भारतीय नौकरशाही सामरिक सम्बन्ध में बाधक: यूएस रिपोर्ट

अनिता गौतम

अमेरिका के एक प्रतिष्ठित संसथान दी सेंटर फार स्त्रत्जिक एंड इण्टरनेशनल स्टडीज ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि भारत कि सिविल ब्यूरोक्रेसी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के मामले में सब से बड़ी बाधा है जबकि भारतीय मिलिट्री ऐसे समझौतों की पक्षधर है.

इस रिपोर्ट के लेखक, अमेरिकी संस्था पेंटागन के दक्षिण एशिया के पूर्व निदेशक साहबजादा आमिर लतीफ़ ने लिखा कि सामरिक मुद्दे पर भारतीय नौकरशाही सुस्त और सावधानी का रवैया अपनाती है.रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय मिलिट्री इस समय उचित फैसले लेने की चुनौतियों से जूझ रही है इस कारण भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के मामले भी खटाई में पड़ रहे हैं.

हालांकि इस से पहले की रिपोटों में अमेरिकी सामरिक संस्थाएं भारतीय मिलिट्री को अत्यधिक प्रोफेशनल और योग्य बता चुकी हैं. इस तरह ताज़ा रिपोर्ट खुद अमेरिकी सामरिक संस्थाओं कि रिपोर्टों के बरक्स है.

दी सेंटर फार स्त्रत्जिक एंड इण्टरनेशनल स्टडीज कि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हालांकि भारत सामरिक तौर पर एक विकसित देश है पर इसने अभी तक अंतर्राष्ट्रीय मिशनों के लिए अपनी सेना कि तैनाती के सम्बन्ध में दीर्घावधि की नीति विक्सित नहीं की है.

रिपोर्ट में अमेरिका को सुझाव दिया गया है कि उसे अपने सामरिक सहयोगी भारत के साथ अल्प और दीर्घ अवधि के सहयोग को और बढाने के प्रयास करने चाहिए. यह प्रयास भारत द्वारा दिलचस्पी नहीं दिखए जाने के बावजूद कम नहीं किये जाने चाहिए, जैसा कि भारत कि ताज़ा विदेश नीतियों में इसकी कुछ झलक मिलती है.

एशिया प्रशांत क्षेत्र में रक्षा मामलों पर भारत के असहयोगात्मक रवैये पर अमेरिका की नाराज़गी का ज़िक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र के अन्य देश भी भारत की पहल का शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं. ये देश भारत से अधिक से अधिक सहयोग और नेतृत्व की उम्मीद करते हैं.

रिपोर्ट में भारत कि इस चिंता को भी रेखांकित किया गया है कि अमेरिका-पाक सामरिक संबंधों पर उसकी क्या सोच है. रिपोर्ट में भारत को इस क्षेत्र की एक बड़ी शक्ति के रूप में देखा गया है और कहा गया है कि इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करने में भारत की अहम भूमिका है जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

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