फोन आते ही काठ मार गया

गांधी मैदान हादसे की खबर पढ़ना भले ही मर्मस्पर्शी लगे, लेकिन उस हादसे से अनभिज्ञ रहकर गांधी मैदान से सकुशल वापस लौट आने का संतोष किसी को भी हो सकता है। पर उसकी भयावहता की सूचना से कोई भी सन्न रहा सकता है। पढि़ए एक पत्रकार की आत्मानुभूति।
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10 वर्षों से पटना में रहने के दौरान हर दुर्गापूजा पर गांधी मैदान में रावणवध के कार्यक्रम को देखने की इच्छा होती थी, पर लोगों की बतकही में बेकाबू भीड़ की बात सुन मन बदल जाता था. इस साल संयोग ही रहा कि पारिवारिक इच्छा के आगे अपनी अनिच्छा को तिलांजलि देकर मैं भी अपने दो बेटों व पत्नी के साथ इस कार्यक्रम को देखने गांधी मैदान पहुंचा. पुलिस कार्यालय के सामने के गेट से भी कतारबद्ध होकर लोगों को गांधी मैदान में जाने की व्यवस्था थी. मैं भी अपने परिवार के साथ शाम 4:30 बजे मैदान के अंदर प्रवेश कर गया. मैदान के अंदर जबरदस्त भीड़ के बावजूद झुंड में बैठे लोगों को देख कर मन काफी हर्षित हो रहा था. आधुनिकता में लोप होती संस्कृति में इस तरह की सामूहिकता का बोध विरले ही देखने को मिलता है. सभी लोग अपने परिवार व टोला-पड़ोस के साथी के साथ बतकही में मशगूल थे. बच्चों के लिए गुब्बारे, तो बड़ों के लिए मूंगफली के विक्रेता मैदान की चारों ओर घूम रहे थे.

पवन प्रत्यय, वरिष्ठ पत्रकार

 

इसी बीच रावणवध के तय समय शाम पांच बजते ही सभी का ध्यान मैदान में रावण व मेघनाथ की ओर जा टिका. कृत्रिम तरीके से मेघनाथ के होंठों को बंद-खोलने के साथ आयोजन पटकथा शुरुआती दौर में पहुंच चुका था. रावण व मेघनाथ के पुतले से मरने के पहले की छटपटाहट का प्रयास होंठों के संप्रेषण से कराने की कोशिश की जा रही थी. अब हर किसी की नजर कार्यक्रम के चरम उत्साह को देखने के लिए बेकरार थी. क्रेन पर इनसानरूपी हनुमान और रथ पर राम को कार्यक्रम स्थल की चारों ओर घुमाया गया. फिर लंका, उसके बाद मेघनाथ और फिर आकाश में जोरदार आतिशबाजी के साथ रावणवध का दृश्य मानो सभी को सुकून पहुंचा गया हो. अब उत्साह व उमंग के साथ सभी को घर जाने की जल्दी थी. मैं भी अपने परिवार के साथ भीड़ में शामिल होकर श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल के सामने वाले गेट की ओर बढ़ा. काफी भीड़ के बावजूद धीरे-धीरे गेट के बाहर निकल कर पुलिस कार्यालय के सरकारी क्वार्टर की ओर चलते गया. यह क्वार्टर मेरे एक रिश्तेदार का है. थोड़ी देर वहां रुकने के बाद गाड़ी से अशोकराज पथ होते हुए कुम्हरार की ओर निकल गया. रास्ते में पीएमसीएच के बाद सड़क पर सामान्य भीड़ पर दिख रही थी.

 

घर पहुंचने के बाद चाय की चुस्की के साथ अपनों के बीच कार्यक्रम की प्रस्तुति की चर्चा में मैं मशगूल हो गया. ठीक 7:35 बजे एक पत्रकार मित्र ने कॉल किया. फोन पर उनका पहला शब्द था- गांधी मैदान में रावणवध के बाद भगदड़ में 33 लोगों की मौत व दर्जनों घायल हो गये हैं. उनकी बात सुनते ही मानो मुझे काठ मार गया हो. सन्न व हतप्रभ मैंने उनसे और जानकारी ली. फिर मेरा बेचैन मन घटना की तह में जाने को आतुर रहा. कई पत्रकार मित्र से देर रात तक बात होती रही. अफवाह या साजिश के संशय में मैं फंसा रहा. मेरा दिन भर का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. एक झटके में रावणवध ने कई लोगों की गोद सुनी कर दी. अब शायद ही कभी रावणवध देखने की इच्छा होगी.

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