“बंदूक उठाओ, गोली चालओ”

अगर आपको कोई कहे कि अपनी बंदूक उठाइए और चौक चौराहे पर महिलाओं को छेड़ने वाले पर इसका इस्तेमाल कीजिए, तो आप ऐसा करेंगे? यह मश्वरा कोई मुहल्ले के ताऊ का नहीं है, बल्कि दिल्ली के उपराज्यपाल तजेंद्र खन्ना का है.

सवाल है कि इतने बड़े पद वाला व्यक्ति इस तरह का मश्वरा दे तो इसे क्या कहेंगे? पर तेजेंद्र खन्ना कहते हैं, “ मैं तो सप्ताह में दो तीन लोगों को ऐसी राय जरूर देता हूं, खासकर उन लोगों को जो बंदूक के लाइसेंस के लिए आवेदन लेकर मेरे पास आते हैं”.

ये क्या कह दिया आपने?

तो क्या उपराज्पायल महोदय यह कहना चाहते हैं कि नागरिकों को अपने हाथ में कानून ले लेना चाहिए?

तेजेंद्र खन्ना जीवन भर बड़े पदों पर रहे.19961 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और पंजाब के मुख्यसचिव के अलावा मुख्यचुनाव आयुक्त भी रहे.

1938 में पटना में जन्मे तेजेंद्र ने पटना विश्वविद्यालय से एमए किया.

तेजेंद कहते हैं, लाइसेंस बंदूकधारियों को हर दिन कम से कम एक घंटा निकालना चाहिए.जैसे ही अंधेरा छाये घर से निकल जाना चाहिए और जहां भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा होता देखें अपनी बंदूक का इस्तेमाल करना चाहिए”.

तेजेंद्र की यह बातें राज्य पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर ही सवाल नहीं उठाते बल्कि वह आम नागरिकों को कानून अपने हाथ में लेने को प्रेरित करते हैं.

अगर मान लिया जाये कि कोई व्यक्ति ऐसा कर भी दे, तो क्या तेजेंद्र खन्ना उसके बाद की स्थितियों से उसे उसी पल निजात दिला पायेंगे? क्या वह ये भरोसा देंगे कि उस व्यक्ति को अदालती चक्कर, हवालात और कानूनी पचड़ों से बचा पायेंगे?

भारतीय जनता पार्टी ने खन्ना के इस बयान को ‘लापरवाही’ करार दिया है.वीके मल्होत्रा कहते हैं, किसी भी व्यवस्था में नागरिकों को यह सलाह कभी नहीं दिया जा सकता कि वह कानून अपने हाथों में ले ले. मल्होत्रा कहते हैं जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को ऐसे बयान देने से बचना चाहिए.

हम मल्होत्रा की बातों से सहमत हैं.

आप क्या कहते हैं?

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