भागलपुर: कांग्रेस के पराभव की कथा लिख दी थी दंगे ने 

भागलपुर की पहचान सिल्क उद्योग से रही है। राजनीतिक रूप से लंबे समय तक भागवत झा आजाद इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व लोकसभा में करते रहे हैं। भागवत झा आजाद एक बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन 1989 के भागलपुर के दंगे ने कांग्रेस के पराभव की पटकथा लिख दी थी। उस समय बिहार के मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह थे। दंगा के समय भागलपुर के पुलिस अधीक्षक ब्राह्मण जाति के ही थे। 2003 में सत्येंद्र नारायण सिंह ने हमारे साथ एक इंटरव्यू में कहा था कि भागलुपर का दंगा उनकी सरकार के खिलाफ ब्राह्मणों की साजिश थी। भागलपुर का दंगा साजिश थी या दुर्घटना, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन भागलपुर दंगे ने कांग्रेस की रीढ़ ऐसी तोड़ी कि आज अपने दम पर एक कदम चलने में भी सक्षम नहीं है। बिहार में कांग्रेस के पतन में भाजपा का उत्थान समाहित है। जैसे-जैसे कांग्रेस का आधार घटता गया, वैसे भाजपा का आधार बढ़ता गया।
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वीरेंद्र यादव के साथ लोकसभा का रणक्षेत्र – 11
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सांसद — शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल — राजद — गंगोता
विधान सभा क्षेत्र — विधायक — पार्टी — जाति
बिहपुर — वर्षा रानी — राजद — गंगोता
गोपालपुर — नरेंद्र नीरज — जदयू — गंगोता
पीरपैंती — रामविलास पासवान — राजद — पासवान
कहलगांव — सदानंद सिंह — कांग्रेस — कुर्मी
भागलपुर — अजीत शर्मा — कांग्रेस — भूमिहार
नाथनगर — अजय मंडल — जदयू — गंगोता
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2014 में वोट का गणित
शैलेश कुमार — राजद — गंगोता — 367623 (38 प्रतिशत)
शाहनवाज हुसैन — भाजपा — सैयद — 358138 (37 प्रतिशत)
अबु कैसर — जदयू — मुसलमान — 132256 (14 प्रतिशत)
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सामाजिक बनावट
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भागलपुर यादव, मुसलमान और ब्राह्मण प्रभाव वाला क्षेत्र है। सिल्क उद्योग का आधार मुस्लिम परिवार ही रहे हैं। शहरी क्षेत्र होने के कारण बनिया का भी काफी प्रभाव है। लेकिन भागलपुर दंगा के कारण सामाजिक समीकरण बदला और कुछ जातियां नयी ताकत बनकर उभरीं। अतिपिछडी जातियों के उभार ने ब्राह्मणों को कमजोर किया। जदयू और भाजपा के गठबंधन ने सामाजिक स्वरूप को नया आकार दिया। अतिपिछड़ी जातियों में गंगोता सबसे मजबूत है और छह विधायकों में तीन इसी जाति के हैं। मल्लाह और धानुक की भी बड़ी आबादी है।
सुशील मोदी को भेजा लोकसभा
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भागलपुर के सांसद भागवत झा आजाद बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। 2004 में सुशील मोदी लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे और 2005 में एनडीए की सरकार में सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद इस सीट के लिए हुए उपचुनाव में शाहनवाज हुसैन निर्वाचित हुए थे। 2009 में फिर शाहनवाज इस सीट से निर्वाचित हुए। 2014 में अश्चिनी कुमार चौबे भागलपुर से भाजपा के प्रबल दावादार बनकर उभरे। लेकिन उन्हें भाजपा ने बक्सर भेज कर शाहनवाज हुसैन की राह आसान कर दी थी। 2019 में शाहनवाज की मुश्किल बढ़ती देखी जा रही है। 2014 की हार ने उनके लिए भागलपुर सीट की संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया है।
कौन-कौन हैं दावेदार
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राजद में इस सीट पर उम्‍मीदवार को लेकर कोई विवाद नहीं है। महागठबंधन में भागलपुर सीट राजद के कोटे में ही रहेगी। लेकिन यही बात एनडीए के लिए नहीं कहा जा सकता है। भाजपा इस सीट से दो बार निर्वाचित हुई। वह भी अपना दावा पेश करेगी। लेकिन इस सीट पर जदयू की नजर भी है। भाजपा में भी इस सीट के कई दावेदार हैं। सबसे प्रबल दावेदार बक्सर के सांसद अश्विनी कुमार चौबे को माना जा रहा है। शाहनवाज हुसैन भी खुद को दावेदार मान रहे हैं। उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी फिर लोकसभा की यात्रा करना चाहते हैं। इसके लिए वे भागलपुर को आजमाया हुआ सीट मान रहे हैं। उनकी चर्चा पटना साहिब सीट को लेकर भी है। हालांकि इस मुद्दे पर उन्होंने अपना मुंह नहीं खोला है। जदयू में भी कई उम्मीदवार हैं। भागलपुर के पूर्व सांसद और वर्तमान में सुल्तानगंज के विधायक सुबोध राय भी जदयू के दावेदार हो सकते हैं। उम्मीदवारी के खेल में अभी परिदृश्‍य स्पष्ट नहीं है। लेकिन तय है कि राजद के बुलो मंडल अपनी सीट पर कायम रहेंगे, लेकिन एनडीए में भाजपा को ही यह सीट जाएगी, अभी तय नहीं है।

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