बाबुओं के चक्रव्यूह में मोदी

साइडलाइंड ऑफिसर्स क्लब के उन चक्रव्यूहों की पड़ताल कर रही हैं जिसने गुजरात के मुख्यमंत्री को अपने जकड़न में ले लिया है. नौकरशाहों का यह कल्ब मोदी को पॉपुलराइज करने वाले तमाम कार्यक्रमों को ठंडे बस्ते में डाल कर मोदी को नर्वस बना दिया है.

नरेंद्र मोदी के निटतम नौकरशाहों में से एक ने अहमदाबाद में एक पत्रकार को बताया है कि मोदी को उन्होंने गुजरात दंगों के बाद इतना नर्वस पहली बार देखा है.मोदी इस बार एक नहीं तीन-तीन चक्रव्यूह में फंस गये हैं.

राज्य विधानसभा का चुनाव सर पर है. मोदी की मुश्किलें बढ़ रही हैं.

पहला- दंगों में उनकी मंत्री रही माया कोडनानी का जेल की सलाखों में जाना. दूसरा- वॉल स्ट्रीट जर्नल को मोदी का यह कहना कि उनके प्रदेश में लड़कियां इसलिए कुपोषण की शिकार हैं क्योंकि वह स्वास्थ्य से ज्यादा अपने सौंदर्य पर ध्यान देती हैं, इसलिए स्लिम बने रहने के चक्कर में वे खाना नहीं खातीं. मोदी के इस बयान को अनेक संगठन महिलाविरोधी कह कर हो- हल्ला कर रहे हैं.

देश के सबसे विकसित मोदी के राज्य में लगभा 13-25 वर्ष उम्र की आधी महिलाओं में खून की कमी है. यही सवाल वॉल स्ट्रीट जनर्ल के पत्रकार अमोल शर्मा ने मोदी से कर दिया था.
पर इन दोनों मुद्दों से अलग मोदी का संकट तीसरा भी है.

मोदी सरकार के नौकरशाहों की बड़ी जमात मोदी के लिए चुनौती बन गई है. उनमें से आईएएस रैंक के कई अधिकारियों ने यह तय सा कर लिया है कि वे मोदी को पॉपुलराइज करने वाली किसी योजना को जमीन पर उतारने में तेजी नहीं दिखायेंगे.

पिछले एक दशक से बाबुओं पर नकेल कसने वाले मोदी के लिए यह स्थिति उलटी पड़ती जा रही है.

साइडलांड आफिसर्स टी क्लब का चक्रव्यूह

पता चला है कि मोदी ने अनपे चहेते नौकरशाहों को यह हिदायत दी है कि वे उन्हें( मोदी को) को पॉपुलराइज करने वाले कार्य़क्रकमों को 20 सितम्बर से पहले लागू कर दें. क्योंकि सितम्बर के तीसरे हफ्ते में चुनाव आचार संहिता लागू हो सकता है.

जब कि दूसरी तरफ अहमदाबाद के सचिवालय पर पैनी निगाह रखने वाले विशेषज्ञ पत्रकारों से पूछिए. वह बतायेंगे कि साइडलांड आफिसर्स टी क्लब (एस.ओ.टी.सी) ने किस तरह अंदर ही अंदर अपने नेटवर्क को भिड़ा दिया है. वह इस फिराक में हैं कि नरेंद्रमोदी को पापुलराइज करने की कीमत पर उन्हें अपना करियर अब और दाव पर नहीं लगाना चाहिए. सचिव स्तर के एक प्रभावशाली नौकरशाह ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बतायता है कि ऐसे नौकरशाहों की संख्या काफी बढ़ गई है जो विकास कार्य तो जारी रखने के मूड में हैं, पर मोदी को पॉपुलराइज करने वाली योजनाओं पर कुंडली डाल कर बैठ गयें हैं.

हालांकि इन्हीं बातों के मद्देनजर मोदी ने पिछले हफ्ते 32 अधिकारियों के तबादले कर दिये और कुछ की पदोन्नति भी कर दी गई. पर इससे मामला और बिगड़ता ही जा रहा है. जिन अधिकारियों को साइडलाइंड किया गया है वह अंदर ही अंदर अपनी शक्ति दिखाने पर तुल पड़े हैं.

जब कि दूसरी तरफ अहमदाबाद के सचिवालय पर पैनी निगाह रखने वाले विशेषज्ञ पत्रकारों से पूछिए. वह बतायेंगे कि साइडलांड आफिसर्स टी क्लब (एस.ओ.टी.सी) ने किस तरह अंदर ही अंदर अपने नेटवर्क को भिड़ा दिया है. वह इस फिराक में हैं कि नरेंद्रमोदी को पापुलराइज करने की कीमत पर उन्हें अपना करियर अब और दाव पर नहीं लगाना चाहिए

साइडलांड ऑफिसर्स टी क्लब की प्रतिबद्धता का नमूना देखिए कि उसने मोदी के एक महत्वकांक्षी योजना को कैसे पलीता लगा दिया है. मोदी ने दावा किया था कि उनका राज्य देश का वह पहला राज्य है जिसने पर्वावरण परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर एक सवतंत्र विभाग का गठन कर दिया है. पर पिछले एक साल में नौकरशाहों ने इस विभाग की हालत ऐसी बना रखी है जिसके पास अभी तक अपनी वेबसाइट भी नहीं है.

दुश्मनों की बढ़ती कतार

इधर पिछले एक साल में मोदी के चहेते और साइडलाइंड किये गये अधिकारियों के बीच का शीतयुद्ध भी अपने शबाब पर है. जिसका भी नुकसान मोदी के भविष्य पर पड़ सकता है. हाल ही में मोदी सरकार ने एच.के दाश जैसे कर्मठ नौकरशाह को साइडलाइंड कर के अपने दुश्मनों की संख्या में और इजाफा कर लिया है.
दाश को जल वितरण जैसे महकमे से उठाकर वन एंव पर्यावरण में डाल दिया गया है. दाश इस पर नाराज हैं. दाश की नाराजगी का कारण यह है कि उनपर उनके जूनियर ही अब आरोप लगाने लगे हैं कि वह न तो काम होने देते हैं और नहीं कोई काम करते हैं. दाश कहते हैं, “मुझे निशाना बनाया जा रहा है”.

नौकरशाहों से मुतल्लिक नरेंद्र मोदी की परेशानियां और भी हैं. पिछले एक दशक में मोदी ने ऐसे नौकरशाहों की भी फौज खड़ी कर ली है जिन्होंने आउट ऑफ लाइन जाकर मोदी के लिए काम किया है. अब इन दस सालों में उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा इतनी जाग चुकी है कि अगले एक-दो महीने में मोदी के कई चहेते नौकरशाह नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ने पर आमादा हैं. इसके पहले उदाहरण हैं, आर.एम पटेल. पटेल पंचाय व जनजाति विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्यसचिव हैं.पटेल के बारे में बताया जाता है कि वह एक अक्टूबर से पहले वीआरएस लेने वाले हैं.

नौकरशाहों की यही महत्वकांक्षा अब मोदी के लिए चक्रव्यूह साबित हो रहा है. क्योंकि वह नौकरशाही से हट कर अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा तो पूरी कर लेंगे लेकिन मोदी को पापुलराइझ करने के सरकारी मिशनरी से वह जुदा हो जायेंगे. ऐसे नौकरशाहों की संख्या आने वाले दिनों और बढ़ेगी.

अब देखने की बात है मोदी ऐसे चक्रव्यूह से कैसे निजात पाते हैं.

अनिता गौतम वेब पत्रकारिता का एक हचाना नाम है.एक पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक के साथ-साथ कहानीकार भी हैं. वह कहानियों के प्रति जितनी संवेदनशील हैं, वैसी हीं संवेदना उनके पत्रकारीय लेखन में भी मिलती है.पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन करती हैं

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