बाथे नरसंहार: किसे पता कब लाल हो जाये सोन का पानी

बाथे नरसंहार के 26 आरोपियों को पटना हाईकोर्ट द्वारा बरी किये जाने के बाद वरिष्ठ पत्रककार अजय कुमार बाथे पहुंचे. उन्हीं की जुबानी सुनिये गांव का दर्द और विद्रोह की दास्तान.

बाथे नरसंहार की यादें:फोटो साभार भास्कर डॉट कॉम

बाथे नरसंहार की यादें:फोटो साभार भास्कर डॉट कॉम

अरवल जिले के बाथे गांव के दलित टोले में एक ही सवाल की गूंज है, इंसाफ इसे ही कहते हैं? चेहरे भले अलग-अलग हों, पर सवाल तो एक ही है. सरकार, जज-कलक्टर और थाना-पुलिस ने बता दिया कि गरीब की औकात बकरी की होती है. गांव के दलित बेतरह डरे-सहमे हैं. बाथे गांव पटना से करीब सौ किलोमीटर दूर है.

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गांव के पंचानन कहते हैं : हमारे घाव फिर हरे हो गये. अपनों को गंवाने का दर्द हम बरदाश्त कर चुके हैं. लेकिन, इस इंसाफ से हमें डर लगने लगा है. फिर पुराने दिनों की तरह हमारी बहू-बेटियों की इज्जत से खेला जायेगा और हमें मुंह पर ताला डाल कर सब सहना पड़ेगा. 70 साल के बौध पासवान कहते हैं: सरकार के दुआर से हमें न्याय नहीं मिला.

गांव के लोगों का दर्द

बौध पासवान के भाई रामचोला पासवान के चार बेटों,और उनकी पत्नी को मार दिया गया था. सावित्री सवाल करती हैं: हमने गवाही दी थी. मारनेवालों के बारे में बताया था. फिर यह कैसे हो गया? उनके बरामदे में बगल के कामता गांव से आये एक रिश्तेदार की हत्या कर दी गयी थी. उनके परिवार से कोई नहीं मारा गया, तो मुआवजा भी नहीं मिला. उनके पास मिट्टी का ढहा-ढिमलाया घर है.

गांव तक पहुंचने के लिए सड़क बन गयी है. आंगनबाड़ी केंद्र भी खुल गया है. सामुदायिक भवन के बरामदे में बैठ कर ताश खेलते कुछ नौजवान मिल जायेंगे. एक दिसंबर, 1997 को रणवीर सेना के हमले के बाद गांव में बदलाव की एक झलक मिल सकती है. लेकिन, सामाजिक संबंधों में कोई बदलाव नहीं आया है. अंदर-ही-अंदर चल रहे तनातनी का ताप महसूस किया जा सकता है. गांव से सटे सोन में उतना पानी तो नहीं है, लेकिन उसका रंग कब लाल हो जाये, कोई नहीं जानता. सोन के पार भोजपुर का सहार गांव है.

बाथे नरसंहार के अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी करने की खबर के घंटे भर बाद ही गांव में खलबली मच गयी. गांव के लोग हैरान हैं. उनमें गुस्सा भी कम नहीं. कहते हैं: उस राज में हमें कटवाया गया था, इस राज में हमें मारनेवालों को छुड़वाया जा रहा है. आखिर जब निचली अदालत ने सजा दे दी थी, तो अब यह कैसे हो गया?

मनोज बताते हैं : पुलिस की जीप फैसले के बाद ही आयी थी. वे लोग उस तरफ बड़े लोगों के टोले की ओर गये और हनहनाते हुए निकल गये. ये लोग हमारी रक्षा नहीं, उनकी सुरक्षा में लगे रहते हैं. वे कहते हैं : हमने अपनों को गंवाया है. हत्यारे तो छूट गये. अच्छा होता कि सरकार हमें ही फांसी पर लटका देती. हमें ही हत्यारा करार दे.

तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने बाथे नरसंहार को राष्ट्रीय शर्म कहा था. लेकिन, उस राष्ट्रीय शर्म की परिणति ऐसी होगी, इसका अंदाज कम-से-कम इस गांव के गरीबों को नहीं था. उन्हें कानून की बारीकियों के बारे में कुछ भी नहीं पता. वे पूछते हैं: अगर हमसे खून हो जाये, तो क्या हम भी बरी हो जायेंगे?

बाथे में सड़क भले पहुंच गयी, पर इंसाफ नहीं पहुंचा. मनोज तब तीन साल का था. मां से चिपक कर सोया था. बगल में उसकी बड़ी बहन थी. अचानक हमला हो गया. मां और बहन को गोली लगी. दोनों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया था. मनोज के पांव में छर्रा लगा था. महीने भर पीएमसीएच में इलाज हुआ. अब वह 19 साल का हो चुका है.

मनोज कहता है : हमें तो अपनी मां का चेहरा भी ठीक से याद नहीं. उसे किसने मारा? बहन के हत्यारे कौन हैं? इस सवाल का जवाब तलाशने में थाना-पुलिस थक चुकी है. लेकिन, उन्हें पता है कि हत्यारे कौन थे और कहां से आये थे. विमलेश की उम्र अब 26 हो चुकी है. उसके चेहरे पर छर्रा लगा था. उसके पिता सोहरायी राजवंशी, दो भाई और दो भौजाई मारी गयी थीं. किस्मत से वह अपनी एक बहन के साथ बच गया था. शादी के बाद उसकी बहन भी चल बसी. इस परिवार में अब विमलेश ही बचा है. उसे मुआवजा मिला, पर नौकरी नहीं मिली. घटना के वक्त वह 10 साल का था.

फैसले के बाद से चूल्हा हुआ उपास

बाथे के अभियुक्तों को बरी करने की खबर के बाद से ही गांव के दलितों का चूल्हा उपास हो गया. उन्हें डर है कि फिर कहीं हमला न हो जाये. कहते हैं : जब 58 को मारने पर कुछ नहीं हुआ, तो दो-चार लोगों को काटने पर क्या होगा? वे लोग अब भी धमकी देते हैं. फैसले के बाद उनका हौसला तो ऐसे ही बढ़ गया है.

अब झगड़ा किस बात को लेकर है? रामउग्रह राजवंशी कहते हैं: झगड़ा तो तब भी नहीं था. हम इज्जत से रहना चाहते हैं. वाजिब मजदूरी चाहते हैं. बहू-बेटियों के साथ ऐसी-वैसी बात न हो, हम यही तो चाहते हैं. लेकिन, वे लोग यही सब करना चाहते हैं. गांव के दलित टोले के आंगनबाड़ी केंद्र में बो रट रहे हैं दू-दुनी चार-चार दुनी आठ. . . उनकी पढ़ाई नयी सुबह की आहट जैसी है.

हत्याकांड के सूचक हुए भूमिगत.

हत्याकांड के सूचक विनोद पासवान भूमिगत हो गये हैं. उन्हें पहले सुरक्षा मिली थी. बाद में हटा लिया गया. विनोद के परिवार के सात लोग मारे गये थे. घर के लोगों को कोर्ट के फैसले के बारे में सब कुछ पता है. पर, वे कुछ नहीं बताते. बोलते भी हैं, तो नपा-तुला. पत्नी बताती हैं: वे खेत में गये हैं. लेकिन, वहां वह नहीं मिले. उनके चाचा कहते हैं: बबुआ बाजार गईल बा. दूध का दूध, पानी का पानी. बाथे गांव के दूसरे छोर पर हाइकोर्ट के फैसले की खूब तारीफ हो रही है. बृजबिहारी शर्मा कहते हैं: निर्दोष लोगों को फंसा दिया गया था. कोर्ट ने अच्छा फैसला सुनाया है. शर्मा के चचेरे भाई बृजेंद्र को फांसी की सजा मिली थी.

जितेंद्र यादव कहते हैं: हमें नहीं पता कि कौन लोग आकर हमला कर गये. अंजनी सिंह का कहना था: सत्य परेशान होता है, पराजित नहीं. अंजनी खुद भी इस मामले में अभियुक्त हैं. उनका केस जुवेनाइल कोर्ट में चल रहा है. नरसंहार के वक्त वह नाबालिग थे.

लेखक परिचय- अजय कुमार प्रभात खबर, पटना से संबंद्ध हैं. मानवी संवेदनाओं और सामाजिक मुद्दों पर उनकी गंभीर समझ है.उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.

(साभार प्रभात खबर)

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