बिहार के दलित पिछड़े मुसलमान मज़दूरी करते रह गये, कांग्रेस की फ़सल सवर्णों ने काट ली

बिहार के दलित पिछड़े व मुसलमान मज़दूरी करते रह गये, कांग्रेस की फ़सल सवर्णों ने काट ली.

फैसल सुलतान, कंसलटिंग एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

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फैसल सुलतान, कंसलटिंग एडिटर, नौकरशाही डॉट कॉम

मदन मोहन झा प्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष बना दिये गया. अखिलेश सिंह कैंपेन कमेटी के अध्यक्ष का पद लपक कर ले गय. और तो और समीर कुमार सिंह, श्याम सुंदर सिंह धीरज दोनों सवर्ण को कार्यकारी अध्यक्ष बना डाला गया. दूसरी तरफ कौकब कादरी और  डॉ अशोक कुमार को भी कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गयी. एक पार्टी के चार चार कार्याकी अध्यक्ष हों तो समझा जा सकता है कि उनके हाथों में कितनी शक्ति होगी.

इससे पहले  विधान परिषद में भेजने की बारी आयी थी तो प्रेमचंद मिश्रा  को विधान परिषद  कुर्सी सौंप दी गयी थी.

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जब कांग्रेस बुरे दौर से गुज़र रही थी तब क़ौक़ब क़ादरी  की जरूरत थी। अब जब मलाई (चुनाव) खाने का दिन आया तब काँग्रेस क्रमशः ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत के हाथों में सौंप दी गयी. जबकि दलित, पिछड़े एवं मुसलमान फिर हाशिये पर धकेल दिए गये। देखना, यही है कि बिहार में कांग्रेस कितने ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत के वोट का ट्रांसफर करा पाती है?

 

ताकि सनद रहे

कांग्रेस को यह कदम भारी पड़ सकता है. याद रखने की बात है कि जब नीतीश, लालू से अलग हुए थे तो उन्होंने पूरी कोशिश की थी कि वह कांग्रेस विधाकों को तोड़ लें. लेकिन तब ये कांग्रेस पांच मुस्लिम विधायक ही थे जिन्होंने अशोक चौधरी की कोशिशों पर पानी फेर दिया था. उन्हें पता था कि अगर कांग्रेस टूट कर जदयू में मिल गयी तो कांगेंस के मुस्लिम विधायकों से मुसलमान नाराज हो जायेंगे. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कौकब कादरी को शंट कर दिया जाना महंगा पड़ सकता है

ध्यान रखने की बात है कि यह फैसला तब सामने आया है जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आजादी के संघर्ष में कांग्रेस की भूमिका की सराहना की है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारतीय कांग्रेस पार्टी संघ के जाल में पूरी तरह फस चुकी है! ये सब संघ की सोची समझी साजिश है जिसे आज कल सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता है! ये संघ के साजिश का नतीजा है कि सवर्णों का विद्रोह दिखाकर उनके जाल में फंसाया जाये और दलित को भाजापा के पाले में डाल दिया जाये.संघ अपने चालाकी में कामयाब होता नज़र आ रहा है !  दर असल संघ पर ये आरोप लगते हैं कि वह ऊंची जातियों, खास कर ब्रह्मणवादी वर्चस्व के लिए काम करता है. अगर यह काम कांग्रेस के माध्यम से हो तो संघ का काम ही आसान होता है.


कांग्रेस की पुरानी सोच रही है, सवर्णों को अपने तरफ रिझाने की राजनीति और बहुजन एवं अल्पसंख्यको के तुस्टीकरण की राजनीती बेहद साफ़ नज़र आती है ! इसी क्रम में कांग्रेस की तरफ से कहा जाता है राहुल गां जनेऊ धारी है, कभी मानसरोवर की यात्रा कही इसी चक्कर में 2019 के चुनाव में बहुजन एवं अल्पसंख्यक दूर ना चले जाये ! कांग्रेस15% पाने के चक्कर में 85% से दूर होती जा रही है ! 

यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि 1989 में भागलपुर के भयावह दंगों के बाद मुसलमानों ने कांग्रेस को दुत्कार दिया था. कांग्रेस शासन का पतन भी इसी दंगे के कारण हुआ था. लेकिन कांग्रेस के मुसलमान लीडरों ने 20 सालों के अथक प्रयास के बाद मुसलमानों को अपनी पार्टी की तरफ खीच लाने में सफल हुए थे. नतीजतन 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के जीते कुल 27 विधायकों में से 5 मुसलमान चुन कर आये. मुसलमानों की नुमाइंदगी के लिहाज से यह 22 प्रतिशत के करीब है. राजद, जिसके पास संख्या के लिहाज से सर्वाधिक मुस्लिम विधायक जरूर हैं लेकिन प्रतिशत के हिसाब से सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक कांग्रेस के पास ही हैं. ऐसे में कौकब कादरी को बिहार प्रदेश कांग्रेस की कमान छीन कर उनके ऊपर मदनमोहन( झा) को लाद दिया गया. इससे स्वाभाविक तौर पर मुसलमानों के साथ दलितों और पिछड़ों को मायूसी हुई है. क्योंकि दलितों और पिछड़ों के प्रतिनिधित्व के रास्ते में असल रोड़ा अपर कास्ट ही हैं.


कांग्रेस के लिये ये उचित समय नहीं था के दिल्ली से कार्यकारणी में कोई बदलाव किया जाता बल्कि अच्छा होता अगर किसी दलित अथवा अल्पसंख्यक को ही बिहार प्रदेश का कमान सौपा जाता ! 


इस सन्दर्भ में जब हमलोगों ने दुसरे मज़बूत विपक्षी पार्टियो को देखा तो लगा की कांग्रेस एवं आर जे डी राज्य का कमान उन्ही को देती आ रही है जो उनका है ही नहीं और सारे राजनितिक पार्टियों को यह भी पता है की अल्पसंख्यक को किसी भी हालत में इन्ही के झोली में जाना है, इसलिये इनकी कोई परवाह नहीं है !

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