बोरे पर बैठ तालीम पाने वालेओवैस अम्बर अब कर रहे हैं हजारों युवाओं के सपनों को साकार

हजारों युवाओं के सपनों को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा कर ओवैस अम्बर ने महज एक दशक में अनेक कीर्तिमान स्थापित कर दिया है. और उनका यह सफर लगातार जारी है. पढ़िये अम्बर के संघर्ष और उपलब्धियों की कहानी.

दुनिया को बदल देने की क्षमता रखने वाले महापुरुषों से मिलना, उनसे प्रेरणा लेना और समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए बढ़ते चले जाने की धुन वाली शख्सियत का नाम है ओवैस अम्बर. ओवैस के इस  विद्रोही तेवर का ही नतीजा है कि आज वह हजारों छात्रों को मुफ्त तकनीकी शिक्षा और रोजगार से जोड़ने का सपना साकार कर रहे हैं, वरना खस्ता हाल मदरसे में बोरे पर बैठ कर शिक्षा प्राप्त करने वाले अवैसे अम्बर अपने पिता के उस छोटे सपने को साकार करन की जद्दोजहद में पिस रहे होते, जिसमें एक युवक सऊदी अरब में दिहाड़ी मजदूरों की तरह जिंदगी बसर कर रहा होता है.

ओवैस की कहानी फर्श से उठकर अर्श पे छा जाने की ही सिर्फ कहानी नहीं है, बल्कि यह कहानी है, जहानाबाद के एरकी गांव के एक साधारण परिवार में जन्मे उस युवक की है जिसका बस एक ही सपना था कि कमजोर व गरीब वर्ग के छात्रों को उच्च तकनीकी शिक्षा से लैस कर उन्हें पैरों पर खड़ा करना. महज एक दशक की छोटी यात्रा के बाद ओवैसे आज बुलंदियों पर चमकने वाले ऐसे सितारे की मानिंद हैं जिन्हें देश की नामी गिरामी युनिवर्सिटीज खुद से जोड़ कर गर्वान्वित महसूस कर रही हैं. इसी क्रम में 2017 में दो शिक्षण संस्थानों ने उन्हें खुद से जोड़ने की घोषणा की है. इनमें पंजाब टेक्निकल युनिवर्सिटी (पीटीयू) ने ओवैस को अपना अधिकृत सलाहकार( काउंसलर) नियुक्त किया है तो मोती बाबू इंस्टिच्यूट ऑफ टेक्नालॉजी ने (एमबीटीआई) उन्हें अपना चीफ एक्जेक्युटिव ऑफिसर (सीईओ) नियुक्त किया है. ऐसा नहीं है कि अपनी उम्र के महज तीसरे दशक में ओवैसे ने इतनी ही उपलब्धि हासिल की है. इससे पहले हरियाणा के कुरक्षेत्र के TERI College ने ओवैस अम्बर की काबिलियत को स्वीकार करते हुए 2016 में अपने बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में शामिल कर लिया था.

 

ऐसे में ओवैस अम्बर के योगदान को जानना जरूरी है क्योंकि आखिर अम्बर में वह कौन सा जुनून और कौन सी क्षमता है जिसने उन्हें मात्र एक दशक में इस मुकाम पर ला खड़ा कर दिया है.

सात भाई और तीन बहनों के परिवार का सदस्य रहे ओवैसे अम्बर के पिता ग्यासुद्दीन बिजली विभाग के कर्मी के तौर पर रिटायर हुए. 12 सदस्यों के लालन-पालन का बोझ उठाने वाले ग्यासुद्दीन बस इतना चाहते थे कि उनका बेटा कुछ पढ़-लिख कर सऊदी अरब चला जाये और अपना व अपने परिवार के लिए रोटी कमा सके. लिहाजा ग्यासुद्दीन ने अम्बर का नाम जहानाबाद में ही गांव के करीब के मुरलीधर हाई स्कूल में लिखवा दिया. दो साल वहां पढ़ने के बाद जब अम्बर पटना के पटना कॉलेजियट स्कूल पहुंचे तो जैसे उनके सामने सपनों का खुला संसार था. महत्वकांक्षा और आगे बढने के जुनून से लबरेज अवैस यहां अम्बर की बुलिंदियों को छू लेने का सपना पालने लगे. लेकिन उनका यह सपना जोखिम भरा था क्योंकि पिता उन्हें कोई रिस्क लेते नहीं देखना चाहते थे, वह चाहते थे कि अम्बर किसी भी तरह सऊदी अरब का वीजा हासिल कर ले, बस.

 

रोजमाइन चैरिटिबल ट्रस्ट की स्थापना

नयी पीढ़ी के भविष्य पर मंथन

 

दूसरी तरफ अम्बर कम उम्र में ही जान चुके थे कि उनके अंदर एंट्रोप्रोन्योरशिप का जखीरा छिपा है. उनके सामने खुद की रोजी-रोटी से ज्यादा पूरे समाज की चिंता थी. वह यह तय कर चुके थे कि देश की शिक्षा व्यवस्था माफियाओं के चंगुल में फंसा हुआ है. और ऐसे हालात में गरीबों, वंचितों और बच्चों को उच्च शिक्षा के दरवाजे तक पहुंचना बडा कठिन है. इस लिए वह रिस्क लेने को तैयार थे. लिहाजा उन्होंने 2005 रोजमाइन एजुकेशनल ऐंड चैरिटिबल ट्रस्ट की स्थापना की. यह काम जोखिम भरा था. जेब में पैसे नहीं थे. ट्रस्ट के आफिस का किराया देने के लायक भी नहीं. तो बस उन्होंने पटना में घर और आफिस एक ही मकान में शुरू कर दिया. 2007 में रोजमाइन ट्रस्ट एक रजिस्टर्ड संस्था के रूप में सामने आ चुका था. ट्रस्ट के उद्देश्यों का जिक्र करते हुए अम्बर कहते हैं- “बाजार बन चुके पूरे भारत की शिक्षा व्यस्था माफियाओं की गिरफ्त में है. ऐसे में उच्च शिक्षा, खास कर तकनीकी शिक्षा अमीरों द्वारा खरीदी जा रही हो तो गरीबों और योग्य छात्र-छात्राओं की तालीम का क्या होगा”. इसलिए अम्बर ने यह ठान लिया कि चाहे जैसे भी हो वह योग्य मगर साधारण परिवार के छात्रों तक तकनीकी शिक्षा पहुंचायेंगे. इसके लिए अम्बर ने एक वैरागी की तरह यात्रा शुरू कर दी. वह यूपी के बिजनौर पहुंचे और वहां आर्थिक रूप से कमजोर बैकग्राउंड के छात्र- छात्राओं की तलाश में जुटे.

 

2008 तक उन्होंने ऐसे 30 छात्रों को खोज निकाला जो कमजोर माली हालत के कारण तकनीकी शिक्षा से वंचित थे. इस तलाश के बाद अम्बर की अगली मुहिम उन तकनीकी कालेजों तक पहुंची जहां किसी कारणवश इंजीनियरिंग व दीगर संकायों की कुछ सीटें खाली रह जाती थीं. अम्बर ने इन कालेजों को अपने भरोसे में लिया और उन्हें इस बात के लिए तैयार किया कि वह उनके छात्रों का नामांकन करेंगे और सिर्फ युनिवर्सिटी फीस ले कर उन्हें अपने यहां पढ़ायेंगे. उनसे कोई डुनेशन नहीं लिया जायेगा. अम्बर की इस मुहिम का तीसरा पड़ाव ऐसे कार्रपोरेट घरानों की खोज के लिए था, जो अपने कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के तह जरूतमंद छात्रों की फीस अदा कर सकें. काफी भागदौड़ और मशक्कत के बाद उनकी यह पहली मुहिम कामयाब हुई. इस कामयाबी ने अम्बर के सपनों को तो जैसे पंख ही लगा दिया. और फिर यह सिलसिला चल निकला. अंबर हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और यहां तक कि आंडमन निकोबार तक की तकनीकी शिक्षण संस्थानों में सुर्खियों में आ गये. उनके इस सामाजिक दायित्व की धमक तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम तक पहुंची. अनेक सामाजिक और शौक्षमिक संगठनों ने राष्ट्रपति तक उनके योगदान की खबर पहुंचायी. फिर अम्बर के जीवन में वह प्रेरक क्षण आ गया जब अब्दुल कलाम ने उनकी इस उपलब्धि पर अपने हाथों से सम्मानित किया और भविष्यवाणी करते हुए कहा- यू विल फ्लाई.. यू विल फ्लाई. यह कलाम द्वरा किसी व्यक्ति को सम्मानित करने का आखिरी क्षण था. इस समारोह के बाद अचानक कलाम साहब ने दुनिया से रुख्सत ले ली.

गो गर्ल, ग्रो गर्ल मुहिम

अम्बर एक सोशल एंट्रोप्रेन्योर के अलावा परिपक्व भविष्यद्रष्टा भी हैं. इसकी बानगी उनकी उस योजना में दिखती है जिसके तहत उन्होंने एक मुहिम शुरू की जिसका नाम रखा गया ‘गो गर्ल, ग्रो गर्ल’ ( Go Girl, Gro Girl) . इस मुहिम का उद्देश्य था कि लड़कियों तक पहुंचो और उनका विकास सुनिश्चित करो. अम्बर की यह मुहिम एक भविष्यद्रष्टा की मुहिम इसलिए थी कि उन्होंने जब इसकी शुरुआत की उसके पांच साल बाद केंद्र सरकार ने ऐसी ही मुहिम बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ के नाम से शुरू की. अम्बर की इस मुहिम का असर देशव्यापी स्तर पर पड़ा और देखते ही देखते रोजमाइन की गतिविधियों की स्वीकारोक्ति इतनी बढने लगी कि उत्तर भारत से ले कर दक्षिण भारत तक से रोजमाइन के शाखायें खोलने के ऑफर आने लगे. देखते ही देखते बिहार और यूपी की सीमाओं को लांघते हुए रोजमाइन ने हरियाणा, चंडीगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, आंडमान व निकोबार आइलैंड, कर्नाटक व जम्मू कश्मीर या यूं कहें कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपने कार्यालय खोलते हुए समूचे भारत को अपने आगोश में ले लिया.

युवाओं में सपने जगाने की ललक

 

क्या है मिशन

 

वैसे तो रोजमाइन का प्रथम मिशन बस इतना है कि पैसे और सुविधाओं के अभाव में इंजीनियरिंग व दीगर तकनीकी शिक्षा से वंचित छात्र-छात्राओं को देश भर के कालेजों में नामांकन करा कर उन्हें उनके पैरों पर खड़ा करना है. इसके लिए छात्रों को एक पैसा फीस के रूप में नहीं देना होता. बस उन्हें हास्टल में रहने और खाने पीने का खर्च उठाना पड़ता है. लेकिन ओवैसे अम्बर ने अपने अनुभवों से जाना है कि देश भर में कोचिंग संस्थानों की लूट मची है. ये संस्थान छात्रों से लाखों रुपये ऐंठते हैं. गैरकानूनी तरीके से उन्हें 10-5 बजे तक पढ़ाते हैं. जबकि इस पीरियड में छात्रों को 12 वीं की पढ़ाई के लिए स्कूलों में रहना होता है. ऐसे में छात्र स्कूलों में प्रजेंट तक नहीं होते और 12 वीं की परीक्षा दे देते हैं. यहीं से भ्रष्टाचार और लूट की शुरुआत होती है. अम्बर का बस यही मिशन है कि  गैरकानूनी तरीके से पढ़ाने वाले कोचिंग संस्थानों को बंद कराया जाये. इसी तरह उनका तीसरा मिशन है डीम्ड युनिवर्सिटियों के मकड़जाल को ध्वस्त करना और पूरे देश में एक जैसी शिक्षा व्यवस्था और एक सिलेबेस को लागू करवाना. इन मिशनों के अलावा अम्बर इस अभियान में भी लगे हैं कि देश में GER( ग्रॉस एनरौलमेंट रेशियो) की दर बढ़ाया जाये. अम्बर की चिंता है कि भारत में जीईआर पिछले पचास सालों में मात्र 13 प्रतिशत तक पहुंच पायी है. जबकि जीईआर की दर अमेरिका में 80 प्रतिशत है. अम्बर कहते हैं कि इस दिशा में देश की तमाम राज्य सरकारें जुटी हैं लेकिन उसका उचित रिजल्ट सामने नहीं आ पा रहा है. लिहाजा इस लक्ष्य को प्राप्त करने में भी रोजमाइन बड़ी शिद्दत से जुटा है.

 

कोर्सेज की सुविधायें 

इंजीनियरिंग- एरोनोटिकल, एयरोस्पेस, 3डी एनिमेशन, पेट्रोकेमिकल, बॉयोटेक्नोलॉजी

पैरा मेडिकल- रेडियोलॉजी, फिजियोथ्रैपी, कार्डियोलॉजी, नर्सिंग आदि

मैनेजमेंट- बीबीए, बीबीएम, बीएएम, एमबीए, एनएएम, पीजीडीएम

बीएड, डीएड आदि

 

 

 

रोजमाइन का फंडा

किसी भी धर्म, किसी भी जाति के छात्र हों बस अगर आपके पास धनाभाव है तो आपके लिए है रोजमाइन. 12वीं में पचास प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले छात्रों का सीधा तकनीकी कालेजों में नामांकन करवाने की जिम्मेदारी रोजमाइन की है.

रोजमाइन के इस महत्वपूर्ण योगदान के बदले छात्रों को एक पैसा नहीं देना होता है. लेकिन बस एक वचन देना होता है कि रोजमाइन संस्था से जुड़े छात्र अपनी शादी बिना दहेज के करेंगे. इसके लिए रोजमाइन बजाब्ता शपथ दिलवाता है. और दूसरा वचन रोजमाइन यह लेता है कि शिक्षा प्राप्त कर लेने और अपने पैरों पर खड़ा हो जाने के बाद छात्र किसी एक गरीब बच्चे का भविष्य संवारेगा.

उपलब्धि

एक दशक के अपने छोटे सफर में रोजमाइन्स ने 30 हजार से ज्यादा छात्रों को तकनीकी शिक्षा में दक्ष करा कर उन्हें रोजगार के लायक बना दिया है. दूसरी तरफ समाज में दहेज जैसी घातक कुरीति के खिलाफ रोजमाइन्स के अभियान का शानदार असर हुआ है. इसके छात्रों ने बिना दहेज के शादी करने की अपनी वचनबद्धता का पालन कर रहे हैं जिसका काफी सकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ा है.

 

 अम्बर का संदेश

ओवैसे अम्बर अपने मिशन में दिन रात लगे हैं. उनकी स्पष्ट मान्यता है कि सही शिक्षा से संतुलित समाज का निर्माण होता है. तभी देश मजबूत और खुशहाल होता है. अम्बर कहते हैं कि हमारे देश का राजनीतिक नेतृत्व इस दिशा में काम करता रहा है. यही कारण है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी तक और मनमोहन सिंह से ले कर हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सर्वाधिक जोर शिक्षा को संवारने के लिए है. लेकिन यह मिशन तब कामयाब हो सकता है जब सरकार के साथ समाज भी इस दिशा में आगे आ कर काम करे. रोजमाइन इसी आंदोलन का हिस्सा है.

नौकरशाही एडवर्टोरियल ब्यूरो की प्रस्तुति

About Editor

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*