बिहार में नरसंहारों की राजनीति

बाथे नरसंहार के आरोपियों को पटना हाईकोर्ट द्वारा बरी किये जाने के बहाने बिहार में नरसंहारों को राजनीति पर प्रकाश डाल रहे हैं अनीश अंकुरbathe.massacre

यदि रणवीर सेना के उद्भव पर नजर दौड़ायी जाए। रणवीर सेना का गठन रणवीर चैधरी नामक 19 वीं सदी में भोजपुर क्षेत्र में भूमिहार जाति में एक ऐसे ‘फोक’ चरित्र के नाम पर हुआ था जिनके लोकश्रुति है कि भूमिहार जाति के हितों के लिए राजपूत जमींदारों के खिलाफ उन्होंने संघर्ष किया था। 1995 के मार्च में हुए विधानसभा चुनाव के कुछ महीनों पूर्व सितंबर 1994 में ताकतवर भूमिहार जाति के सामंती हिस्से द्वारा रणवीर सेना का गठन किया गया. इसका गठन रणवीर सेना प्रमुख रहे ब्रम्हेष्वर सिंह के गांव बेलाउर मे हुआ था.

इसके गठन के पीछे की एक प्रमुख वजहों से एक थी बिहार में नक्सल राजनीति के प्रमुख धड़े, भाकपा-माले लिबरेषन, केा भोजपुर में चुनाव के माध्यम से बढ़ती राजनीतिक ताकत बनने से रोकना। उस समय भोजपूर में लिबरेषन के दो विधायक थे। इसके पूर्व यहीं से देश के पहले नक्सली सांसद के रूप में रामेष्वर प्रसाद चुने गए।

रणवीर सेना के पूर्व बिहार में विभिन्न जातियों के सामंती के हितों की रक्षा करने वाली कई ऐसी निजी सेनाओं का गठन पहले भी हो चुका था। जैसे कुर्मी जाति की ‘भूमि सेना’, यादव जाति की ‘लोरिक सेना’, राजपूतो की ‘सेना’ सहित ‘सवर्णलिबरेशन फ्रंट’, ‘डायमंड सेना’ का नाम प्रमुख है। लेकिन समय के साथ-साथ ये सभी निजी सेनाएं काल-कवलित हाती गयीं। निजी सेनाओं के इतिहास में रणवीर सेना सबसे ज्यादा शक्तिषाली, संगठित व खूंख्वार, सेना बन कर उभरी। रणवीर सेना राजनैतिक संरक्षण पाने वाला ऐसा संगठन था जिसे पूरे राज्य के माफियाओं का समर्थन प्राप्त था। कई देशी-विदेशी श्रोतों से धन मुहैया कराया जाता था। रणवीर सेना के कार्यक्रलापों पर नजर रखने वालों के अनुसार रणवीर सेना के प्रत्येक कार्यकर्ता का एक निष्चित मासिक वेतन निर्धारित था। उनका बीमा कराया जाता। मरने पर उनके परिवार के लोगों केा धन वगैरह से मदद की जाती थी।

रणवीर सेना और राजनीति

इसके साथ-साथर रणवीर सेना के सियासी समर्थन का एक बड़ा कारण था बिहार की चुनावी राजनीति के साथ उसका रिश्ता। रणवीर सेना द्वारा किए गए नरसंहारों पर नजर दौड़ायी जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस प्रतिक्रियावादी संगठन ने ज्यादातर नरंसहार चुनावों को ध्यान में रखकर किया। यानी अधिकतर नरसंहार विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आस-पास किए गए। इन नरसंहारों का त्वरित प्रभाव अगड़ों-पिछड़ों के तीखे जातीय विभाजन के रूप में होता। इसका सियासी फायदा जातीय ध्रवीकरण पर फलने-फूलने राजनीतिक दलों केा मिला करता । उदाहरणस्वरूप जब भी सवर्ण जातियों के लोगों का नरसंहार होता उन गांवों में कम से कम सांत्वाना देने भी लालू यादव या राबड़ी देवी जाने से परहेज किया करते थे यही हाल भाजपा नेताओं का था जो दलित-पिछड़ों के मारे गए परिजनों से मिलने जाने में कतराते थे।

लेकिन सन् 2000-01 आते-आते नरसंहारों का सिलसिला समाप्त हो गया। बिहार में नरसंहारेां की राजनीति का प्रारंभ पहला बेलछी ;वैसे इसके कुछ वर्ष पूर्व रूपसपुर चंदवा में हुआ आदिचासियों का कत्लेआम भी इतिहास में दर्ज है जिसमें तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राधानंदन झा की संलग्नता स्थापित हुई थी द्ध से माना जाता है। जनता पार्टी की 1977 में सरकार बनने के बाद हुए इस जनसंहार ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। तब सत्ताच्युत पूर्वप्रधानमंत्री इंदिरागाॅंधी ,बेलछी गाॅंव, हाथी पर चढ़कर गयीं थी। अंतिम नरसंहार सन् 2000 मियांपुर में हुआ। यदि दोनों नरसंहारों के काल पर नजर दोड़ायी जाए तो एक दिलचस्प तथ्य उभरता है। 1977-2000 ये वही समय है जब बिहार में पंचायत चुनाव नहीं हुए थे। 1977 में अंतिम बार पंचायत चुनाव हुए। इसके बाद अगले 23-24 सालों तक पंचायत चुनाव नहीं कराए गए। बिहार क सभी नरसंहार इन्हीं 23 सालों के दरम्यान हुए। बााद में हाईकेार्ट के आदेष से 2001 में पंचायत चुनाव कराए गए।

पंचायतों में लोकतंत्र का असर

पंचायत चुनावों ने बिहार में नरसंहारों की सिलसिले केा लगभग खत्म कर दिया। इन चुनावों के बाद रणवीर सेना लगभग अप्रासंगिक होती चली गयी। उधर ब्रम्हेश्वर मुखिया ने चुनावी राजनीति मंक हाथ आजमाने की ओर अग्रसर हुए। 2004 में जेल में रहकर ही चुनाव लड़ा और उनके द्वारा काटे गए वाटें के परिणमस्वरूप लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले राजद की जीत हुई। नक्सलियों की राजनीति में भी 2004 आते-आते बड़ा परिवर्तत हुआ। जुलाई में आंध्रप्रदेष के पीपुल्स वार ग्रुप और बिहार-झारखंड की माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र व पार्टी यूनिटी के विलय की प्रक्रिया भी संपन्न हुई हुआ। ये तीनों धड़े नक्सली राजनीति की गैरसंसदीय धारा की नुमांइदगी करते थे। चुनावों के बजाए हथियारबंद संघर्ष पर जोर इनकी विषिष्टता थी। इनकी सैन्य ताकत में काफी इजाफा हो चुका था। अब इनकी लड़ाई सीधे राज्य से होने लगी। गाॅंवों पर हमला करने के बजाए अब माओवादी सीधे सत्ता से भिड़ने लगे। पुलिस-पिकेट, सी.आर.पी.एफ कैंप पर हमला करने ये ज्यादा संलग्न होते चले गए। इन लोगों ने 2005 में कहानाबाद जेलब्रेक का कारनाम भी कर डाला।

अब सबसे बड़ा प्रश्न है कि हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद क्या फिर से मगध और भोजपुर में हिंसा-प्रतिहिंसा का पुराना दौर षुरू हो सकता है ? सामाजिक स्तर पर टकरावों की अभिव्यक्ति हो सकती है विषेषकर जब 2014 का चुनाव सामने है? सामाजिक- राजनैतिक विष्लेषक, अभी इन प्रष्नों पर, अटकल ही लगा रहे थे कि मगध के औरंगाबाद में माओवादियों द्वारा लैंडमाइन्स के द्वारा बमविस्फोट कर जीप में सवारी कर रहे भूमिहार जाति के 10 लोगों केा मार डाला गया। मारे गए लोगों में सुषील पांडे भी है जिसे रणवीर सेना का पूर्व कमांडर बताया जा रहा है। सुषील पांडे औरंगाबाद के जिला परिषद के सदस्य के पति भी हैं। आपराधिक इतिहास वाले सुषील पांडे हाल ही में जेल से छूट कर आए था। ऐसा माना जा रहा है कि यह हत्याकांड लक्षमणपुर बाथे के आरेपियों केा उच्च न्यायालय द्वारा बरी किए जाने के बदले स्वरूप लिया गया है। नरसंहारों को दौर समाप्त होने के पष्चात लगभग 10-11 वर्षों के दरम्यान माओवादियों द्वारा किया गया यह पहला नरसंहार है।

फिर सर उठाने की धमकी

इस घटना के विरूद्ध बदले की कारवाई संबधी बयान रणवीर सेना के पूर्व कार्यकर्ताओं द्वारा दिए जा रहे हैं। जाहिर इस घटना ने बिहारवासियों नब्बे के दशक की खूंरेंजी की याद दिला दी है। जैसा कि गया में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रभात षांडिल्य ने बताया ‘‘ आपराधिक प्रवृति वाले सुषील पांडे के साथ 10 लोगों के मारे जाने की घटना का मगध में निष्चित प्रभाव पड़ेगा। मृत पड़ी रणवीर सेना द्वारा बदला लिए जाने से इंकार नहीं किया जा सकता। बिहार का समाज फिर से 1989-90 के दौर में चले जाने की आषंका बढ़ गयी है।’’

इसी माह बिहार में तीन महत्वपूर्ण रैलियां होनी है। 25 अक्टुबर केा जनाक्रोष रैली ; भारत की कम्युनिस्ट पार्टीद्ध, 27 अक्टुबर नरेंद्र मोदी की बहुप्रचारित हुंकार रैली ;भारतीय जनता पार्टी द्ध एवं 30 अक्टुबर केा खबरदार रैली ;भाकपा-मालेद्ध । इन तीनों रैलियों की तेवर और गोलबंदी में इन फैसले का भी स्पष्ट प्रभाव पड़ेगा। इन सबका प्रतिफलन बिहार के समाज और राजनीति में किस प्रकार होगा? आगामी लोकसभा के परिणामों को यह किसप्रकार प्रभावित करेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है।

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