाचित हुए हैं। 1952 से 1971 तक विभू‍ति मिश्र पांच बार निर्वाचित हुए थे। सवर्णों के हाथ से यह सीट निकली तो बनियों के हाथ में पहुंच गयी। प्रभावती गुप्ता और रमा देवी एक-एक बार इस सीट से निर्वाचित हुईं और दोनों कलवार बनिया थीं। इस सीट पर सवर्ण प्रभाव के कारण ही राजद के टिकट पर इस सीट से 2004 में भूमिहार अखिलेश सिंह निर्वाचित हुए थे, जो अरवल जिले के रहने वाले हैं। पिछले 2014 के चुनाव में राजद कायस्थ विनोद श्रीवास्तव को अपना उम्मीदवार बनाया था। 
वीरेंद्र यादव के साथ लोकसभा का रणक्षेत्र – 14
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सांसद — राधा मोहन सिंह — भाजपा — राजपूत
विधान सभा क्षेत्र — विधायक — पार्टी — जाति
हरसिद्धि — राजेंद्र कुमार — राजद — रविदास
गोविंदगंज — राजू तिवारी — लोजपा — ब्राह्मण
केसरिया — राजेश कुमार — राजद — कुशवाहा
कल्यायणपुर — सचिंद्र प्रसाद सिंह — भाजपा — भूमिहार
पीपरा — श्यामबाबू प्रसाद — भाजपा — यादव
मोतिहारी — प्रमोद कुमार — भाजपा — कानू
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2014 में वोट का गणित
राधामोहन सिंह — भाजपा — राजपूत — 400452 (49 प्रतिशत)
विनोद श्रीवास्तव — राजद — कायस्थ — 208289 (26 प्रतिशत)
अविनिश सिंह — जदयू — भूमिहार — 128604 (16 प्रतिशत)
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सामाजिक समीकरण
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पूर्वी चंपारण सीट पर पिछड़ों में बनिया की काफी आबादी है और उसी अनुपात में वोटर भी हैं। यादव वोटर की संख्या भी सवर्णों की किसी एक जाति से अधिक है, लेकिन यादव वोटरों का राजनीतिक प्रभाव कम माना जाता है। मुसलमानों की भी बड़ी आबादी पूर्वी चंपारण में बसती है। इनकी वोटिंग प्रतिशत काफी रहा है। अतिपिछड़ी जातियों में धानुक, मल्लाह और नोनिया की काफी आबादी है। थारू जनजाति भी इस क्षेत्र में बसती है। इस लोकसभा के तहत आने वाली विधान सभा क्षेत्रों की संख्यास 6 है और सभी विधायक अलग-अलग जाति के हैं। लेकिन सांसद राधामोहन सिंह का स्वजातीय राजपूत जाति का कोई विधायक नहीं हैं।

विश्वविद्यालय की राजनीति
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मोतिहारी में एक केंद्रीय विश्‍‍वविद्यालय भी है। हाल ही में विश्वविद्यालय के एक शिक्षक के साथ मारपीट की घटना के कारण मोतिहारी चर्चा में था। शिक्षक का आरोप था कि फेसबुक पर उनकी एक पोस्ट के कारण उनके साथ मारपीट की गयी। विश्वशविद्यालय की स्थापना की भी अपनी राजनीति रही है। बिहार में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने का निर्णय यूपीए सरकार ने लिया था। पहले यह विश्वविद्यालय मोतिहारी में खोलने का निर्णय लिया गया था, बाद में उसे गया स्थापनांतरि‍त कर दिया गया। इसके बाद विवाद बढ़ गया। मोतिहारी में विश्वविद्यालय खोलने और संभावित लोकेशन की चर्चा के कारण उस इलाके में जमीन की कीमत अचानक बढ़ गयी। कई जमीन माफिया थोक भाव में जमीन खरीदने लगे। लेकिन इसी बीच यूनिवर्सिटी को मोतिहारी के बदले गया स्थानांत‍रित करने की चर्चा जोर पकड़ ली। इसके बाद भू-‍माफियाओं की लॉबी सक्रिय हो गयी। और अंतत: केंद्रीय वि‍श्वविद्यालय मोतिहारी और गया दोनों जगह खोलने का निर्णय लिया गया और दोनों जगह प्रारंभ भी हुआ।
कौन-कौन हैं दोवदार
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भाजपा-नीतीश गठबंधन में यह सीट भाजपा के पास रहेगी, यह तय है। लेकिन उम्मीदवार राधामोहन सिंह रहेंगे, यह अभी कंफर्म नहीं है। भाजपा कई सीट जदयू के लिए छोड़ने वाली है और कई उम्मीदवार भी बदलने वाली है। राधामोहन सिंह के कामकाज को लेकर माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व संतुष्ट है, लेकिन टिकट का एकमात्र पैमाना बेहतर काम ही नहीं माना जाता है। महागठबंधन में भी यह सीट राजद या कांग्रेस किसी भी कोटे में जा सकती है। यह सीट राजद के कोटे में गयी तो विनोद श्रीवास्तव फिर उम्मीदवार बन सकते हैं। लेकिन कांग्रेस को मिली तो उम्मीदवार का संकट झेलना पड़ सकता है। चर्चा यह भी है कि हम के नेता व पूर्व विधान पार्षद महाचंद्र प्रसाद सिंह को कांग्रेस के टिकट से भी परहेज नहीं होगा।

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