भाजपा भगाओ रैली:लाखों लोग आये, विपक्षी एकता भी दिखी, पर एक संकेत और भी है.. वह क्या?

भाजपा भगाओ रैली सफल थी, ठीक है.लाखों लोग आये, यह भी ठीक.  विपक्षियों की एकता थी, यह भी दिखी. रैली से जदयू भाजपा के कान खड़े हो गये यह भी दुरुस्त. पर इन सबसे अलग भी कुछ संकेत हैं जो जानना चाहिए. इर्शादुल हक की कलम से

देश बचाओ, भाजपा भगाओ रैली, गांधी मैदान

 

कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद हों, ममता बनर्जी हों या फिर देवेगौड़ा के प्रतिनिधि सब ने पटना की भाजपा भगाओ देश बचाओ रैली में एक बात संकेत दिया कि 2019 की लड़ाई विपक्षी पार्टियों के नये कर्णधारों  को आगे रख के लड़ी जायेगी.इसमें राजद से तेजस्वी होंगे तो सपा से अखिलेश और राष्ट्रीय लोकदल से जयंत चौधरी, कांग्रेस से राहुल तो होंगे ही होंगे. ममता भी अपनी नयी पीढ़ी मैदान में उतारेंगी. लालू, ममता, शरद, एच देवेगौड़ा, सोनिया जैसे नेता मजबूती से साथ होंगे लेकिन फ्रंट पर नयी पीढ़ी ही होगी. गुलाम नबी आजाद ने तो तेजस्वी के नेतृत्व की तारीफ तक की. कहा कि अब इस देश को आप जैसे लोग आगे बढ़ायें. शरद ने भी सुर मिलाया और युवा व उत्साही भीड़ को ललकारा कि इस देश को तबाह करने वालों से बचाओ और आओ मेरे साथ बोलो इंकलाब जिंदाबाद. लालू ने परोक्ष रूप से तेजस्वी के नेतृत्व को स्वीकृति दी. और कहा कि मैं कोर्ट के चक्कर में लगा था. बार-बार रांची जाना पड़ता था, इसलिए हम जनता के बीच बहुत नहीं जा सके. लेकिन तेजस्वी आपके पास गये. आप लाखों की संख्या में आये आपका बहुत धन्यवाद.

जयंत चौधरी ने अपने दादा चरण सिंह और पिता अजित सिंह का हवाला दिया. वह कह रहे थे कि पटना की रैली में जाने से पहले पिता चौधरी अजित सिंह से बातें हुई और मैंने उन्हें कहा कि पटना की रैली से बदलाव की शुरुआत होगी. गोया वह भी अब अपने दल की तीसरी पीढ़ी की हैसियत से तैयार हैं. मैदान में डटने के लिए, लड़ाई लड़ने के लिए. अखिलेश ने तो पूरा हिसाब किताब समझाया. कहा कि बिहार की 11 करोड़ जनता, यूपी की 22 करोड़ जनता और दीदी( ममता बनर्जी) का पूरा बंगाल साथ आ चुका है. वह कहना चाह रहे थे कि लगभग 150 सीटें इन तीन राज्यों में हैं. 2014 वाली गलती नहीं दोहरायेंगे. भाजपा को भगायेंगे.

 

पिछले 20-25 साल की राजनीति में जन मोर्चा, राष्ट्रीय मोर्चा या इससे जुड़े अन्य मोर्चा जो केंद्रीय सत्ता को ललकारता रहा है, उसका नेतृत्व लालू, मुलायम, अजित सिंह समेत, लालू यादव, शरद यादव सरीखे लोग करते थे. अब इस लड़ाई के नये सिपाहियों में उनकी नयी पीढ़ी होगी. पिछली लड़ाई और अब की लड़ाई में फर्क यह होगा पुरानी पीढ़ी पूरी सक्रियता और दमखम से तो मौजूद होगी ही, नयी पीढ़ी भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ होगी. यह पीढ़ी नयी पीढ़ी की नुमाइंदगी करेगी. जब जब इस रैली में अखिलेश, तेजस्वी और जयंत जैसे युवा माइक थामते थे तो तालियों की उतनी ही गड़गड़ाहट और जिंदाबाद के उतने ही नारे गूंजते थे जितने शरद, लालू, ममता, गुलाम नबी आजाद या अगली पीढ़ी के दीगर नेता भाषण देने आते थे.

भारतीय जनता पार्टी की डिजिटल और सोशल मीडियाई जंग की रणनीतिक कौशल से लोहा लेने के लिए इस पीढ़ी के पास पूरी दक्षता है. अखिलेश ने इशारा भी किया कि डिजिटिल इंडिया के लोग( भाजपा) जब गूगल पर इस सभा को देख रहे होंगे तो उन्हें अंदाजा हो गया होगा कि उनके न्यू इंडिया और इस इंडिया में क्या फर्क है. यह रियल इंडिया है. जहां आप लोगों को एक बार वरगला के सत्ता में तो आ सकते हैं लेकिन  अगली बार यही लोग आपके झूठे वादों का हिसाब लेगी.

कुल मिला कर राजद की यह रैली जहां एक तरफ, विपक्षी दलों के नये सिरे से एक मजबूत गठबंधन का संकेत दे गयी वहीं यह भी बता गयी कि नयी पीढ़ी के युवा नेताओं की नयी फौज भी इसमें  महत्वपूर्ण भूमिका के साथ खड़ी होगी. यही फौज 2019 में नरेंद्र मोदी की टीम को चुनौती देगी. पर यह चुनौती कैसी और कितनी मजबूत होगी, यह आने वाले समय में पता चलेगी.

 

 

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