बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गये…

2010 में मैं इनसे पहली और आखिरी बार मिला था. किस्से सुन रखे थे.वह शिक्षक संघ भवन के हॉल में लगी 6 चौकियों में से एक पर रहते थे.वही उनका दफ्तर, घर गेस्टरूम सबकुछ था.

इर्शादुल हक, सम्पादक, नौकरशाही डॉट इन

(फोटो इर्शादुल हक) मैंने  वासुदेव बाबू से आग्रह किया था कि वह अपनी पारम्परिक सवारी पर बैठें ताकि मैं उनकी यादों को समेट सकूं

(फोटो इर्शादुल हक)
मैंने वासुदेव बाबू से आग्रह किया था कि वह अपनी पारम्परिक सवारी पर बैठें ताकि मैं उनकी यादों को समेट सकूं

दाहिने हाथ के करीब वाले रैक में एक पूराना शूटकेस था. उसमें एक जोड़ी कपड़े और जरूरी कागजात थे. बाईं तरफ की मेज पर ग्लास में पानी. जीवन इतने में सिमटी थी. वासुदेव बाबू आज हमें छोड़ गये. बिहार विधान परिषद अपने महान सपूत से वंचित हो गयी.

पहली मुलाकात में मैं जो सबसे पहले कर लेना चाहता था, वह यह था कि उनकी एक तस्वीर उतार ली जाये. जिसमें वह रिक्शा पर बैठे हों. वह रिक्शा से विधानपरिषद जाते थे. ऐसी तस्वीरें टीवी और अखबारों में मैंने देख रखी थी. लेकिन बीबीसी वेबसाइट के लिए यह तस्वीर मैं खुद से खीचना चाहता था. इसके लिए मैंने उनको मैनेज किया. मैंने आग्रह किया कि आप थोड़ी देर के लिए बाहर चलें और रिक्शा पर बैठें. उन्होंने मेरा आग्रह बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया. नीचे लगे रिक्शे पर वह बैठ गये. मैंने तस्वीर उतार ली.

बस कल ही तो पटना के पत्रकार मित्रों के साथ हम सब उनके बारे में बातें कर रहे थे. उनकी ईमानदारीऔर खाकसारी हमारे दिलों में स्वाभिमान और आत्मगर्व भर गया था. बात भ्रष्ट नेताओं पर चल रही थी. वरिष्ठ पत्रकार डा. साम्बे अमित कुमार, अरुण सिंह, बिहार सरकार में अधिकारी गालिब समेत कई दोस्त इस चर्चा में शामिल थे. भ्रष्ट नेताओं से हमारी बात शुरू हुई थी और भ्रष्ठ पर खत्म होने ही वाली थी कि मैंने ईमानदार नेताओं पर चर्चा छेड़ी.जाहिर था, वासुदेव बाबू पर बात पहुंचनी थी, खैर.

जब भविष्य में ईमानदीरी, सादगी, समर्पन औ त्याग की बात होगी तो हम गर्व से कह सकते हैं कि हमने वासुदेव बाबू को देखा है.

वासुदेव बाबू शिक्षा और शिक्षकों से अपनी चिंता की शुरूआत करते थे. शिक्षकों की समस्या उनकी प्राथमिकता में रहती थी. उन्हें भी इस बात पर गर्व था कि ऐसे काल में जब विधान परिषद के चुनाव के लिए एक एक वोट की कीमत पैसों में लगायी जाती है, वह अपनी ईमानदारी और सेवा से जीत लेते थे. ऐसे दौर में ऐसी मिसाल लगभग असंभव थी कि वह अपनी ईमानदार छवि के बूते चुनाव जीतते थे. उनका यही वजूद हम पत्रकारों के लिए भ्रष्टाचार की गंगा में डूबी राजनीति में एकमात्र भरोसा जगा जाता था.

विधान पार्षद की हैसियत के मुताबिक उन्हें सरकारी आवास मिल सकता था. वरिष्ठ सदस्य होने के नाते उन्हें बंगला भी मिल सकता था. पर एक फकीर को चाहिए ही क्या. उन्होंने मुझसे कहा था जीवन के लिए साढ़ेतीन फुट चौडी चौकी और एक अलमीरा काफी है, यह सहजता की अद्भुत मिसाल इस दौर में मैंने तो नहीं देखी.

यह किस्सा तो सब जानते हैं कि वह विधान परिषद भी पैदल या रिक्शे से ही जाते थे. ऐसा कई बार हुआ कि विधानमंडल भवन के गार्ड ने उन्हें अंदर जाने से सिर्फ इसलिए रोक दिया क्योंकि उसे यह विश्वास ही नहीं हुआ था कि विधायक ऐसा भी हो सकता है जो रिक्शा से विधानमंडल जाता हो.

दो दशक से भी अधिक समय तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे वासुदेव बाबू को श्रद्धांजलि. और आखिर में रंगकर्मी हसन इमाम के शब्दों में इस मसीहा के सपनों, राजनीतिक दर्शन और आम आदमी की तरह रहने की उनकी जिद्द को सलाम.

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