फंसते जा रहे हैं केजरीवाल

जिस मीडिया ने कभी उन्हें सर आखों बिठाया और एक अज्ञात व अनजान से केजरीवाल को देश दुनिया में विख्यात किया उसी मीडिया से लोहा ले कर जहां वह फंसते जा रहे हैं वहीं अदालत ने भी उन्हें घेर दिया है.aap

तबस्सुम फ़ातिमा

केजरी के हताशा में उठाये गये कदम, मीडिया विरोधी सर्कूलर पर रोक लगा कर दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने कोई नया फैसला नहीं सुनाया। सरकार की खराब छवि पेश करने वाले मीडिया हाउस पर मानहानी का मामला दर्ज करने वाले सर्कुलर को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीधे अरविंद को आड़े हाथ लिया कि एक ओर आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं और दूसरी ओर मीडिया पर शिकंजा भी कसना चाहते हैं।

मीडिया से टकराव

देखा जाये तो आज की तारीख में 2014 से अब तक मीडिया के बिकाऊ चरित्र पर इल्ज़ाम लगा कर सर्कूलर जारी करना एक जरूरी पहल हो सकती थी लेकिन केजरीवाल अपने गृहयुद्ध और लगातार मीडिया पर हमला बोल कर अपनी ही जड़ें खोखली कर चुके हैं। दशा, दिशा और नक्षत्र के बिगड़े खेल में अभी अरविंद इस पूरी लड़ाई में अकेले पड़ गये हैं। पार्टी में विरोध के उभरे स्वर पर तानाशाही रवैया अपनाने की जगह वह इसे शांत भी कर सकते थे। क्योंकि ’आप’, स्वराज और लोकपाल के पीछे केवल अरविंद नहीं, पार्टी के कई ऐसे बुद्धिीजीवियों के विचार और सिद्धांत भी शामिल थे, जिसका समूचे देश में स्वागत हुआ था।

यह मीडिया ही था, जिसने भाजपा और मोदी के विजय अभियान का रास्ता साफ किया साथ ही अरविंद एण्ड कम्पनी के विचारों को भी महत्ता दी थी। मीडिया से लड़ाई मोल कर सत्ता में होते हुए अरविंद एक ऐसे अज्ञातवास में चले गये हैं, जिससे निकल पाने का रास्ता आसान नहीं है।

बालक चाणक्य को राजनीति का वास्तविक ज्ञान एक कांटे से मिला था जो उसके पांव में चुभ गया था। राजनीति में चाणक्य नीति का जन्म इसी कांटे से हुआ, जहां बालक चाणक्य ने एक कांटे की जगह आस—पास की जमीन को भी कांटों से मुक्ति दे दी।

आज की तारीख में चाणक्य नीति भी बदली है। दूर्भाग्य से ’राजनीति करना मैं सिखाऊंगा’ की उद्घोषणा करने वाले अरविंद अपनी ही पार्टी से पुरानी नीति के बल पर कांटे निकालते हुए भूल गये कि बड़े महार्थियों की रेस में सत्ता के बावजूद मीडिया उन्हें राजनीतिक हाशिये पर लाता जा रहा है। सत्ता का ताज और सत्ता की कुर्सी दोनों में कांटे होते हैं। अरविंद ने यह कहावत सुनी भी तो गौर नहीं किया। सत्ता भोग की प्रक्रिया में वह इस सच को भी भूल गये कि राजनीति का एक गलत मुहरा किसी समय भी आपको नायक से खलनायक की पदवी दे सकता है। और इसीलिए पार्टी के उभरते विरोधी स्वर पर तानाशाही तरीकों से चाणक्य की तरह कांटे हटाने का तरीका न अरविंद के समर्थकों को पसंद आया और न दिल्ली की जनता को।

 अपने विचारों से ही किनारा

योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण सरीखे नेताओं पर सीधे वार कर, लोकपाल की गलत व्याख्या कर और स्वराज पर हुए विचारात्मक विरोध से पार्टी अन्दरूनी सतह पर अपनी ही जमीन से कटती नजर आ रही है। सिद्धांतों  की वो जमीन, जिसने दिल्ली वालों का दिल जीता था, इस जमीन के हटते ही दिल्ली वालों का मोह भी, अरविंद से भंग होता नजर आ रहा है। दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग से सीधे टकराव और मीडिया पर अंकुश लगाने के सारे तीर इतने खाली जा रहे हैं.

अज्ञातवास की तरफ बढ़ती पार्टी

मीडिया और नई राजनीति ने आम आदमी पार्टी को ऐसा ’अछूत’ घोषित किया है कि जनता को न कोई आशा है न कोई हमदर्दी। दुख होता है कि यह वही पार्टी है, जहां मायूस जनता की उम्मीदें नई और खुशगवार राजनीति की आहट सुनकर भीषण लहरों में बदल गयी थीं। यह जनता वैचारिक सतह पर दोबारा जुड़ेगी, कहना मुश्किल है। पहली बार अब तक के राजनीतिक इतिहास की त्रासदी है कि सत्ता में रहते हुए कोई पार्टी अज्ञातवास का शिकार नजर आ रही है। हजारों प्रश्नों में एक सीधा प्रश्न है कि बड़बोले, आइटी से निकले अरविंद, मोदी की ताकतों को समझ पाये, न मीडिया को। जबकि केवल तीन माह के कार्यकाल में सिनेमा से थियेटर, स्वच्छ राजनीति और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले देश भर के उन तमाम भरोसेमन्द साथियों ने उनसे पलड़ा झाड़ लिया है, जो उनके उसूल और सिद्धांतों के भरोसे पार्टी का हिस्सा बने थे।

 केजरीवाल पर भारी मीडिया

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश, सत्ता और धर्म के रक्षकों के लिए विरोध का स्वर रही है, जिसपर अतीत के अध्यायों से अब तक अंकुश लगाने का काम किया गया। और हर बार बुरे परिणाम सामने आये। एक समय में ऐसे अपराध के लिए निर्मम हत्याओं और साइबेरिया से काला पानी भेजने तक के प्रावधान थे। समय के साथ बहुत हद तक यह तस्वीर बदली है। उदाहरण के लिए केवल भारत की बात करें तो एक ऐसी सत्ता मीडिया के पास भी है, जहां मीडिया चाहे तो ’सत्ता की सरकार’ को भी देश निकाला दे सकती है। हैरानी होती है, यही मीडिया अतीत से अब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ताल ठोकती नजर आई, मगर अब नये अध्याय में अरविंद की दिल्ली सरकार को ‘राजनीति निकाला’ का संदेश देती नजर आ रही है। अभिव्यक्ति के लिए बड़बोले अरविंद ने यही सुलूक मीडिया के साथ किया। नतीजा देखें तो इस बार मीडिया अरविंद पर भारी पड़ रहा है।

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