भारत रत्न की मांग और वाजपेयी का 1942 का इकरारनामा

तेंडुलकर को भारत रत्न देने के बाद कुछ लोग अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भी यह मांग उठा रहे हैं. पर सोशल मीडिया में वाजपेयी के 1942 के इकरारनामे को शेयर करके उनकी देशभक्ति पर प्रश्न खड़े किये जाने लगे हैं.a href=”http://naukarshahi.com/wp-content/uploads/2013/11/vajpayee.jpg”>vajpayee

अंग्रेजी हुकूमत की गिरफ्तारी से बचने के लिए वाजपेयी द्वारा दिये गये इकरारनामे को फेसबुक पर शेयर करके उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाया जा रहा है. और पूछा जा रहा है कि वाजपेयी ने जेल से बचने के लिए जो झूठा इकरारनामा दिया, ऐसे में क्या वह भारत रत्न के हकदार हैं? वाजपेयी द्वारा अदालत में पेश उस इकरारनामे का हिंदी अनुवाद पेश है.यह इकरारनामा उर्दू में लिखा गया था.

मेरा नाम:अटल बिहारी
पिता का नाम: गौरी शंकर
आयु: 20 वर्ष
व्यवसाय: छात्र, ग्वालियर कॉलेज
मेरा पता: बटेश्वर, पीएस- बाह,
जिला: आगरा

अदालत द्वारा यह पूछे जाने पर कि, “क्या आप आगजनी की घटना में संलिप्त थे और सरकारी इमारत को क्षति पहुंचायी? आपका इस संबंध में क्या कहना है”? श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस संबंध में अदालत को निम्नलिखित बयान दर्ज कराये.

“27 अगस्त 1942 को बटेश्वर बाजार में आल्हा का कार्यक्रम चल रहा था. लगभग दोपहर 2 बजे काकू उर्फ लीलाधर और माहुअन आल्हा के कार्यक्रम में पहुंचे और इसमें भाषण दिये और लोगों को फॉरेस्ट लॉ तोडने के लिए उकसाया. उसके बाद सैकड़ों लोग फारेस्ट ऑफिस की तरफ बढ़े. मैं भी अपने भाई के साथ भीड़ के पीछे पीछे बटेश्वर स्थित फारेस्ट ऑफिस गया. मैं और मेरा भाई नीचे रह गये और बाकी लोग ऊपर चले गये. काकू और माहुअन के अलावा मैं किसी और आदमी का नाम नहीं जानता, जो वहां थे”.

“मुझे महसूस हुआ कि वहां ईंटें गिर रही हैं. मुझे नहीं पता कि दीवार कौन लोग गिरा रहे थे पर मैं यह निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि दीवार की ईंटे गिर रही थीं”.

“मैं अपने भाई के साथ मियापुर की तरफ जाने लगा और भीड़ हमारे पीछे थी. ऊपर वर्णित लोग जोर जबरदस्ती बकरियों को वहां से भगा दिया और भीड़ बिचकोली की ओर जाने लगी. उस समय फॉरेस्ट ऑफिस में 10-12 लोग थे. मैं 100 गज की दूरी पर था. सरकारी इमारत गिराने में उनकी कोई मदद नहीं की. उसके बाद हम अपने घर चले गये”.

हस्ताक्षर- एस, हसन
हस्ताक्षर- अटल बिहारी वाजपेयी
तिथि- 1.9. 1942

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